नई दिल्ली 20 जुलाई 2026 । विस्तृत विश्लेषण |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
देश के प्रसिद्ध शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का अनिश्चितकालीन अनशन अब केवल एक आंदोलन नहीं रहा, बल्कि करोड़ों विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग करने वाले नागरिकों की सामूहिक आवाज़ बन चुका है। लगभग तीन सप्ताह से अधिक समय से जारी इस आंदोलन ने अब संसद के मानसून सत्र की शुरुआत के साथ राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में जगह बना ली है।
वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो ने स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि संसद के मानसून सत्र में सभी राजनीतिक दल शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही, परीक्षा प्रणाली में सुधार और कथित परीक्षा घोटालों पर गंभीर चर्चा कराने का सार्वजनिक आश्वासन देते हैं, तो सोनम वांगचुक अपना अनशन समाप्त करने पर विचार करेंगे।
शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग ने आंदोलन को दिया नया राजनीतिक आयाम
जंतर-मंतर पर हजारों प्रदर्शनकारियों की मौजूदगी ने यह संकेत दे दिया कि यह आंदोलन अब सीमित दायरे से निकलकर राष्ट्रीय जनआंदोलन का रूप ले चुका है। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग है कि कथित NEET पेपर लीक, परीक्षा प्रणाली में लगातार सामने आ रही अनियमितताओं और शिक्षा क्षेत्र में जवाबदेही तय करने में विफल रहने के कारण केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें। आंदोलन का दावा है कि जब तक शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होती, तब तक देश के लाखों छात्रों का भविष्य असुरक्षित बना रहेगा।
दिल्ली पुलिस ने संसद मार्च को दी अनुमति नहीं, धारा 163 लागू
उधर आंदोलन के समानांतर सुरक्षा एजेंसियां भी पूरी तरह सतर्क दिखाई दीं। दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया कि 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च के लिए कोई अनुमति न तो मांगी गई है और न ही दी गई है। नई दिल्ली जिले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 लागू है, जिसके तहत पांच या उससे अधिक लोगों के एकत्र होने तथा बिना अनुमति जुलूस निकालने पर प्रतिबंध है। पुलिस ने चेतावनी दी कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
दिल्ली हाईकोर्ट से भी नहीं मिली राहत
इस बीच दिल्ली हाईकोर्ट ने सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल से किसी निजी अस्पताल में स्थानांतरित करने की मांग पर अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि चिकित्सकीय दृष्टि से उनकी स्थिति गंभीर है और उन्हें निरंतर निगरानी की आवश्यकता है। न्यायालय ने केंद्र सरकार की इस दलील को स्वीकार किया कि उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने का निर्णय चिकित्सा आवश्यकता के आधार पर लिया गया था। अदालत के अनुसार वांगचुक के शरीर में पोटैशियम का स्तर चिंताजनक रूप से कम पाया गया है तथा विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम लगातार उनकी निगरानी कर रही है।
परिवार ने सरकार की कार्रवाई पर उठाए सवाल
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो ने सरकार की भूमिका पर गंभीर प्रश्न उठाए। उनका कहना है कि सोनम वांगचुक पहले भी लद्दाख में 35 दिनों तक सफलतापूर्वक उपवास कर चुके हैं और उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर लगातार चिकित्सकीय निगरानी रखी जा रही थी। उनके अनुसार यदि सरकार वास्तव में स्वास्थ्य को लेकर चिंतित थी, तो परिवार के साथ विश्वास कायम करते हुए लोकतांत्रिक तरीके से संवाद करना चाहिए था, न कि पुलिस कार्रवाई के जरिए हस्तक्षेप करना चाहिए था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि परिवार को अस्पताल में पर्याप्त स्वतंत्रता और चिकित्सकीय जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है।
'मेरी जगह मेरी पत्नी आंदोलन का नेतृत्व करेंगी'
गीतांजलि अंगमो ने घोषणा की कि यदि सोनम वांगचुक अस्पताल में ही रहते हैं, तब भी आंदोलन नहीं रुकेगा। उन्होंने कहा कि वह स्वयं संसद मार्च में उनकी ओर से भाग लेंगी। साथ ही उन्होंने प्रदर्शनकारियों से अपील की कि आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहे और किसी भी प्रकार के उकसावे में न आएं। उनका कहना था कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल के लिए नहीं, बल्कि देश की आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए लड़ा जा रहा है।
विपक्ष ने सरकार को घेरा, शिक्षा को बनाया संसद का मुद्दा
इस आंदोलन को लेकर विपक्षी दलों ने भी केंद्र सरकार पर तीखे हमले किए हैं। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने राज्यसभा में नियम 267 के तहत नोटिस देकर NEET पेपर लीक, सार्वजनिक परीक्षाओं की विश्वसनीयता और सोनम वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति पर चर्चा कराने की मांग की है। वहीं पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे, तृणमूल कांग्रेस सांसद कीर्ति आजाद, कांग्रेस नेता नाना पटोले तथा अन्य विपक्षी नेताओं ने भी शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और व्यापक शिक्षा सुधार की मांग का समर्थन किया है।
क्या शिक्षा व्यवस्था पर सरकार जवाब देगी?
यह पूरा विवाद अब केवल एक अनशन या एक व्यक्ति के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रह गया है। असली प्रश्न यह है कि क्या देश की संसद शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता और छात्रों के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर गंभीर बहस करेगी? करोड़ों विद्यार्थियों और अभिभावकों की निगाहें अब संसद के मानसून सत्र पर टिकी हैं।
यदि सरकार इस अवसर पर व्यापक शिक्षा सुधार, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर ठोस पहल करती है, तो यह आंदोलन भारतीय शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की दिशा में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है। लेकिन यदि इन मांगों को अनसुना किया गया, तो यह आंदोलन आने वाले दिनों में और अधिक व्यापक तथा राजनीतिक रूप से प्रभावशाली स्वरूप ग्रहण कर सकता है।
