7 अगस्त 2026 | ✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
यह लेख गहन शोध, उपलब्ध आंकड़ों, अदालती फैसलों, विशेषज्ञ विश्लेषण और दोनों पक्षों के तर्कों पर आधारित है। लक्ष्य पक्षपात नहीं, बल्कि तथ्यों की स्पष्टता और लोकतंत्र की मजबूती है।
ईवीएम और चुनाव आयोग: सुरक्षा के दावे बनाम संदेह
चुनाव आयोग (ईसीआई) लगातार दावा करता है कि भारतीय ईवीएम स्टैंडअलोन हैं—कोई इंटरनेट, ब्लूटूथ, वाई-फाई या बाहरी कनेक्टिविटी नहीं। माइक्रोकंट्रोलर वन-टाइम प्रोग्रामेबल (OTP) हैं, फर्मवेयर लॉक होता है, म्यूचुअल ऑथेंटिकेशन होता है, और प्रशासनिक सुरक्षा (रैंडमाइजेशन, सीलिंग, पार्टी एजेंटों की उपस्थिति, स्ट्रॉन्ग रूम) मजबूत है। वीवीपीएटी (वोटर वेरिफायबल पेपर ऑडिट ट्रेल) के साथ 2019 के बाद से हर विधानसभा खंड में 5 बूथों की अनिवार्य जांच हो रही है। आयोग के अनुसार, 67,000 से ज्यादा वीवीपीएटी (4.5 करोड़ से अधिक स्लिप्स) की गिनती हुई और एक भी वोट ट्रांसफर का मामला नहीं मिला। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार ईवीएम को सुरक्षित बताया है, 100 प्रतिशत वीवीपीएटी गिनती और बैलेट पेपर की वापसी की मांग खारिज की है। कोर्ट ने कहा कि बिना सबूत के बार-बार संदेह लोकतंत्र में अविश्वास पैदा कर सकता है।
दूसरी ओर, संदेह गहरा है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और अन्य संगठनों के विश्लेषण के अनुसार, 2024 लोकसभा चुनाव में 538 में से ज्यादातर क्षेत्रों में पोल हुए वोट और गिने गए वोटों में विसंगति थी—कुछ में कम, कुछ में ज्यादा। पोलिंग बंद होने के बाद टर्नआउट में अचानक उछाल (कई राज्यों में 7-12 प्रतिशत तक) के आंकड़े सामने आए। वोटर लिस्ट में डुप्लिकेट, फर्जी पते, बल्क रजिस्ट्रेशन और चयनात्मक डिलीशन के आरोप लगे। सोर्स कोड सार्वजनिक नहीं है, जबकि ब्राजील जैसे देश नियंत्रित पहुंच देते हैं। प्रतीकात्मक लोडिंग यूनिट (एसएलयू) और अन्य प्रक्रियाओं पर पारदर्शिता की कमी बताई जाती है। विशेषज्ञ सैद्धांतिक संभावनाएं बताते हैं कि एल्गोरिदम में मैनिपुलेशन संभव हो सकता है, भले ही व्यावहारिक रूप से सुरक्षा परतें हों। विपक्ष इसे संस्थागत पक्षपात से जोड़ता है—खासकर चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव (सीजेआई की जगह कैबिनेट मंत्री) के बाद।
सच्चाई यह है कि अब तक कोई अदालत या स्वतंत्र जांच ने बड़े पैमाने पर व्यवस्थित हैकिंग या वोट ट्रांसफर का ठोस सबूत नहीं दिया। कई चुनावों में विपक्ष जीता है (दिल्ली, पंजाब, कुछ राज्य)। लेकिन विसंगतियों, देरी से डेटा जारी करने और कम सैंपल साइज की वीवीपीएटी जांच ने विश्वास को नुकसान पहुंचाया है। लोकतंत्र में सिर्फ “सुरक्षित है” कहना पर्याप्त नहीं—जन विश्वास जरूरी है। पारदर्शिता बढ़ाना (अधिक वीवीपीएटी गिनती, सोर्स कोड का नियंत्रित ऑडिट, मशीन-रीडेबल वोटर लिस्ट, सीसीटीवी फुटेज संरक्षण) दोनों पक्षों के हित में है।
जवाबदेही का संकट: क्या सत्ताधारी “चुने” नहीं महसूस करते?
अगर चुनाव प्रक्रिया पर संदेह गहरा हो तो सत्ता की वैधता कमजोर पड़ती है। जवाबदेही सिर्फ चुनावी जीत से नहीं आती—संस्थाओं की स्वतंत्रता, संसदीय निगरानी, मीडिया की भूमिका, नागरिक समाज और अदालतों से आती है। जब चुनाव आयोग, जांच एजेंसियां या अन्य संस्थाएं पक्षपाती दिखें तो शासक वर्ग में “हम अजेय हैं” की भावना आ सकती है। यह सिर्फ एक दल की समस्या नहीं। इतिहास में हर सत्ता ने संस्थाओं को प्रभावित करने की कोशिश की। लेकिन वर्तमान में नियुक्ति प्रक्रियाओं, ईडी/सीबीआई के इस्तेमाल और चुनावी फंडिंग (इलेक्टोरल बॉन्ड) पर सवाल ज्यादा तेज हैं।
जनहित बनाम सत्ता-केंद्रित राजनीति का आरोप भी इसी से जुड़ा। राज्य चुनावों में गठबंधन, दल-बदल, और प्रशासनिक दबाव के आरोप आम हैं। लेकिन यह भी सच है कि लोकतंत्र में सत्ता हासिल करना स्वाभाविक लक्ष्य है। समस्या तब है जब प्रक्रिया निष्पक्ष न लगे।
12 वर्षों का मोदी काल: उपलब्धियां और खामियाँ
मोदी सरकार के 12 वर्षों में कल्याण योजनाओं का विस्तार उल्लेखनीय है। जन धन योजना से 50 करोड़ से अधिक बैंक खाते, डीबीटी से लीकेज में कमी, आयुष्मान भारत (दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना), पीएम-किसान (प्रत्यक्ष आय समर्थन), उज्ज्वला, स्वच्छ भारत (करोड़ों शौचालय), पीएम आवास, जल जीवन मिशन, मुफ्त राशन (पीएमजीकेएवाई—80 करोड़ से अधिक लाभार्थी), और डिजिटल इंडिया/यूपीआई ने पहुंच बढ़ाई। बहुआयामी गरीबी में कमी के आंकड़े (नीति आयोग/यूएनडीपी) सरकार के पक्ष में हैं। बुनियादी ढांचा (हाईवे, रेल, एयरपोर्ट) और कुछ क्षेत्रों में औपचारिक अर्थव्यवस्था का विस्तार भी हुआ।
दूसरी तरफ, आलोचक बेरोजगारी (खासकर युवा), असमानता, कृषि संकट, नोटबंदी और जीएसटी के शुरुआती झटकों, और संस्थागत कमजोरी की ओर इशारा करते हैं। “जनकल्याण बनाम सत्ता-केंद्रित राजनीति” का आरोप—राज्य सरकारों पर फोकस, विपक्षी नेताओं पर केस, मीडिया नियंत्रण के आरोप—भी गंभीर हैं। वास्तविकता मिश्रित है। कई योजनाएं पिछले कार्यक्रमों का विस्तार या रीब्रांडिंग हैं, लेकिन डिलीवरी मैकेनिज्म (आधार-लिंक्ड) ने प्रभाव बढ़ाया। आर्थिक विकास के साथ रोजगार सृजन और सामाजिक सामंजस्य चुनौतियां बनी रहीं। कोई भी सरकार पूर्णतः जनहित या पूर्णतः सत्ता-केंद्रित नहीं होती—दोनों तत्व मौजूद रहते हैं।
जन आंदोलनों की दिशा: इस्तीफे या व्यवस्था सुधार?
भ्रष्ट या निकम्मे नेताओं के इस्तीफे मांगना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन सिर्फ व्यक्तिगत इस्तीफे समस्या का समाधान नहीं। व्यवस्था अगर दोषपूर्ण हो तो नए नेता भी उसी ढांचे में फंस सकते हैं। ईवीएम/चुनाव आयोग पर फोकस जरूरी है, लेकिन एकमात्र नहीं।
तार्किक दिशा बहुआयामी होनी चाहिए:
- चुनावी पारदर्शिता की मांग: अधिक वीवीपीएटी सैंपल (कम से कम 20-25 प्रतिशत या जोखिम-आधारित), सोर्स कोड का स्वतंत्र लेकिन सुरक्षित ऑडिट, एसएलयू और अन्य उपकरणों पर सख्त प्रोटोकॉल, वोटर लिस्ट का मशीन-रीडेबल और समय पर उपलब्ध होना, फॉर्म 17सी की पूर्ण पारदर्शिता, और सीसीटीवी फुटेज का लंबा संरक्षण। बैलेट पेपर की पूर्ण वापसी व्यावहारिक नहीं (भारतीय पैमाने पर गड़बड़ी के पुराने सबूत), लेकिन हाइब्रिड सिस्टम या बेहतर ऑडिट संभव है।
- संस्थागत सुधार: चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में व्यापक सर्वसम्मति या स्वतंत्र पैनल। राजनीतिक फंडिंग की पारदर्शिता। स्वतंत्र जांच एजेंसियों को राजनीतिक प्रभाव से दूर रखना।
- जन भागीदारी और जवाबदेही: आरटीआई, जनहित याचिका, शांतिपूर्ण प्रदर्शन, वोटर अवेयरनेस। स्थानीय स्तर पर मुद्दा-आधारित आंदोलन (रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसान)। सिर्फ “वोट चोरी” नारे से आगे बढ़कर सबूत-आधारित मांग।
- नेतृत्व की गुणवत्ता: भ्रष्टाचार और अक्षमता के खिलाफ दबाव, लेकिन वैकल्पिक दृष्टि भी। सिर्फ विरोध पर्याप्त नहीं—रचनात्मक एजेंडा चाहिए।
- व्यापक मुद्दे: अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, सामाजिक न्याय, संस्थाओं की स्वायत्तता। ईवीएम एक लक्षण हो सकता है, बीमारी नहीं। जड़ें गहरी हैं—शक्ति का केंद्रीकरण, कमजोर विरोध, नागरिक भागीदारी की कमी।
जन आंदोलन तब सफल होते हैं जब वे तथ्यों पर टिके हों, हिंसा से दूर रहें, और व्यापक गठबंधन बनाएं। सुप्रीम कोर्ट, संसद और नागरिक समाज के माध्यम से सुधार संभव हैं। अविश्वास की राजनीति लोकतंत्र को कमजोर करती है; विश्वास बहाली के ठोस कदम मजबूत करते हैं।
अंत में, भारत की समस्याएं जटिल हैं। ईवीएम पर संदेह को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, न ही बिना सबूत के “सारी व्यवस्था चोरी” का आरोप। 12 वर्षों की उपलब्धियों और कमियों दोनों को स्वीकार करना चाहिए। जन आंदोलनों की सही दिशा है—पारदर्शिता, संस्थागत मजबूती, जवाबदेही और सबूत-आधारित लोकतंत्र की रक्षा। लोकतंत्र का स्वास्थ्य जनता के सक्रिय, जागरूक और जिम्मेदार हस्तक्षेप पर निर्भर करता है। सिर्फ आरोप नहीं, समाधान की मांग करनी होगी। यही सबसे गहरा और टिकाऊ रास्ता है।
