नयी दिल्ली 16 अगस्त 2026 | ✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
कोलकाता, 16 अगस्त 2026: भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ‘वंदे मातरम्’ को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच नया राजनीतिक विवाद सामने आया है। भाजपा विधायक सुमित्रो चटर्जी ने आरोप लगाया है कि 15 अगस्त को नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) मुख्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम के दौरान ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण के गायन को लेकर असहजता व्यक्त की गई और उसे रोकने के प्रयास किए गए।
चटर्जी ने इस कथित घटनाक्रम पर कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर बिना शर्त माफी मांगने की अपील की है।
हालांकि, इस मामले में कांग्रेस ने भाजपा के आरोप को खारिज किया है। इसलिए विवाद के राजनीतिक दावों और कार्यक्रम में वास्तव में क्या हुआ, इन दोनों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के वंशज ने क्यों उठाया मुद्दा?
सुमित्रो चटर्जी ने अपने पत्र में खुद को केवल एक भाजपा विधायक के रूप में नहीं, बल्कि एक सामान्य नागरिक, देशभक्त और बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के प्रत्यक्ष वंशज के रूप में प्रस्तुत किया।
उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ उनके परिवार की साहित्यिक विरासत से जुड़ा होने के साथ-साथ भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की ऐतिहासिक स्मृति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
चटर्जी के अनुसार, स्वतंत्रता दिवस जैसे अवसर पर इस गीत को लेकर किसी प्रकार की असहजता या रोक-टोक की स्थिति पैदा होना उनके लिए गहरे दुख और आक्रोश का विषय है।
उन्होंने कथित घटना को “एक ऐतिहासिक भूल की शर्मनाक पुनरावृत्ति” करार दिया।
वंदे मातरम्’ सिर्फ गीत नहीं, स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति: चटर्जी
भाजपा विधायक ने अपने पत्र में ‘वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक महत्व को विस्तार से सामने रखा।
उनका तर्क है कि यह रचना औपनिवेशिक भारत में केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं रही, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जनभावनाओं को अभिव्यक्त करने वाला महत्वपूर्ण प्रतीक बनी।
चटर्जी ने श्री अरविंद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘वंदे मातरम्’ ने भारतीय राष्ट्रवाद को एक वैचारिक और भावनात्मक ऊर्जा प्रदान की थी।
उन्होंने इस गीत से जुड़े स्वतंत्रता आंदोलन के कई ऐतिहासिक प्रसंगों का हवाला भी दिया।
1896 से 1938 तक ‘वंदे मातरम्’ की ऐतिहासिक यात्रा
चटर्जी ने अपने पत्र में रवींद्रनाथ टैगोर से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न चरणों तक ‘वंदे मातरम्’ की भूमिका का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि 1896 में कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान रवींद्रनाथ टैगोर ने इसका गायन किया था।
इसके बाद 1905 के बनारस कांग्रेस अधिवेशन में सरला देवी चौधरानी द्वारा इसके गायन का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि बंगाल विभाजन के दौर में ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रीय आंदोलन के महत्वपूर्ण प्रतीकों में शामिल हो गया था।
चटर्जी ने 1909 में बाल गंगाधर तिलक के राजद्रोह मुकदमे के दौरान उनके समर्थकों द्वारा ‘वंदे मातरम्’ के इस्तेमाल और 1938 में हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में राष्ट्रवादी छात्रों द्वारा इसके समर्थन में आवाज उठाए जाने का भी संदर्भ दिया।
इन उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने यह बताने की कोशिश की कि ‘वंदे मातरम्’ की ऐतिहासिक भूमिका किसी एक राजनीतिक संगठन तक सीमित नहीं रही।
1937 का कांग्रेस निर्णय फिर चर्चा में क्यों?
मौजूदा विवाद को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जोड़ते हुए सुमित्रो चटर्जी ने 1937 के घटनाक्रम का भी उल्लेख किया।
उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय मोहम्मद अली जिन्ना की आपत्तियों के बाद कांग्रेस ने ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण स्वरूप को लेकर समझौता किया था और बाद में इसके कुछ हिस्सों को ही सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया गया।
चटर्जी ने इसी प्रसंग को वर्तमान विवाद से जोड़ते हुए कांग्रेस पर “दोहरी नीति” अपनाने का आरोप लगाया।
हालांकि, इतिहास के इस पूरे प्रसंग की अलग-अलग राजनीतिक और ऐतिहासिक व्याख्याएं रही हैं। इसलिए 1937 के निर्णय को वर्तमान विवाद के साथ जोड़ना फिलहाल भाजपा विधायक का राजनीतिक तर्क है, जिसे उसी रूप में देखा जाना चाहिए।
कांग्रेस की छात्र इकाई का नारा भी बना सवाल
सुमित्रो चटर्जी ने कांग्रेस से जुड़े पश्चिम बंगाल के छात्र संगठन ‘छात्र परिषद’ के नारे का भी उल्लेख किया।
उनके मुताबिक, संगठन के सार्वजनिक नारे में ‘वंदे मातरम्’ का उल्लेख मिलता है। ऐसे में उन्होंने सवाल उठाया कि जब कांग्रेस की राज्य स्तरीय छात्र इकाई इस गीत को अपने नारे का हिस्सा बनाती है, तो पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े कार्यक्रम में इसके पूर्ण संस्करण को लेकर कथित असहजता क्यों होनी चाहिए?
यह सवाल उन्होंने कांग्रेस की कथित वैचारिक असंगति को रेखांकित करने के लिए उठाया है।
भाजपा ने सोनिया गांधी से मांगी माफी, कांग्रेस ने आरोप किया खारिज
‘वंदे मातरम्’ विवाद अब भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है।
भाजपा का आरोप है कि स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय अवसर पर ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण को लेकर आपत्ति या रोक की कोशिश भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत के प्रति असम्मान का संकेत है।
दूसरी ओर कांग्रेस ने सोनिया गांधी द्वारा ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण के गायन का विरोध किए जाने के आरोप को खारिज किया है।
इसलिए इस विवाद में फिलहाल दो अलग-अलग राजनीतिक दावे सामने हैं। निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो किसी अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए कार्यक्रम की उपलब्ध रिकॉर्डिंग, प्रत्यक्षदर्शी विवरण और आधिकारिक स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण होंगे।
‘वंदे मातरम्’ पर विवाद का राजनीतिक अर्थ
भारत में राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर होने वाली बहस अक्सर इतिहास, संस्कृति, राजनीति और पहचान के प्रश्नों से जुड़ जाती है।
‘वंदे मातरम्’ इसका एक प्रमुख उदाहरण है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन समय के साथ इसके कुछ हिस्सों को लेकर धार्मिक और राजनीतिक बहस भी सामने आती रही।
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण ‘वंदे मातरम्’ का मुद्दा केवल किसी एक कार्यक्रम में गीत गाए जाने या न गाए जाने का विषय नहीं रह जाता। इसके साथ स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत, राष्ट्रीय पहचान और राजनीतिक दलों की ऐतिहासिक दृष्टि जैसे प्रश्न भी जुड़ जाते हैं।
सुमित्रो चटर्जी की सोनिया गांधी से क्या मांग है?
अपने पत्र के अंत में चटर्जी ने सोनिया गांधी से पूरे घटनाक्रम पर आत्ममंथन करने की अपील की।
उन्होंने कहा कि कथित घटना से पश्चिम बंगाल सहित देश के लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं और इसे देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व को बिना किसी शर्त के माफी मांगनी चाहिए।
उनका कहना है कि ऐसी माफी किसी एक राजनीतिक दल या व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति और उससे जुड़े करोड़ों भारतीयों की भावनाओं के सम्मान के रूप में होनी चाहिए।
‘इतिहास किसी को माफ नहीं करता’: भाजपा विधायक की चेतावनी
सुमित्रो चटर्जी ने अपने पत्र में चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि “इतिहास किसी को माफ नहीं करता।”
उन्होंने कहा कि जो नेतृत्व स्वतंत्रता संघर्ष के प्रतीकों और मूल्यों का सम्मान करने में विफल रहता है, उसे इतिहास अंततः विस्मृति के अंधकार में धकेल देता है।
उनका यह बयान विवाद को और राजनीतिक धार देता है। भाजपा इस मुद्दे को कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका और राष्ट्रवादी विरासत से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस आरोपों को तथ्यहीन बताकर खारिज कर रही है।
निष्कर्ष:
विवाद से आगे इतिहास को समझना जरूरी
‘वंदे मातरम्’ विवाद ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े राष्ट्रीय प्रतीकों को आज की राजनीति में किस तरह देखा जाना चाहिए।
एक पक्ष इसे भारतीय राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता संघर्ष की अमूल्य विरासत मानता है, जबकि दूसरे पक्ष की राजनीतिक और ऐतिहासिक व्याख्याएं अलग हो सकती हैं। लोकतांत्रिक समाज में इन मतभेदों पर बहस स्वाभाविक है, लेकिन किसी भी विवाद का निष्कर्ष तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर निकाला जाना जरूरी है।
फिलहाल सुमित्रो चटर्जी ने सोनिया गांधी से बिना शर्त माफी की मांग कर दी है और कांग्रेस इस आरोप को खारिज कर चुकी है। ऐसे में आने वाले दिनों में कांग्रेस की ओर से विस्तृत स्पष्टीकरण और भाजपा की ओर से आगे की राजनीतिक प्रतिक्रिया इस विवाद की दिशा तय कर सकती है।
‘वंदे मातरम्’ को लेकर उठी यह बहस अंततः केवल कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक टकराव नहीं है। इसके केंद्र में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की साहित्यिक विरासत, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति और राष्ट्रीय प्रतीकों की आधुनिक राजनीति—तीनों प्रश्न एक साथ मौजूद हैं।
