नयी दिल्ली 15 अगस्त 2026 | ✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
15 अगस्त 2026। लाल किले की प्राचीर से “विकसित भारत 2047”, “अभूतपूर्व विकास” और “विश्वगुरु” के नारे गूंज रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 वर्ष पूरे होने के अवसर पर सरकारी प्रचार तंत्र विकास की उपलब्धियों की सूची थमाता नहीं थकता—जीडीपी दोगुनी, राजमार्गों का विस्तार, डिजिटल भुगतान का विस्फोट, करोड़ों बैंक खाते और आवास। लेकिन अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों की ठंडी, निष्पक्ष और कठोर रोशनी में ये नारे खोखले और अधूरे लगते हैं।
2014 से 2026 तक के इन 12 वर्षों में भारत ने कई प्रमुख वैश्विक रैंकिंगों में या तो गिरावट दर्ज की है, या निम्न-मध्यम स्तर पर अटका हुआ है। यह लेख किसी पार्टी का प्रचार या विपक्षी बयानबाजी नहीं है। यह संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, आरएसएफ, वी-डेम इंस्टीट्यूट, वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आंकड़ों पर आधारित एक निर्दयी लेकिन आवश्यक पड़ताल है।
भूख और कुपोषण: विकास की सबसे शर्मनाक रैंकिंग
ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2025 में भारत 102वें स्थान पर है (123 देशों में से)। स्कोर 25.8 — “सीरियस” श्रेणी में। बच्चे की वेस्टिंग (तीव्र दुबलापन) दर 18.7 प्रतिशत है, जो दुनिया में दूसरी सबसे खराब है। स्टंटिंग 32.9 प्रतिशत और अल्पपोषण 12 प्रतिशत (लगभग 17 करोड़ लोग)।
12 साल के “सबका साथ, सबका विकास” और करोड़ों टन अनाज उत्पादन के बावजूद करोड़ों बच्चे कुपोषित हैं। पड़ोसी बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका कई मानकों पर बेहतर स्थिति में हैं। सरकार बार-बार सूचकांक को “त्रुटिपूर्ण” और “पद्धतिगत रूप से गलत” बताती है, लेकिन आंकड़े नहीं बदलते। NFHS के आंकड़े भी बच्चे के कुपोषण की गंभीरता को रेखांकित करते हैं। जब कोई देश “विकास की कहानी” लिख रहा हो, तो भूख की रैंकिंग में 100 से नीचे होना उसकी सबसे बड़ी नैतिक और विकास संबंधी विफलता है।
प्रेस स्वतंत्रता: “विश्व की सबसे बड़ी लोकतंत्र” की शर्मनाक गिरावट
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2026 में भारत 157वें स्थान पर फिसल गया (180 देशों में से)। 2025 में यह 151 था। स्कोर महज 31.96। रिपोर्ट स्पष्ट रूप से हिंसा, कानूनी उत्पीड़न, मीडिया स्वामित्व के संकेन्द्रण, ऑनलाइन उत्पीड़न और राजनीतिक दबाव को प्रमुख कारण बताती है।
पाकिस्तान (153), बांग्लादेश (152) और नेपाल (87) भारत से बेहतर स्थान पर हैं। 2014 में भारत की रैंकिंग लगभग 140 के आसपास थी। 12 वर्षों में लगातार गिरावट हुई है। पत्रकारों पर मुकदमे, छापे, हिरासत और आत्म-सेंसरशिप की संस्कृति ने स्वतंत्र पत्रकारिता की जगह को संकुचित कर दिया है। “विश्व की सबसे बड़ी लोकतंत्र” का दावा करने वाला देश प्रेस स्वतंत्रता में दुनिया के सबसे निचले पायदानों पर खड़ा है—यह विरोधाभास किसी भी गंभीर विश्लेषण में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मानव विकास: मध्यम श्रेणी में फंसा हुआ विशाल देश
यूएनडीपी ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स (2025 रिपोर्ट, 2023 डेटा) में भारत 130वें स्थान पर है (193 देशों/क्षेत्रों में)। स्कोर 0.685 — अभी भी “मीडियम ह्यूमन डेवलपमेंट” श्रेणी में। असमानता के कारण एचडीआई में लगभग 30.7 प्रतिशत की भारी कटौती होती है, जो क्षेत्र में सबसे अधिक में से एक है।
जीवन प्रत्याशा सुधरी है (लगभग 72 वर्ष), लेकिन शिक्षा के औसत वर्ष और आय असमानता अभी भी पीछे खींच रहे हैं। श्रीलंका (89) और मालदीव (93) उच्च मानव विकास श्रेणी में हैं। प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के बावजूद व्यापक असमानता विकास के लाभों को सीमित कर रही है। जब कोई देश “विकसित भारत” का लक्ष्य रखता है, तो एचडीआई में 130वें स्थान पर होना उसकी वास्तविक स्थिति का स्पष्ट संकेत है।
लोकतंत्र: “इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी” का अंतरराष्ट्रीय ठप्पा
वी-डेम (Varieties of Democracy) इंस्टीट्यूट की डेमोक्रेसी रिपोर्ट 2026 भारत को लगातार इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी की श्रेणी में रखती है। लिबरल डेमोक्रेसी इंडेक्स पर भारत लगभग 105वें स्थान (179 देशों में से) पर है और इसमें गिरावट दर्ज हुई है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मीडिया की स्वतंत्रता, नागरिक समाज की जगह और संस्थागत नियंत्रणों में कमजोरी को रिपोर्ट प्रमुख कारण बताती है।
दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश को “लोकतंत्र” से “इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी” में वर्गीकृत करना कोई छोटी बात नहीं। वी-डेम की रिपोर्ट वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक उद्धृत लोकतंत्र मापों में से एक है। जब संस्थागत स्वतंत्रता, विपक्ष की जगह और मीडिया की आवाज संकुचित होती है, तो केवल चुनाव कराना पर्याप्त नहीं होता।
खुशी का सूचकांक: पड़ोसियों से भी पीछे
वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2026 में भारत 116वें स्थान पर है (147 देशों में)। नेपाल (99) और पाकिस्तान (104) दोनों भारत से आगे हैं। स्कोर लगभग 4.5। सामाजिक सहयोग, स्वस्थ जीवन प्रत्याशा, उदारता और भ्रष्टाचार की धारणा जैसे मानकों में कमजोरी साफ दिखती है।
आर्थिक वृद्धि के बावजूद जीवन संतुष्टि में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। जब पड़ोसी देश, जिनकी प्रति व्यक्ति आय कम है, खुशी के सूचकांक में आगे हैं, तो यह सवाल उठता है कि विकास का लाभ आम नागरिक के जीवन की गुणवत्ता में कितना उतर रहा है।
लैंगिक असमानता: गिरावट और ठहराव
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2025 में भारत 131वें स्थान पर है (148 देशों में से)। स्कोर 64.1 प्रतिशत। राजनीतिक सशक्तिकरण में गिरावट दर्ज हुई—संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी घटी और मंत्री पदों में भी कमी आई। आर्थिक भागीदारी और अवसर में भारत अभी भी निचले पायदान पर है।
बांग्लादेश (24) इस क्षेत्र में कहीं आगे है। शिक्षा में प्रगति के बावजूद राजनीतिक और आर्थिक सशक्तिकरण में ठहराव या गिरावट चिंताजनक है। “नारी शक्ति” के नारे और वास्तविक रैंकिंग के बीच की खाई साफ दिखती है।
रोजगार का संकट: युवाओं की हताशा और टूटा जनसांख्यिकीय लाभांश
आधिकारिक पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे के आंकड़ों में भी युवा (15-29 आयु वर्ग) बेरोजगारी 15-16 प्रतिशत के आसपास पहुंच चुकी है और कुछ महीनों में उच्चतम स्तर दर्ज हुआ। आजिम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026 रिपोर्ट बताती है कि ग्रेजुएट युवाओं में बेरोजगारी 35-40 प्रतिशत तक है। दो तिहाई बेरोजगार युवा डिग्रीधारक हैं।
“दो करोड़ नौकरियां हर साल” का वादा कहीं खो गया। विनिर्माण क्षेत्र का जीडीपी में हिस्सा उल्लेखनीय रूप से नहीं बढ़ा। अधिकांश नए रोजगार अनौपचारिक, असुरक्षित और कम वेतन वाले हैं। जनसांख्यिकीय लाभांश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा—युवा रोजगार—सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। आर्थिक वृद्धि के बावजूद गुणवत्तापूर्ण नौकरियों की कमी विकास मॉडल की सबसे बड़ी विफलता है।
विकास का दावा बनाम वास्तविकता: आंकड़ों का द्वंद्व
जीडीपी लगभग दोगुनी हुई, राजमार्ग नेटवर्क बढ़ा, हवाई अड्डे बढ़े, डिजिटल भुगतान में क्रांति आई, जन धन खाते खोले गए और कुछ कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार हुआ—ये तथ्य हैं और इन्हें नकारा नहीं जा सकता। लेकिन वैश्विक रैंकिंग बताती हैं कि यह विकास समावेशी, न्यायसंगत और व्यापक नहीं रहा।
भूख, बेरोजगारी, प्रेस की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक संस्थाओं की सेहत, मानव विकास और लैंगिक समानता के बुनियादी संकेतक या तो रुक गए हैं या बिगड़े हैं। “विश्वगुरु” बनने का दावा करने वाला देश हंगर इंडेक्स में 102, प्रेस फ्रीडम में 157, हैप्पीनेस में 116, एचडीआई में 130 और जेंडर गैप में 131 पर है। ये रैंकिंग कोई विदेशी षड्यंत्र नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त संस्थाओं के व्यवस्थित आंकड़े हैं।
निष्कर्ष:
आजादी के 80वें साल का सच्चा सवाल
आजादी के 80वें वर्ष पर सच्चा सवाल यह है—क्या विकास सिर्फ हाईवे, एयरपोर्ट, जीडीपी के आंकड़ों और डिजिटल लेन-देन का नाम है? या हर बच्चे को पर्याप्त पोषण, हर युवा को सम्मानजनक और स्थिर रोजगार, हर नागरिक को स्वतंत्र आवाज, हर महिला को बराबरी का अधिकार और हर लोकतांत्रिक संस्था को स्वतंत्रता भी शामिल है?
12 वर्षों बाद भी ये सवाल अनुत्तरित हैं। वैश्विक रैंकिंगें हर साल याद दिलाती रहेंगी कि केवल आर्थिक विस्तार पर्याप्त नहीं है। जब तक विकास के लाभ समाज के सबसे कमजोर हिस्से तक नहीं पहुंचते, जब तक संस्थागत स्वतंत्रता और नागरिक स्वतंत्रताएं मजबूत नहीं होतीं, तब तक “विकसित भारत” का सपना अधूरा और खोखला रहेगा।
आंकड़े झूठ नहीं बोलते। वे सिर्फ इंतजार करते हैं कि हम उन्हें गंभीरता से लें।
