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21 दिन का अनशन, फिर भी नहीं झुकी सरकार: शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर अडिग सोनम वांगचुक, लोकतांत्रिक जवाबदेही पर उठे बड़े सवाल

 दिल्ली 18  जुलाई  2026 । विस्तृत विश्लेषण |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार

नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर शुरू हुआ सोनम वांगचुक का अनिश्चितकालीन अनशन अब केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं रह गया है। 21 दिनों तक लगातार भूख हड़ताल, लगातार गिरती शारीरिक स्थिति, अस्पताल में भर्ती किए जाने की नौबत और उसके बावजूद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे या सरकार की ओर से किसी ठोस राजनीतिक पहल का अभाव

—इन घटनाओं ने इस आंदोलन को शिक्षा व्यवस्था, राजनीतिक जवाबदेही और लोकतांत्रिक संवेदनशीलता की राष्ट्रीय बहस में बदल दिया है। दिल्ली पुलिस ने स्वास्थ्य बिगड़ने और दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया, जबकि उनके समर्थकों का आरोप है कि मूल मांगों पर बातचीत करने के बजाय प्रशासनिक कार्रवाई को प्राथमिकता दी गई।

मुद्दा केवल एक इस्तीफे का नहीं, शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही का है

सोनम वांगचुक और उनके साथ जुड़े आंदोलनकारी लगातार यह कह रहे हैं कि उनकी लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ है, जिस पर राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगे। आंदोलन की प्रमुख मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की नैतिक जिम्मेदारी तय करने और परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की है। आंदोलनकारियों का तर्क है कि जब लाखों विद्यार्थियों का भविष्य प्रभावित होता है, तब केवल जांच या प्रशासनिक कार्रवाई पर्याप्त नहीं होती; लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक उत्तरदायित्व भी तय होना चाहिए।

21 दिन का अनशन और सरकार की चुप्पी ने बढ़ाए सवाल

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में भूख हड़ताल हमेशा नैतिक दबाव का सबसे प्रभावशाली माध्यम रही है। महात्मा गांधी से लेकर अनेक सामाजिक आंदोलनों तक, अनशन सत्ता और समाज दोनों का ध्यान आकर्षित करने का साधन रहा है। ऐसे में जब एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता लगातार 21 दिनों तक अनशन पर बैठा रहे, स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता जाए, डॉक्टर गंभीर चेतावनी देते रहें और इसके बावजूद सरकार की ओर से मांगों पर कोई स्पष्ट राजनीतिक प्रतिक्रिया न आए, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं। आलोचक पूछ रहे हैं कि यदि छात्रों के भविष्य जैसे संवेदनशील विषय पर भी सरकार संवाद की बजाय केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित रहती है, तो लोकतांत्रिक असहमति को किस प्रकार सुना जाएगा।

दिल्ली पुलिस की कार्रवाई बनी नया विवाद

शनिवार सुबह दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर से सोनम वांगचुक को अस्पताल पहुंचाया। पुलिस का कहना है कि यह कदम विशेषज्ञ चिकित्सकों की सलाह और दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप उठाया गया ताकि उनकी जान को खतरा न हो। वहीं आंदोलन से जुड़े लोगों ने आरोप लगाया कि वांगचुक को उनकी इच्छा के विरुद्ध हटाया गया और प्रदर्शनकारियों को भी वहां से हटाने का प्रयास किया गया। इस कार्रवाई के बाद जंतर-मंतर और सफदरजंग अस्पताल के आसपास सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी गई।

परिवार ने भी जताई आपत्ति

वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो ने अस्पताल पहुंचने के बाद सार्वजनिक रूप से कहा कि उनकी सहमति, परिवार और निजी चिकित्सकों की सलाह के बिना उन्हें कोई उपचार न दिया जाए। उनका कहना था कि पिछले कई दिनों से उनके स्वास्थ्य की निगरानी की जा रही थी और किसी भी चिकित्सकीय हस्तक्षेप में परिवार को विश्वास में लिया जाना चाहिए। इस बयान ने पूरे घटनाक्रम को और अधिक संवेदनशील बना दिया। 

जंतर-मंतर से संसद तक आंदोलन जारी रखने का ऐलान

सोनम वांगचुक को अस्पताल ले जाए जाने के बाद आंदोलन समाप्त नहीं हुआ। उनके समर्थन में अभिजीत दिपके ने स्वयं अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू करने की घोषणा की और आंदोलन को संसद मार्च तक जारी रखने का ऐलान किया। समर्थकों का कहना है कि व्यक्ति को हटाने से मुद्दा समाप्त नहीं होता, क्योंकि उनकी मूल मांग शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और सुधार की है।

देश-विदेश से मिला समर्थन, सरकार पर बढ़ा नैतिक दबाव

इस आंदोलन को केवल दिल्ली तक सीमित समर्थन नहीं मिला। अमेरिका सहित कई स्थानों पर भारतीय समुदाय और विभिन्न संगठनों ने वांगचुक के समर्थन में प्रदर्शन किए और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग दोहराई। विपक्षी दलों के कई नेताओं ने भी सरकार से संवाद शुरू करने और आंदोलन को राजनीतिक टकराव में बदलने के बजाय समाधान तलाशने की अपील की।

लोकतंत्र में सबसे बड़ा प्रश्न—संवाद या केवल प्रशासन?

यह पूरा घटनाक्रम अब केवल एक आंदोलन की कहानी नहीं रह गया है। असली प्रश्न यह है कि क्या लोकतंत्र में सरकार की पहली जिम्मेदारी विरोध करने वालों से संवाद स्थापित करना है या केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना। सरकार का पक्ष है कि जीवन की रक्षा करना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है, इसलिए चिकित्सकीय सलाह के आधार पर अस्पताल ले जाना आवश्यक था। दूसरी ओर आंदोलनकारी कहते हैं कि यदि 21 दिनों तक संवाद नहीं हुआ और अंत में केवल पुलिस कार्रवाई हुई, तो इससे लोकतांत्रिक संवाद की भावना कमजोर होती है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय भी यह रेखांकित करते रहे हैं कि राज्य का दायित्व जीवन की रक्षा करना है, साथ ही शांतिपूर्ण असहमति के अधिकार का सम्मान भी करना है।

आगे क्या?

सोनम वांगचुक फिलहाल चिकित्सकीय निगरानी में हैं और अस्पताल के अनुसार उनकी स्थिति स्थिर है, लेकिन उन्हें लगातार उपचार और निगरानी की आवश्यकता है। दूसरी ओर आंदोलनकारी संसद मार्च और आगे के विरोध कार्यक्रमों की तैयारी कर रहे हैं। सरकार ने अब तक शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के संकेत नहीं दिए हैं। ऐसे में आने वाले दिन केवल इस आंदोलन की दिशा ही तय नहीं करेंगे, बल्कि यह भी स्पष्ट करेंगे कि भारत जैसे लोकतंत्र में छात्रों के भविष्य, शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता और राजनीतिक जवाबदेही जैसे प्रश्नों का समाधान संवाद से निकलेगा या टकराव से।

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