18 जून 2026 | विस्तृत विश्लेषण |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार
कई महीनों से चले आ रहे विनाशकारी संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान ने एक अंतरिम युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस समझौते को मध्य पूर्व में शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम माना जा रहा है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ताजा बयानों ने यह संकेत भी दे दिया है कि तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।समझौते पर हस्ताक्षर के तुरंत बाद ट्रंप ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि यदि ईरान अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन नहीं करता है तो अमेरिका फिर से सैन्य कार्रवाई करने में हिचकिचाएगा नहीं। उनके इस बयान ने युद्धविराम की स्थिरता और भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
समझौते के बाद भी ट्रंप की कड़ी चेतावनी
फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका शांति चाहता है, लेकिन यदि ईरान समझौते का उल्लंघन करता है तो "हम फिर से बमबारी शुरू कर देंगे।"
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उनकी प्राथमिकता युद्ध नहीं बल्कि स्थायी शांति है। ट्रंप ने ईरानी नागरिकों को "समझदार लोग" बताते हुए कहा कि अगले 60 दिनों के दौरान दोनों देशों के वार्ताकार एक स्थायी शांति समझौते की दिशा में काम करेंगे।
ट्रंप के इन बयानों में एक दिलचस्प बदलाव भी देखने को मिला। उन्होंने पहले ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को पूरी तरह समाप्त करने की बात कही थी, लेकिन अब उन्होंने कहा कि यदि अन्य देशों के पास मिसाइलें हैं तो ईरान के पास सीमित क्षमता होना पूरी तरह अनुचित नहीं कहा जा सकता।
1979 के बाद पहली बार दोनों देशों के राष्ट्रपतियों के हस्ताक्षर
ईरान की इस्लामी क्रांति के बाद से अमेरिका और ईरान के संबंध लगातार तनावपूर्ण रहे हैं। ऐसे में यह पहली बार माना जा रहा है कि दोनों देशों के राष्ट्रपतियों ने किसी संयुक्त समझौते पर प्रत्यक्ष रूप से हस्ताक्षर किए हैं।
ईरानी सरकार ने इस समझौते को अपनी कूटनीतिक जीत के रूप में प्रस्तुत किया है। सरकारी टेलीविजन पर प्रसारित बयान में ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाक़िर क़ालिबाफ़ ने दावा किया कि जो उपलब्धियां सैन्य संघर्ष से हासिल नहीं हो सकीं, वे बातचीत की मेज पर कई गुना अधिक प्राप्त हुई हैं।
समझौते में क्या-क्या शामिल है?
14 बिंदुओं वाले इस अंतरिम समझौते के तहत अप्रैल में घोषित युद्धविराम को अगले 60 दिनों के लिए बढ़ाया गया है।
समझौते की प्रमुख शर्तों में शामिल हैं:
- अमेरिका और ईरान के बीच सभी मोर्चों पर तत्काल युद्धविराम
- होरमुज़ जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात की पूर्ण बहाली
- ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी प्रतिबंधों का अंत
- अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों में व्यापक राहत
- ईरान की अरबों डॉलर की जमी हुई विदेशी संपत्तियों को मुक्त करना
- युद्ध के बाद पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर के निवेश कोष की स्थापना
- ईरान द्वारा परमाणु हथियार नहीं बनाने की प्रतिबद्धता की पुनर्पुष्टि
- अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में समृद्ध यूरेनियम भंडार का नियंत्रित पुनर्प्रसंस्करण
हालांकि ईरान ने अपने संवर्धित यूरेनियम भंडार को देश से बाहर भेजने की अमेरिकी मांग को स्वीकार नहीं किया है।
युद्ध ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया
फरवरी में शुरू हुए इस संघर्ष ने पूरे मध्य पूर्व को अस्थिर कर दिया था। युद्ध के दौरान हजारों लोगों की जान गई, जिनमें अधिकांश नागरिक ईरान और लेबनान के थे।
इस संघर्ष के कारण:
- वैश्विक तेल कीमतों में भारी उछाल आया
- ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता बढ़ी
- मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ा
- विकासशील देशों में खाद्य संकट की आशंकाएं गहरा गईं
युद्धविराम की खबर के बाद अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में राहत देखने को मिली और ब्रेंट क्रूड की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। हालांकि ट्रंप की नई चेतावनियों के बाद बाजार में फिर कुछ अस्थिरता लौट आई।
क्या वास्तव में अमेरिका ने अपने लक्ष्य हासिल किए?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि युद्ध के बावजूद अमेरिका अपने कई घोषित उद्देश्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर सका।
युद्ध शुरू होने से पहले ट्रंप प्रशासन ने दावा किया था कि वह:
- ईरान की मिसाइल क्षमता नष्ट करेगा
- उसके परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करेगा
- क्षेत्रीय प्रभाव को कमजोर करेगा
लेकिन वर्तमान स्थिति में:
- ईरान की सरकार सत्ता में बनी हुई है
- उसके मिसाइल कार्यक्रम का पूर्ण विनाश नहीं हुआ
- संवर्धित यूरेनियम भंडार अभी भी देश के भीतर मौजूद है
- लेबनान के हिज्बुल्लाह जैसे सहयोगी संगठनों के साथ उसके संबंध जारी हैं
दूसरी ओर, ईरान को आर्थिक प्रतिबंधों से राहत और अरबों डॉलर की संपत्तियों की वापसी जैसी महत्वपूर्ण उपलब्धियां मिलने की संभावना बढ़ गई है।
जी-7 देशों ने समझौते का किया स्वागत
फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, जापान, इटली, कनाडा और अमेरिका सहित जी-7 देशों के नेताओं ने इस समझौते का स्वागत किया है।
इन देशों ने संयुक्त बयान जारी करते हुए लेबनान में भी तत्काल और स्थायी युद्धविराम की मांग की। उनका कहना है कि यदि लेबनान में हिंसा जारी रहती है तो पूरे क्षेत्र की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
लेबनान बना नई चुनौती
हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता हो गया है, लेकिन लेबनान में संघर्ष पूरी तरह नहीं रुका है।
इजरायल ने दक्षिणी लेबनान में ताजा हवाई हमले किए हैं, जबकि सुरक्षा सूत्रों के अनुसार हिज्बुल्लाह ने भी इजरायली सैन्य ठिकानों पर ड्रोन हमले किए हैं।
इजरायल का कहना है कि वह अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सैन्य कार्रवाई जारी रखने का अधिकार सुरक्षित रखता है।
नेतन्याहू और ट्रंप के बीच मतभेद उभरे
समझौते के बाद एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया जब ट्रंप ने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के रुख पर सार्वजनिक टिप्पणी की।
ट्रंप ने कहा कि नेतन्याहू "कभी-कभी जरूरत से ज्यादा आक्रामक हो जाते हैं" और लेबनान में सैन्य कार्रवाई को अधिक संयमित तरीके से संचालित किया जाना चाहिए।
विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और इजरायल के बीच यह मतभेद आने वाले महीनों में मध्य पूर्व की राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं।
शांति की शुरुआत या नए संकट की भूमिका?
अमेरिका और ईरान के बीच हुआ यह समझौता निश्चित रूप से पिछले कई दशकों के सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रमों में से एक माना जा रहा है। लेकिन इसके साथ ही कई चुनौतियां भी मौजूद हैं।
ट्रंप की नई सैन्य चेतावनियां, लेबनान में जारी संघर्ष, इजरायल की आपत्तियां और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े अनसुलझे मुद्दे यह संकेत देते हैं कि यह समझौता अभी अंतिम समाधान नहीं है।
आने वाले 60 दिन तय करेंगे कि क्या यह समझौता मध्य पूर्व में स्थायी शांति का आधार बनेगा या फिर क्षेत्र एक बार फिर सैन्य टकराव की ओर बढ़ेगा। फिलहाल दुनिया की निगाहें वॉशिंगटन, तेहरान, तेल अवीव और बेरूत पर टिकी हुई हैं।
