संभल, 31 मई 2026।विस्तृत विश्लेषण |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार
रविवार, 31 मई 2026 को संभल के प्रतिष्ठित विक्रम पैलेस में डॉ. उमेश चंद्र सक्सेना के जीवन, संघर्ष, सेवा और समर्पण पर आधारित पुस्तक "पितामह" के भव्य विमोचन समारोह का आयोजन किया गया। यह आयोजन केवल एक पुस्तक के विमोचन तक सीमित नहीं था, बल्कि यह संभल की सामूहिक स्मृतियों, भावनाओं और कृतज्ञता का ऐसा उत्सव बन गया जिसमें शहर और बाहर से आए सैकड़ों गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लेकर इस ऐतिहासिक क्षण को यादगार बना दिया।
जब एक पुस्तक बन गई पूरे शहर की भावनाओं का आईना
समारोह में उपस्थित लोगों का मानना था कि "पितामह" केवल एक जीवनी नहीं, बल्कि संभल के सामाजिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। पुस्तक की लेखिका दीपा गुप्ता ने अपने संबोधन में बताया कि इस पुस्तक को तैयार करने में उन्हें पूरे तीन वर्षों का समय लगा।
उन्होंने कहा कि डॉ. उमेश चंद्र सक्सेना के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को समझने, उनके जीवन से जुड़े लोगों से मिलने, उनके संघर्षों और सेवा कार्यों को संकलित करने में लंबा समय लगा। पुस्तक में न केवल उनके चिकित्सकीय जीवन को दर्ज किया गया है, बल्कि उनके मानवीय, साहित्यिक और सामाजिक व्यक्तित्व को भी बेहद बारीकी से प्रस्तुत किया गया है।
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| पितामह डॉक्टर उमेश चंद्र सक्सेना , दीपा गुप्ता जी , प्रमोद कृष्णम श्रोताओं के साथ बैठे हुए , अपनी जमीन से जुड़े महा मानव |
दीपा गुप्ता जी ने बताया कि जब लगभग चार दशक पहले संभल में आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं बेहद सीमित थीं और MBBS डॉक्टरों की भारी कमी थी, तब डॉ. सक्सेना ने इस क्षेत्र की जनता के लिए आशा की किरण बनकर कार्य किया। उन्होंने चिकित्सा को व्यवसाय नहीं बल्कि सेवा का माध्यम बनाया।
जिस डॉक्टर ने पूरी उम्र फीस नहीं ली, उसे ‘पितामह’ कहना क्यों उचित है?
समारोह में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि डॉ. उमेश चंद्र सक्सेना का जीवन आज के समय में एक मिसाल है।
बताया गया कि उन्होंने अपने चिकित्सकीय जीवन में हजारों मरीजों का उपचार किया, लेकिन कभी चिकित्सा को धन अर्जित करने का साधन नहीं बनाया। वे मरीजों से केवल दवाइयों का खर्च लेते थे और अनेक जरूरतमंदों का निःशुल्क उपचार करते थे।
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मीडिया से रु बा रु होते हुए श्री प्रमोद कृष्णम |
संभल की गलियों, मोहल्लों और गांवों में आज भी ऐसे असंख्य परिवार मिल जाएंगे जिनके किसी सदस्य का जीवन कभी न कभी डॉ. सक्सेना के उपचार और मार्गदर्शन से जुड़ा रहा है।
वक्ताओं ने कहा कि जो व्यक्ति अपना पूरा जीवन समाज की सेवा, करुणा और मानवता के नाम कर दे, जो पीढ़ियों को स्वास्थ्य, विश्वास और उम्मीद प्रदान करे, उसे "पितामह" कहने से अधिक उपयुक्त संबोधन शायद कोई और नहीं हो सकता।
गणमान्य अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति ने बढ़ाई समारोह की शोभा
इस ऐतिहासिक आयोजन में समाज, प्रशासन, न्यायपालिका, चिकित्सा, साहित्य और पत्रकारिता जगत की अनेक प्रतिष्ठित हस्तियों ने भाग लिया।
समारोह में प्रमुख रूप से उपस्थित रहे:
आचार्य प्रमोद कृष्णम
अहमद उल्लाह खान
कुलदीप सिंह
डॉ. तरुण पाठक
निधि पटेल
कुलदीप कुमार
तरन्नुम अकील
हकीम कौसर
डॉ. अरविन्द
मीर शाह हुसैन आरिफ
मुज़म्मिल दानिश
ज़ियाउस सहर रज़्ज़ाक़ी
मिस्बाह उर रेहमान मिस्बाही
नाज़िश खान
इन सभी वक्ताओं ने डॉ. सक्सेना के व्यक्तित्व और उनके योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला तथा उनके जीवन को नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत बताया।
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| पूर्व चेपेर्सन श्रीमती तरन्नुम अक़ील मंच पर अपना वक्तव्य पेश करते हुए |
साहित्य प्रेमी, सरल स्वभाव और सेवा भावना के प्रतीक हैं डॉ. सक्सेना
समारोह के दौरान वक्ताओं ने केवल उनके चिकित्सा क्षेत्र के योगदान का ही उल्लेख नहीं किया, बल्कि उनके साहित्य प्रेम, विनम्र व्यवहार, सामाजिक सौहार्द और मानवीय दृष्टिकोण की भी मुक्त कंठ से प्रशंसा की।
कई वक्ताओं ने कहा कि डॉ. सक्सेना उन दुर्लभ व्यक्तित्वों में शामिल हैं जिनके पास ज्ञान है, प्रतिष्ठा है, सम्मान है, लेकिन फिर भी उनमें अहंकार का नामोनिशान नहीं है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सादगी और महानता साथ-साथ चल सकती हैं।
जब मंच पर बोलते-बोलते भावुक हो गए डॉ. उमेश चंद्र सक्सेना
समारोह का सबसे भावुक क्षण तब आया जब स्वयं डॉ. उमेश चंद्र सक्सेना को अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित किया गया।
अपने जीवन पर लिखी गई पुस्तक, उपस्थित जनसमूह के स्नेह और सम्मान तथा लोगों द्वारा व्यक्त की गई भावनाओं को सुनकर वे भाव-विभोर हो उठे। कुछ क्षणों के लिए उनकी आवाज़ भर्रा गई और उनकी आंखों में नमी स्पष्ट दिखाई दी।
पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। यह वह क्षण था जब एक डॉक्टर और समाजसेवी के रूप में बिताए गए दशकों के परिश्रम और सेवा को लोगों की श्रद्धा के रूप में लौटते हुए देखा जा सकता था।
संगीत, अपनापन और खुशियों के साथ हुआ कार्यक्रम का समापन
कार्यक्रम के अंत में माहौल और भी आत्मीय हो गया जब आचार्य प्रमोद कृष्णम, डॉ. उमेश चंद्र सक्सेना तथा उनके परिवार के सदस्य मंच पर एक साथ आए।
औपचारिक भाषणों के बाद वातावरण संगीत और आत्मीयता से भर गया। सभी ने मिलकर गीत गाए, पुरानी यादें साझा कीं और खुशी के उन पलों को जिया जो लंबे समय तक उपस्थित लोगों की स्मृतियों में बने रहेंगे।
सभागार में मौजूद लोग इस बात के साक्षी बने कि सम्मान केवल पुरस्कारों और प्रशस्ति पत्रों से नहीं मिलता, बल्कि लोगों के दिलों में बनाई गई जगह ही किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।
एक पुस्तक से कहीं अधिक है ‘पितामह’
"पितामह" केवल डॉ. उमेश चंद्र सक्सेना की जीवनी नहीं है। यह उस युग की कहानी है जब चिकित्सा सेवा को मिशन माना जाता था, जब समाज सेवा प्रसिद्धि के लिए नहीं बल्कि इंसानियत के लिए की जाती थी, और जब एक व्यक्ति अपने कर्मों से पूरे शहर की पहचान बन जाता था।
संभल के इतिहास में 31 मई 2026 का यह दिन केवल एक पुस्तक विमोचन समारोह के रूप में नहीं, बल्कि उस महान चिकित्सक के प्रति शहर की सामूहिक श्रद्धांजलि के रूप में याद किया जाएगा, जिसने अपना पूरा जीवन लोगों के स्वास्थ्य, सुख और सेवा के नाम समर्पित कर दिया।
डॉ. उमेश चंद्र सक्सेना वास्तव में संभल के लिए केवल एक चिकित्सक नहीं, बल्कि एक संस्था, एक प्रेरणा और सही मायनों में "पितामह" हैं।
Note - जल्दी ही पुस्तक समीक्षा (तन्क़ीदी मुताला ) किताब के अहम पहुलओं के साथ www.anthought.com पर पब्लिश किया जायेगा

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