दिल्ली, 14 जून 2026।विस्तृत विश्लेषण |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार
यह लेख गहन शोध, ऐतिहासिक संदर्भ, चुनावी भाषणों, रिपोर्ट्स और विशेषज्ञ विश्लेषण पर आधारित है। उद्देश्य न किसी दल की निंदा करना है, बल्कि समस्या की जड़ों को समझना और संवाद को प्रोत्साहित करना है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: विभाजन की जड़ें
ब्रिटिश “Divide and Rule” नीति ने हिंदू-मुस्लिम विभाजन को संस्थागत रूप दिया। 1909 के Morley-Minto Reforms से लेकर 1947 के विभाजन तक, धर्म को राजनीतिक हथियार बनाया गया। स्वतंत्र भारत में भी, 1980-90 के दशक में राम मंदिर आंदोलन ने सांप्रदायिक राजनीति को नई ऊंचाई दी।
BJP की स्थापना 1980 में हुई, लेकिन 1990 के राम रथ यात्रा और 1992 के बाबरी विध्वंस ने पार्टी को हिंदुत्व की मुख्यधारा में स्थापित किया। 2014 के बाद, मोदी युग में हिंदुत्व को विकास के साथ जोड़कर एक नया नैरेटिव बनाया गया — “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास”। लेकिन आलोचकों के अनुसार, चुनावी मौकों पर यह नैरेटिव धार्मिक अपील में बदल जाता है।
“बंटोगे तो कटोगे” – एकता या ध्रुवीकरण?
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नारा “बंटोगे तो कटोगे, एक रहोगे तो नेक रहोगे” BJP की चुनावी रणनीति का प्रमुख हिस्सा रहा। यह नारा 2024 हरियाणा और महाराष्ट्र चुनावों से पहले खासा चर्चित हुआ।
- संदर्भ: योगी ने इसे एकता का संदेश बताया, लेकिन विपक्ष ने इसे हिंदू-मुस्लिम विभाजन का कोड वर्ड माना। PM मोदी ने भी इसका समर्थन किया और कहा कि बंटने वाले “महफिल सजाएंगे”।
- विश्लेषण: यह नारा ऐतिहासिक विभाजन (1947) की याद दिलाता है, जहां मुसलमानों को “बंटने” वाला बताया जाता है। Carnegie Endowment और LSE जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट्स में कहा गया कि BJP हिंदू एकजुटता के नाम पर अल्पसंख्यकों को “अन्य” (other) बनाती है, जिससे वोट कंसोलिडेशन होता है।
यह नारा विकास या अर्थव्यवस्था पर बहस के बजाय “हिंदू खतरे में है” का भाव जगाता है, जो ध्यान भटकाने का प्रभावी तरीका है।
“मंगलसूत्र छीन लेंगे” – 2024 चुनाव का विवादास्पद बयान
2024 लोकसभा चुनाव के दौरान राजस्थान के बांसवाड़ा रैली में PM मोदी का बयान सबसे चर्चित रहा: “कांग्रेस मंगलसूत्र तक छीन लेगी”।
- संदर्भ: मोदी ने कांग्रेस के वेल्थ रिडिस्ट्रीब्यूशन (संपत्ति पुनर्वितरण) के विचार को लेकर कहा कि वे महिलाओं का सोना, मंगलसूत्र छीनकर “घुसपैठियों” और “ज्यादा बच्चे वाले” (मुस्लिमों का इशारा) को बांट देंगे। मनमोहन सिंह के पुराने बयान (“मुस्लिमों का पहला हक”) को भी जोड़ा गया।
- प्रभाव: यह बयान हिंदू महिलाओं में भय पैदा करने वाला था। India Today और NDTV की रिपोर्ट्स में इसे महिलाओं को target करने वाली potent strategy बताया गया। Congress ने इसे झूठा और विभाजनकारी करार दिया।
यह बयान बेरोजगारी (युवा बेरोजगारी दर ~8-10%), महंगाई, किसान संकट और GDP slowdown जैसे मुद्दों से ध्यान हटाने में सफल रहा।
BJP नेताओं द्वारा धर्म-आधारित रणनीति: प्रमुख उदाहरण
BJP के कई नेताओं ने ऐसे बयान दिए हैं:
- गौ-रक्षा और लव जिहाद: कई राज्यों में कानून बनाकर अल्पसंख्यकों को target किया गया।
- CAA-NRC: 2019 में Citizenship Amendment Act ने धर्म के आधार पर नागरिकता का प्रावधान किया, जिससे बड़े प्रदर्शन हुए।
- मंदिर-मस्जिद: अयोध्या राम मंदिर का उद्घाटन चुनावी timing में।
- हेट स्पीच: UN और USCIRF रिपोर्ट्स में BJP नेताओं को hate speech से जोड़ा गया। Bulldozer राज, “80 vs 20”, “Shamshan vs Kabristan” जैसे नारे।
Carnegie और अन्य अध्ययनों में पाया गया कि 2014 के बाद सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में वृद्धि हुई, हालांकि बड़े दंगे कम हुए।
ध्यान भटकाने की रणनीति: क्यों काम करती है?
- चुनावी गणित: Pew Research और CSDS-Lokniti सर्वे दिखाते हैं कि धार्मिक पहचान मजबूत होने से BJP को हिंदू वोट कंसोलिडेट होते हैं।
- मीडिया और सोशल मीडिया: Algorithm और polarized content ध्यान भटकाते हैं।
- आर्थिक असफलताओं से बचाव: बेरोजगारी, किसान संकट, GDP में मंदी, inequality (Oxfam रिपोर्ट) जैसे मुद्दों पर जब सवाल उठते हैं, तो “हिंदू खतरे में” का नैरेटिव आ जाता है।
- विपक्ष की भूमिका: Congress और क्षेत्रीय दलों ने भी “मुस्लिम तुष्टीकरण” का आरोप झेला, लेकिन BJP ने इसे बड़े पैमाने पर systematize किया।
प्रभाव: समाज और राष्ट्र पर
- सामाजिक: Segregation बढ़ी, interfaith विवाह पर हमले, लिंचिंग की घटनाएं।
- आर्थिक: निवेश प्रभावित, युवा ऊर्जा नफरत में बर्बाद।
- लोकतंत्र: Secularism पर सवाल, संस्थाओं पर दबाव।
- वैश्विक छवि: India की pluralistic image धूमिल।
संतुलित दृष्टि: क्या केवल BJP?
सभी दल identity politics करते हैं। Congress का “सॉफ्ट हिंदुत्व”, क्षेत्रीय दलों की जातिवादी राजनीति भी समस्या है। लेकिन सत्ता में BJP की मजबूत स्थिति ने इसे dominant narrative बना दिया।
समाधान: आगे का रास्ता
- राजनीतिक सुधार: हेट स्पीच पर सख्त कानून, चुनाव सुधार।
- शिक्षा: पाठ्यक्रम में संवैधानिक मूल्य, भक्ति-सूफी परंपरा।
- आर्थिक समावेशन: रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य पर फोकस — नफरत का सबसे बड़ा दुश्मन विकास है।
- मीडिया जिम्मेदारी: Fact-checking, balanced reporting।
- नागरिक जागरूकता: मुद्दों पर वोट, न कि भावनाओं पर।
निष्कर्ष:-
धर्म और नफरत की राजनीति भारत की एकता, प्रगति और संवैधानिक मूल्यों को कमजोर करती है। “बंटोगे तो कटोगे” या “मंगलसूत्र छीन लेंगे” जैसे बयान महत्वपूर्ण मुद्दों — बेरोजगारी, महंगाई, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य सुधार — से ध्यान भटकाते हैं।
भारत को “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना से आगे बढ़ना चाहिए। नेतृत्व को विकास की राजनीति अपनानी होगी, जहां धर्म सद्भाव का आधार बने, न कि विभाजन का। जनता को जागरूक होकर मुद्दों पर सवाल पूछने होंगे।
परिवर्तन संभव है — यदि हम तथ्यों को भावनाओं से ऊपर रखें। यह लेख खुली बहस को आमंत्रित करता है। सच्चा राष्ट्रवाद विकास और समानता में है, न कि विभाजन में।
