दिल्ली , 13 जून 2026।विस्तृत विश्लेषण |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता Meenakshi Natarajan को बड़ा झटका देते हुए मध्य प्रदेश से उनके राज्यसभा नामांकन पत्र को निरस्त किए जाने के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है। हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि उनके पास अब भी चुनाव याचिका (Election Petition) दाखिल करने का कानूनी विकल्प खुला हुआ है।
न्यायमूर्ति Prashant Kumar Mishra और न्यायमूर्ति A. S. Chandurkar की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 329 का हवाला देते हुए कहा कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान न्यायालय की रिट अधिकारिता सीमित है और इस प्रकार की चुनौती सीधे रिट याचिका के माध्यम से स्वीकार नहीं की जा सकती।
क्या है पूरा मामला?
मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन 9 जून को रिटर्निंग ऑफिसर अरविंद शर्मा द्वारा खारिज कर दिया गया था।
नामांकन निरस्त करने का आधार यह बताया गया कि नटराजन ने अपने नामांकन पत्र के साथ दाखिल किए गए फॉर्म-26 के शपथपत्र में तेलंगाना की एक अदालत में लंबित निजी आपराधिक शिकायत (Private Complaint) का उल्लेख नहीं किया था, जबकि उन्हें उस मामले में समन प्राप्त हो चुका था।
नामांकन रद्द होने के बाद नटराजन ने सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और रिट याचिका दायर कर निर्णय को चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों नहीं दी राहत?
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह प्रश्न प्रमुख रूप से उठा कि क्या चुनावी प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद और परिणाम घोषित होने से पहले सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 32 के तहत हस्तक्षेप कर सकता है?
पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि संविधान का अनुच्छेद 329 चुनावी मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप पर विशेष प्रतिबंध लगाता है। यदि अदालत कुछ मामलों को “स्पष्ट त्रुटि” मानकर सुनने लगे और अन्य मामलों को चुनाव याचिका के लिए छोड़ दे, तो यह संविधान में ऐसा सिद्धांत जोड़ने जैसा होगा जिसका कहीं उल्लेख नहीं है।
अदालत ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े विवादों के समाधान के लिए विधायिका ने पहले से ही चुनाव याचिका का तंत्र उपलब्ध कराया है और सामान्यतः उसी मार्ग का अनुसरण किया जाना चाहिए।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष (Merits) पर कोई टिप्पणी नहीं की है और भविष्य में चुनाव याचिका के दौरान सभी कानूनी प्रश्न खुले रहेंगे।
अभिषेक मनु सिंघवी ने क्या दलीलें दीं?
मीनाक्षी नटराजन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Abhishek Manu Singhvi ने जोरदार दलीलें पेश कीं।
सिंघवी ने अदालत को बताया कि Representation of the People Act की धारा 33A के अनुसार उम्मीदवार को केवल उन्हीं आपराधिक मामलों का खुलासा करना होता है जिनमें सक्षम अदालत आरोप तय (Charge Framed) कर चुकी हो।
उनका कहना था कि नटराजन के मामले में न तो आरोप तय हुए हैं और न ही अदालत ने अभी तक विधिवत संज्ञान (Cognizance) लिया है।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita की धारा 223 के तहत निजी शिकायतों में किसी व्यक्ति को आरोपी बनाने से पहले उसे नोटिस देकर सुनवाई का अवसर देना आवश्यक है।
सिंघवी के अनुसार नटराजन को केवल नोटिस मिला था, जबकि मामला अभी प्रारंभिक चरण में है।
"यदि संज्ञान ही नहीं तो मामला कहाँ?"
सिंघवी ने अदालत के समक्ष कहा कि यदि किसी शिकायत पर अदालत ने अभी संज्ञान नहीं लिया है तो विधि की दृष्टि में वह मुकदमा अस्तित्व में ही नहीं माना जा सकता।
उन्होंने आगे कहा कि मान भी लिया जाए कि संज्ञान लिया गया है, तब भी कानून केवल उन मामलों के खुलासे की मांग करता है जिनमें आरोप तय किए जा चुके हों।
उनके अनुसार रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा नामांकन निरस्त करने का निर्णय "मनमाना, असंगत और न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत" है।
सिंघवी ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि इस प्रकार के निर्णयों के जरिए चुनावी मैदान में समान अवसर (Level Playing Field) समाप्त कर दिया जाएगा, तो देश में निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा ही प्रभावित हो सकती है।
तेलंगाना शिकायत का विवाद
सुनवाई के दौरान सिंघवी ने उस निजी शिकायत की पृष्ठभूमि भी अदालत के सामने रखी।
उन्होंने बताया कि मूल शिकायत किसी अन्य व्यक्ति पर कथित छेड़छाड़ (Molestation) के आरोपों से संबंधित है। शिकायतकर्ता ने मीनाक्षी नटराजन को चौथे आरोपी के रूप में केवल इस आधार पर शामिल किया कि उन्होंने कांग्रेस की तेलंगाना प्रभारी होने के बावजूद कथित आरोपी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की।
सिंघवी ने यह भी बताया कि कथित घटना वर्ष 2022 की है, जबकि नटराजन को तेलंगाना कांग्रेस का प्रभारी काफी बाद में, वर्ष 2025 में नियुक्त किया गया था।
ऐसे में उनके खिलाफ आपराधिक उत्तरदायित्व तय करना स्वयं में विवादास्पद प्रश्न है।
चुनाव आयोग की भूमिका पर भी उठे सवाल
सिंघवी ने अदालत को बताया कि इस मुद्दे पर Election Commission of India से भी संपर्क किया गया था, लेकिन आयोग की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं मिली।
इस बीच राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो गई और अन्य उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिए गए।
यही कारण था कि कांग्रेस नेता ने तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की थी।
मोहिंदर सिंह गिल फैसले का हवाला
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि कुछ विशेष परिस्थितियों में अदालत चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए हस्तक्षेप कर सकती है।
इसके लिए सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय Mohinder Singh Gill v. Chief Election Commissioner का उल्लेख किया और कहा कि न्यायालय का हस्तक्षेप चुनाव प्रक्रिया को बाधित करने के लिए नहीं बल्कि उसे निष्पक्ष और वैध बनाए रखने के लिए भी हो सकता है।
हालांकि पीठ इस तर्क से सहमत नहीं हुई और उसने संवैधानिक प्रतिबंधों को प्राथमिकता देते हुए याचिका को विचारणीय नहीं माना।
फैसले का व्यापक महत्व
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय एक बार फिर उस स्थापित संवैधानिक सिद्धांत को मजबूत करता है कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान न्यायालय आम तौर पर प्रत्यक्ष हस्तक्षेप से बचते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि चुनाव संबंधी विवादों के समाधान के लिए चुनाव याचिका ही प्राथमिक और वैधानिक मंच है। साथ ही अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया कि मीनाक्षी नटराजन के सभी कानूनी अधिकार सुरक्षित रहें और वे चुनाव याचिका के माध्यम से अपने दावे को आगे बढ़ा सकें।
निष्कर्ष:-
मीनाक्षी नटराजन को तत्काल राहत भले ही नहीं मिली हो, लेकिन कानूनी लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले के तथ्यों और नामांकन निरस्तीकरण की वैधता पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की है। अब यह विवाद चुनाव याचिका के माध्यम से आगे बढ़ सकता है, जहां यह तय होगा कि रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा नामांकन रद्द करने का निर्णय वास्तव में कानून के अनुरूप था या नहीं।
यह मामला केवल एक उम्मीदवार के नामांकन का विवाद नहीं है, बल्कि चुनावी पारदर्शिता, उम्मीदवारों द्वारा आपराधिक मामलों के खुलासे की सीमा, और चुनावी प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप की संवैधानिक सीमाओं जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों को भी सामने लाता है।
