नई दिल्ली | 24 अप्रैल 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में रिकॉर्ड 92 प्रतिशत मतदान और अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण माहौल पर सुप्रीम कोर्ट ने संतोष और खुशी जाहिर की। अदालत ने इसे लोकतंत्र की मजबूती का संकेत बताया और कहा कि जब लोग वोट की ताकत समझते हैं, तब हिंसा कम होती है।
लेकिन इसी खुशी के बीच कई ऐसे सवाल भी हैं जो देश के एक बड़े तबके के मन में लगातार उठ रहे हैं — और शायद लंबे समय तक उठते रहेंगे।
सवाल यह है कि क्या केवल भारी मतदान प्रतिशत ही स्वस्थ लोकतंत्र का प्रमाण है? या फिर लोकतंत्र की असली कसौटी यह भी है कि हर नागरिक का वोट सुरक्षित रहे, निष्पक्षता बनी रहे और चुनाव प्रक्रिया पर सभी समुदायों का भरोसा कायम रहे?
“92 लाख वोट काटे गए” — विपक्ष और सामाजिक संगठनों के आरोप
चुनावी प्रक्रिया को लेकर लगातार आरोप लगाए जा रहे हैं कि एक विशेष समुदाय से जुड़े लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए। विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों का दावा है कि लगभग 92 लाख वोट प्रभावित हुए, जिनमें गरीब, प्रवासी मजदूर, अल्पसंख्यक समुदाय और यहां तक कि पूर्व सैनिकों के नाम भी शामिल बताए जा रहे हैं।
सोशल मीडिया और कई जनसभाओं में ऐसे मामलों का उल्लेख हुआ, जहां ऐसे लोगों के नाम वोटर लिस्ट से गायब पाए गए जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश की सेवा में लगा दिया। कुछ उदाहरणों में उन पूर्व सैनिकों का भी जिक्र हुआ जिन्होंने भारतीय सेना में 20 से 26 वर्ष तक सेवा दी, लेकिन मतदान के दिन पता चला कि उनका नाम सूची में नहीं है।
यही वह बिंदु है जहां लोकतंत्र की तस्वीर केवल “उच्च मतदान प्रतिशत” से आगे बढ़कर संवेदनशील सवालों तक पहुंच जाती है।
क्या सिर्फ मतदान प्रतिशत ही लोकतंत्र की जीत है?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने बयान में कहा कि जब लोग लोकतंत्र और वोट की ताकत समझते हैं तो हिंसा कम होती है। यह बात सिद्धांत रूप से बेहद महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक है।
लेकिन आलोचकों का कहना है कि लोकतंत्र केवल वोट डालने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी जरूरी है कि हर योग्य नागरिक बिना किसी भेदभाव के वोट डाल सके। यदि बड़ी संख्या में लोगों के नाम सूची से हटने के आरोप लग रहे हैं, तो उस पर निष्पक्ष और पारदर्शी जांच भी उतनी ही जरूरी है।
धार्मिक भाषणों पर कार्रवाई का सवाल
देश में चुनावी सभाओं के दौरान धर्म, जाति और समुदाय आधारित भाषणों को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है। संविधान और चुनावी कानून स्पष्ट रूप से धर्म के नाम पर वोट मांगने को गलत मानते हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि व्यवहारिक स्तर पर कार्रवाई बहुत कम दिखाई देती है।
यही वजह है कि अब यह सवाल भी उठ रहा है:
क्या सुप्रीम कोर्ट कभी चुनावी मंचों से धार्मिक बयान देने वाले नेताओं को वास्तविक और कठोर सजा दिलवा पाएगा?
क्योंकि हर चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण के आरोप लगते हैं, लेकिन सजा या निष्कर्ष तक पहुंचने वाले मामले बेहद कम दिखाई देते हैं।
क्या चुनावी गड़बड़ियों की JPC जांच होगी?
चुनावी पारदर्शिता को लेकर अब एक और बड़ी मांग उभर रही है — क्या चुनावी अनियमितताओं, वोटर लिस्ट विवादों और प्रशासनिक शिकायतों की जांच के लिए सभी दलों के सांसदों वाली संयुक्त संसदीय समिति (JPC) बनाई जाएगी?
कई लोकतांत्रिक चिंतकों का मानना है कि यदि संसद की संयुक्त समिति निष्पक्ष जांच करे, तो जनता का भरोसा और मजबूत हो सकता है। लेकिन राजनीतिक वास्तविकता यह है कि ऐसी मांगें अक्सर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच दब जाती हैं।
अब सवाल उठ रहा है:
क्या देश की संस्थाएं इतनी हिम्मत दिखाएंगी कि चुनावी गड़बड़ियों की व्यापक और निष्पक्ष जांच कराई जा सके?
लोकतंत्र में सवाल उठना भी जरूरी
लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं, बल्कि जनता के भरोसे को बनाए रखने की प्रक्रिया है। अदालतों की प्रशंसा, भारी मतदान और शांतिपूर्ण चुनाव निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत हैं, लेकिन इसके साथ-साथ जनता के मन में उठ रहे सवालों को सुनना भी उतना ही जरूरी है।
क्योंकि जब सवाल दबाए जाते हैं, तब अविश्वास बढ़ता है। और जब सवालों का जवाब पारदर्शिता से दिया जाता है, तभी लोकतंत्र मजबूत होता है।
आज देश में यही बहस तेज हो रही है —
क्या लोकतंत्र केवल आंकड़ों की जीत है, या न्याय, समानता और निष्पक्षता की भी परीक्षा है?
और शायद इसी वजह से यह कहा जा रहा है:
“सवाल तो उठते रहेंगे…”
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