25 अप्रैल 2026 | विस्तृत विश्लेषण |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार
मध्य पूर्व एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है जहाँ हर गुजरता घंटा दुनिया को बड़े युद्ध की ओर धकेलता महसूस हो रहा है। इज़राइल और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव अब केवल मिसाइलों, ड्रोन हमलों और सीमा संघर्षों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह विश्व राजनीति, NATO की एकता, वैश्विक तेल बाज़ार, इस्लामी दुनिया की कूटनीति और महाशक्तियों की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन चुका है।
इसी उथल-पुथल के बीच पाकिस्तान अचानक अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का नया मंच बनकर उभरा है। दुनिया की निगाहें इस्लामाबाद पर टिक गई हैं, जहाँ अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल और ईरानी नेतृत्व के बीच संभावित वार्ता को लेकर तेज हलचल देखी जा रही है। हालांकि, पाकिस्तान पहुंचते ही ईरान ने साफ कर दिया कि वह अमेरिका के साथ किसी भी प्रकार की प्रत्यक्ष बातचीत नहीं करेगा।
यह बयान ऐसे समय आया है जब व्हाइट हाउस ने अपने विशेष दूतों को पाकिस्तान भेजने की आधिकारिक पुष्टि कर दी है। इससे यह साफ हो गया है कि पर्दे के पीछे कूटनीतिक गतिविधियाँ बेहद तेजी से चल रही हैं, भले ही सार्वजनिक रूप से दोनों पक्ष कठोर रुख अपनाए हुए हों।
पाकिस्तान पहुंचते ही ईरान का बड़ा ऐलान
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची शुक्रवार देर रात पाकिस्तान पहुंचे। उनके इस दौरे को लेकर पहले से ही अटकलें लगाई जा रही थीं कि इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच किसी प्रकार की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष वार्ता हो सकती है।
लेकिन पाकिस्तान पहुंचने के कुछ ही देर बाद ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर स्पष्ट संदेश देते हुए कहा:
“ईरान और अमेरिका के बीच किसी प्रकार की प्रत्यक्ष बैठक निर्धारित नहीं है।”
उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान केवल एक “मध्यस्थ चैनल” की भूमिका निभाएगा और दोनों देशों के बीच संदेशों का आदान-प्रदान करेगा।
ईरान ने पाकिस्तान सरकार की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस्लामाबाद क्षेत्रीय शांति और “अमेरिकी आक्रामक युद्ध” को समाप्त करने के लिए कूटनीतिक प्रयास कर रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ईरान सार्वजनिक रूप से अमेरिका के साथ प्रत्यक्ष वार्ता स्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि इससे उसकी घरेलू राजनीति और “प्रतिरोध की छवि” प्रभावित हो सकती है। इसलिए तेहरान फिलहाल बैकचैनल डिप्लोमेसी को प्राथमिकता दे रहा है।
ट्रंप प्रशासन की नई रणनीति
व्हाइट हाउस ने पुष्टि की है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जैरेड कुशनर को पाकिस्तान भेजने का फैसला किया है। दोनों प्रतिनिधि शनिवार सुबह इस्लामाबाद पहुंचेंगे।
सूत्रों के मुताबिक, इन वार्ताओं का मुख्य उद्देश्य युद्ध को व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष में बदलने से रोकना और संभावित युद्धविराम के विकल्प तलाशना है।
दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस, जिन्होंने शुरुआती वार्ताओं में भूमिका निभाई थी, इस बार प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा नहीं होंगे, लेकिन उन्हें “स्टैंडबाय” पर रखा गया है। इसका अर्थ यह है कि हालात बिगड़ने या बातचीत निर्णायक मोड़ पर पहुंचने की स्थिति में उन्हें तुरंत सक्रिय किया जा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका इस समय दोहरी रणनीति पर काम कर रहा है:
- एक ओर वह इज़राइल को सैन्य और खुफिया समर्थन दे रहा है,
- दूसरी ओर वह ईरान के साथ संवाद के रास्ते भी खुले रखना चाहता है।
वॉशिंगटन यह समझता है कि यदि यह युद्ध पूरी तरह क्षेत्रीय संघर्ष में बदल गया तो उसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था, तेल आपूर्ति और अमेरिकी चुनावी राजनीति पर भी पड़ेगा।
पाकिस्तान क्यों बना इस संकट का नया केंद्र?
यह सवाल पूरी दुनिया में पूछा जा रहा है कि आखिर पाकिस्तान अचानक इस युद्ध में इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया।
दरअसल पाकिस्तान उन गिने-चुने देशों में शामिल है जिनके अमेरिका, चीन, खाड़ी देशों और ईरान — सभी से संबंध हैं। यही वजह है कि इस्लामाबाद “बैकचैनल कम्युनिकेशन” के लिए उपयुक्त मंच बनता जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान ने अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाने की कोशिश की है। चीन के करीबी होने के बावजूद उसने अमेरिका से रिश्ते पूरी तरह खराब नहीं होने दिए। वहीं ईरान के साथ सीमा और धार्मिक संबंध भी उसे संवेदनशील भूमिका में रखते हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान इस संकट को अपने कूटनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के अवसर के रूप में भी देख रहा है।
यदि इस्लामाबाद अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम कराने में सफल होता है, तो उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि में बड़ा सुधार हो सकता है।
क्या पर्दे के पीछे चल रही है गुप्त बातचीत?
हालांकि ईरान सार्वजनिक रूप से प्रत्यक्ष वार्ता से इनकार कर रहा है, लेकिन कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ मानते हैं कि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है।
अक्सर वैश्विक संघर्षों में ऐसा देखा गया है कि सार्वजनिक मंचों पर कठोर बयान दिए जाते हैं, जबकि पर्दे के पीछे मध्यस्थ देशों के जरिए संदेशों का आदान-प्रदान चलता रहता है।
ओमान, कतर और स्विट्जरलैंड पहले भी अमेरिका और ईरान के बीच संवाद चैनल की भूमिका निभा चुके हैं। अब पाकिस्तान भी उसी सूची में शामिल होता दिखाई दे रहा है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि:
- ईरान प्रत्यक्ष वार्ता से इसलिए बच रहा है ताकि उसकी “प्रतिरोधी छवि” बनी रहे,
- जबकि अमेरिका चाहता है कि बिना औपचारिक घोषणा के बातचीत आगे बढ़े।
यानी दोनों देश सार्वजनिक रूप से विरोध दिखाते हुए भी “कंट्रोल्ड डिप्लोमेसी” की रणनीति पर काम कर सकते हैं।
लेबनान में फिर गूंजे धमाके
इज़राइल-ईरान युद्ध का प्रभाव अब पूरे मध्य पूर्व में फैल चुका है।
लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, शुक्रवार को दक्षिणी लेबनान में इज़राइली हवाई हमलों में कम से कम छह लोगों की मौत हो गई जबकि कई अन्य घायल हुए हैं।
मृतकों में वादी अल-हुजैर, तुलीन, सरीफा और यातेर क्षेत्रों के नागरिक शामिल बताए गए हैं।
इज़राइली सेना का दावा है कि उसने हिज़्बुल्लाह से जुड़े लड़ाकों को निशाना बनाया। सेना के अनुसार बिंत जुबैल क्षेत्र में छह लड़ाके मारे गए हैं।
हालांकि कुछ सप्ताह पहले संघर्षविराम लागू हुआ था, लेकिन लगातार हो रहे हमले यह संकेत देते हैं कि स्थिति अब भी बेहद विस्फोटक बनी हुई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि लेबनान मोर्चा पूरी तरह सक्रिय हो गया, तो यह युद्ध केवल इज़राइल और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा।
NATO में दरार के संकेत
इस युद्ध का असर अब पश्चिमी देशों के सैन्य गठबंधन NATO पर भी दिखाई देने लगा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका उन NATO देशों से नाराज़ है जिन्होंने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान का खुला समर्थन नहीं किया।
एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि पेंटागन के अंदर स्पेन को NATO से निलंबित करने तक के विकल्पों पर चर्चा हुई। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस खबर ने यूरोपीय राजनीति में हलचल मचा दी।
स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा:
“स्पेन NATO का विश्वसनीय सदस्य है और हमें किसी प्रकार की चिंता नहीं है।”
इसी रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि ब्रिटेन द्वारा सीमित समर्थन दिए जाने से अमेरिका फॉकलैंड द्वीपों को लेकर अपनी नीति की समीक्षा कर सकता है।
यदि ये संकेत सही साबित होते हैं, तो यह NATO के भीतर बढ़ती वैचारिक दरारों का बड़ा संकेत माना जाएगा।
युद्ध का असर मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर
युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जा रहा, बल्कि सूचना और मीडिया के मोर्चे पर भी संघर्ष तेज हो चुका है।
अमेरिकी-कुवैती पत्रकार अहमद शिहाब-एल्दीन को कई सप्ताह हिरासत में रखने के बाद रिहा कर दिया गया है। उन पर “फर्जी जानकारी फैलाने” और “राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने” जैसे आरोप लगाए गए थे।
अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की कि उन्हें सुरक्षित रूप से कुवैत से बाहर निकाल लिया गया है।
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि युद्ध के दौरान पत्रकारों और स्वतंत्र मीडिया पर दबाव बढ़ना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर खतरा है।
तेल बाज़ार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर
इज़राइल-ईरान युद्ध का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी साफ दिखाई देने लगा है।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि फारस की खाड़ी या होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ा, तो दुनिया भर में तेल कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।
भारत, चीन, जापान और यूरोप जैसे बड़े आयातक देशों के लिए यह स्थिति गंभीर आर्थिक संकट पैदा कर सकती है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार पहले ही अस्थिरता महसूस कर रहे हैं। निवेशक युद्ध के विस्तार की आशंका से डरे हुए हैं और वैश्विक शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है।
क्या दुनिया एक बड़े युद्ध की ओर बढ़ रही है?
यह सवाल अब केवल विशेषज्ञों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम लोगों के बीच भी चर्चा का विषय बन चुका है।
यदि अमेरिका सीधे युद्ध में शामिल होता है, या हिज़्बुल्लाह, सीरिया, इराक और यमन के मोर्चे पूरी तरह सक्रिय हो जाते हैं, तो यह संघर्ष पूरे मध्य पूर्व को अपनी चपेट में ले सकता है।
फिलहाल दुनिया की नजरें पाकिस्तान में चल रही कूटनीतिक गतिविधियों पर टिकी हैं।
इस्लामाबाद में होने वाली हर बैठक, हर बयान और हर संदेश आने वाले दिनों की दिशा तय कर सकता है।
अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में संवाद की मेज मजबूत होती है या फिर बारूद की आग पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेती है।
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