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क्या चुनाव आयोग अब सिर्फ़ “चुनाव कराने वाली संस्था” नहीं, बल्कि “खास पार्टी को चुनाव जिताने वाला तंत्र” बनता जा रहा है?

 नई दिल्ली, 24 अप्रैल 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi |  वरिष्ठ पत्रकार  

भारत का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है। लेकिन लोकतंत्र सिर्फ़ वोट डालने का नाम नहीं होता, बल्कि निष्पक्ष चुनाव, बराबरी का अवसर और जनता के भरोसे पर टिका होता है। यही भरोसा अगर टूटने लगे, तो लोकतंत्र केवल एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाता है।

आज देश के कई हिस्सों में यह सवाल तेज़ी से उठ रहा है कि क्या भारत का चुनाव आयोग — यानी ECI — अब पूरी तरह निष्पक्ष रह गया है?


क्या वह सत्ता पक्ष के खिलाफ़ कार्रवाई करने से बचता है?
क्या धार्मिक भाषण, नफ़रत फैलाने वाले बयान, खुलेआम पैसे और शराब बाँटना, सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग — सब कुछ देखकर भी आयोग सिर्फ़ “नोटिस” जारी करने तक सीमित हो गया है?

और सबसे बड़ा सवाल — जब लाखों लोगों के वोट कट रहे हों, तब सुप्रीम कोर्ट की ख़ामोशी क्या संकेत देती है?


चुनाव आयोग पर पक्षपात के आरोप अचानक नहीं उठे

यह बहस आज की नहीं है। पिछले कई वर्षों से विपक्षी दल, पूर्व चुनाव आयुक्त, संवैधानिक विशेषज्ञ और नागरिक समूह लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता कमज़ोर हुई है।

एक समय था जब टी.एन. शेषन जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त सरकारों को चुनौती देने की हिम्मत रखते थे। चुनाव आयोग का नाम सुनते ही राजनीतिक दलों में डर पैदा होता था। लेकिन आज हालात उल्टे दिखाई देते हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या राजनीतिक दल आयोग से डरते हैं, या आयोग सत्ता से डरता है?


धार्मिक भाषणों पर “चयनात्मक कार्रवाई” का आरोप

भारत का संविधान धर्म के आधार पर वोट माँगने को गलत मानता है। Representation of the People Act के तहत धर्म, जाति या समुदाय के नाम पर वोट माँगना चुनावी अपराध की श्रेणी में आता है।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में चुनावी मंचों से लगातार ऐसे बयान सुनाई दिए जिनमें:

  • हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण,
  • “घुसपैठिया”,
  • “जनसंख्या संतुलन”,
  • “मंगलसूत्र”,
  • “श्मशान-कब्रिस्तान”
    जैसे शब्दों का खुला इस्तेमाल हुआ।

विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग ने कई मामलों में या तो बहुत देर से प्रतिक्रिया दी, या केवल औपचारिक नोटिस देकर मामला खत्म कर दिया।

यही वजह है कि जनता के एक हिस्से में यह धारणा मजबूत हुई कि आयोग की कार्रवाई सत्ता और विपक्ष के लिए बराबर नहीं है।


“90 लाख वोट कटे” — पश्चिम बंगाल का सबसे बड़ा विवाद

2025-26 में पश्चिम बंगाल में हुई Special Intensive Revision (SIR) ने भारतीय चुनावी इतिहास की सबसे बड़ी बहस खड़ी कर दी।

रिपोर्ट्स के अनुसार पश्चिम बंगाल में लगभग 90 लाख से अधिक वोटर नाम सूची से हटाए गए।

आलोचकों का आरोप है कि यह केवल “डुप्लीकेट हटाने” की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि बड़े पैमाने पर राजनीतिक और सामाजिक प्रोफाइलिंग का मामला बन गई।

कई रिपोर्टों में दावा किया गया कि:

  • मुस्लिम बहुल इलाकों में भारी संख्या में नाम हटे,
  • गरीब और प्रवासी मज़दूर सबसे अधिक प्रभावित हुए,
  • भाषा और स्पेलिंग की छोटी गलतियों को आधार बनाया गया,
  • कई जीवित लोगों को “मृत” दिखाया गया।

ब्रिटिश अख़बार The Guardian की रिपोर्ट में कहा गया कि लाखों लोग वैध दस्तावेज़ होने के बावजूद वोट देने से वंचित हुए।


“एल्गोरिदम लोकतंत्र तय करेगा?” — सॉफ्टवेयर विवाद

Reporters’ Collective की एक खोजी रिपोर्ट ने और गंभीर सवाल खड़े किए। रिपोर्ट के अनुसार ECI ने ऐसे सॉफ्टवेयर और एल्गोरिदम का इस्तेमाल किया जो स्थानीय भाषाओं और नामों को ठीक से समझ ही नहीं पा रहे थे।

उदाहरण:

  • Mohammed → Muhammad
  • Sheikh → Shekh
  • Mondal → Mandal

जैसी छोटी स्पेलिंग भिन्नताओं को “logical discrepancy” मानकर लोगों को संदिग्ध वोटर घोषित किया गया।

यानी तकनीकी गलती का सीधा असर लोकतांत्रिक अधिकार पर पड़ा।

यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि वोट केवल एक कागज़ी अधिकार नहीं, बल्कि नागरिकता की सबसे बड़ी पहचान है।


सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर भी सवाल

जब लाखों वोट कटने की शिकायतें सुप्रीम कोर्ट पहुँचीं, तब लोगों को उम्मीद थी कि अदालत सख़्त हस्तक्षेप करेगी। लेकिन कई मामलों में कोर्ट ने सीमित दखल दिया।

एक मामले में सुप्रीम Court ने कहा कि केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती।

हालाँकि अदालत ने कुछ मामलों में ECI से सवाल भी पूछे। उसने “logical discrepancy” वाली श्रेणी पर चिंता जताई और मज़बूत अपील प्रक्रिया की बात कही।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि:

  • अदालत ने व्यापक स्तर पर चुनाव प्रक्रिया रोकने या पुनरीक्षण पर रोक लगाने जैसा कदम नहीं उठाया,
  • जबकि इतने बड़े पैमाने पर वोट हटाना लोकतंत्र के लिए असाधारण मामला था।

यही वजह है कि सोशल मीडिया और नागरिक समूहों में यह भावना बढ़ी कि “संवैधानिक संस्थाएँ टकराव से बच रही हैं।”


क्या चुनाव आयोग “वोटर शुद्धिकरण” के नाम पर चयनात्मक राजनीति कर रहा है?

ECI का पक्ष अलग है।

चुनाव आयोग लगातार कहता रहा है कि:

  • यह प्रक्रिया संवैधानिक है,
  • डुप्लीकेट और फर्जी वोट हटाना आवश्यक है,
  • विपक्ष आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है।

आयोग का दावा है कि “99% से अधिक” लोगों तक फॉर्म पहुँचाए गए और यह पूरी प्रक्रिया कानून के तहत हुई।

लेकिन लोकतंत्र में केवल “प्रक्रिया” पर्याप्त नहीं होती — भरोसा भी उतना ही ज़रूरी होता है।

अगर करोड़ों लोग यह महसूस करने लगें कि उनका वोट सुरक्षित नहीं है, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर हो जाती है।


“चुनाव आयोग देखता रहता है” — जनता की नाराज़गी क्यों बढ़ रही है?

जनता के एक वर्ग का आरोप है कि:

  • नफ़रत भरे भाषणों पर ढिलाई,
  • EVM और वोटर लिस्ट पर पारदर्शिता की कमी,
  • सरकारी एजेंसियों का चुनावी इस्तेमाल,
  • विपक्षी नेताओं पर तेज़ कार्रवाई लेकिन सत्ता पक्ष पर नरमी,
  • चुनावी आचार संहिता का असमान अनुपालन,

इन सबने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को चोट पहुँचाई है।

सोशल मीडिया पर लोगों ने खुलकर आरोप लगाए कि आयोग “स्वतंत्र संस्था” से अधिक “सरकारी विभाग” जैसा व्यवहार कर रहा है।

हालाँकि यह भी सच है कि सोशल मीडिया की हर राय तथ्य नहीं होती। लेकिन जब ऐसी शिकायतें लगातार और बड़े पैमाने पर आने लगें, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं को आत्ममंथन करना ही पड़ता है।


लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं, भरोसा भी है

भारत जैसे विशाल देश में चुनाव कराना आसान काम नहीं। चुनाव आयोग ने दशकों तक दुनिया को निष्पक्ष चुनाव का उदाहरण भी दिया है।

लेकिन आज सबसे बड़ा संकट तकनीकी नहीं, नैतिक और संस्थागत भरोसे का है।

अगर:

  • विपक्ष चुनाव आयोग पर भरोसा न करे,
  • जनता वोट कटने से डरे,
  • अदालतें सीमित हस्तक्षेप करें,
  • और सत्ता पक्ष लगातार आयोग की तारीफ करे,

तो सवाल उठना स्वाभाविक है।


आखिर समाधान क्या है?

विशेषज्ञों के अनुसार कुछ बड़े सुधार आवश्यक हैं:

  1. चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पूरी तरह पारदर्शी हो
  2. वोटर लिस्ट संशोधन प्रक्रिया सार्वजनिक निगरानी में हो
  3. हर वोट कटने का कारण ऑनलाइन उपलब्ध कराया जाए
  4. AI और सॉफ्टवेयर आधारित जांच का स्वतंत्र ऑडिट हो
  5. चुनाव आयोग संसद और न्यायपालिका दोनों के प्रति जवाबदेह बने
  6. चुनावी भाषणों पर तत्काल और समान कार्रवाई हो

निष्कर्ष:-

 लोकतंत्र की लड़ाई अब संस्थाओं की विश्वसनीयता की लड़ाई है

भारत में लोकतंत्र का भविष्य केवल इस बात से तय नहीं होगा कि कौन चुनाव जीतता है। असली सवाल यह है कि क्या जनता को अब भी भरोसा है कि उसका वोट सुरक्षित है?

अगर चुनाव आयोग पर निष्पक्षता का विश्वास टूटता है, तो लोकतंत्र की नींव हिलने लगती है।

और अगर सुप्रीम कोर्ट, मीडिया और संवैधानिक संस्थाएँ भी जनता की आशंकाओं को गंभीरता से नहीं लेंगी, तो आने वाले समय में लोकतंत्र सिर्फ़ चुनावी आँकड़ों तक सीमित होकर रह जाएगा।

भारत की लोकतांत्रिक ताक़त उसकी संस्थाओं की स्वतंत्रता में है — और आज वही स्वतंत्रता सबसे बड़े सवालों के घेरे में खड़ी दिखाई दे रही है।

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