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खामेनेई की हत्या पर सरकार की चुप्पी ‘तटस्थता’ नहीं, विदेश नीति से विचलन: Sonia Gandhi का तीखा हमला

 नई दिल्ली | 3 मार्च  2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार

ईरान के सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei की लक्षित हत्या पर केंद्र सरकार की चुप्पी को लेकर कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने तीखा प्रहार किया है। उनका कहना है कि यह मौन “तटस्थता” नहीं, बल्कि भारत की स्थापित विदेश नीति सिद्धांतों से एक चिंताजनक विचलन है। उनके अनुसार, जब किसी संप्रभु देश के प्रमुख की लक्षित हत्या हो और भारत अंतरराष्ट्रीय कानून तथा संप्रभुता के स्पष्ट बचाव में आवाज न उठाए, तो इससे हमारी कूटनीतिक विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगते हैं।

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“मौन से पैदा होते हैं नीति-संकट के संकेत”

एक प्रमुख अख़बार में प्रकाशित अपने लेख में सोनिया गांधी ने कहा कि 1 मार्च को ईरान ने पुष्टि की कि उसके सर्वोच्च नेता की हत्या अमेरिका और इज़राइल द्वारा किए गए लक्षित हमलों में हुई। यह घटना ऐसे समय में हुई जब राजनयिक वार्ताएँ जारी थीं। उनके अनुसार, “बिना औपचारिक युद्ध-घोषणा के किसी राष्ट्राध्यक्ष की हत्या समकालीन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में गहरी दरार का संकेत है।”

उन्होंने सवाल उठाया कि नई दिल्ली ने न तो ईरानी संप्रभुता के उल्लंघन की स्पष्ट निंदा की और न ही अंतरराष्ट्रीय कानून की रक्षा में मुखर रुख अपनाया। प्रारंभिक प्रतिक्रिया में प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा ईरान की जवाबी कार्रवाई की आलोचना, लेकिन उससे पहले हुए हमलों के क्रम का उल्लेख न करना—सोनिया गांधी के मुताबिक—“आधा-सच” प्रस्तुत करने जैसा है।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून का प्रश्न

लेख में उन्होंने United Nations के चार्टर के अनुच्छेद 2(4) का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी राज्य की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल प्रयोग या उसकी धमकी निषिद्ध है। “एक पदासीन राष्ट्राध्यक्ष की लक्षित हत्या इन सिद्धांतों के केंद्र पर चोट करती है,” उन्होंने लिखा। उनका तर्क है कि यदि ऐसी घटनाओं पर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भी सैद्धांतिक आपत्ति दर्ज नहीं करता, तो वैश्विक मानकों का क्षरण सामान्यीकृत हो जाएगा।

इज़राइल दौरे की टाइमिंग और कूटनीतिक संकेत

सोनिया गांधी ने यह भी रेखांकित किया कि हत्या से महज 48 घंटे पहले प्रधानमंत्री इज़राइल दौरे से लौटे थे, जहाँ उन्होंने प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu के नेतृत्व वाली सरकार के साथ रक्षा और रणनीतिक सहयोग को दोहराया। उनके मुताबिक, ऐसे समय में उच्च-प्रोफ़ाइल राजनीतिक समर्थन, जब पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ रही हो, “नैतिक स्पष्टता” की अपेक्षा को और प्रखर करता है।

संसद में बहस की मांग

उन्होंने मांग की कि बजट सत्र के दूसरे चरण में संसद की पुनर्बैठक के साथ इस “चिंताजनक मौन” पर खुली और स्पष्ट बहस हो। “विदेश नीति में रणनीतिक स्पष्टता और लोकतांत्रिक जवाबदेही—दोनों की आवश्यकता है,” उन्होंने कहा। उनके अनुसार, पश्चिम एशिया की अस्थिरता भारत के ऊर्जा, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और क्षेत्रीय संतुलन जैसे प्रत्यक्ष हितों से जुड़ी है; इसलिए यह मुद्दा परिधीय नहीं, बल्कि केंद्रीय महत्व का है।

कांग्रेस का रुख और ‘वैश्विक दक्षिण’ का संदर्भ

सोनिया गांधी ने कहा कि कांग्रेस ने ईरान की धरती पर बमबारी और लक्षित हत्याओं की निंदा की है और इसे क्षेत्रीय व वैश्विक स्थिरता के लिए खतरनाक उकसावा बताया है। उन्होंने याद दिलाया कि भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से “सार्वभौमिक समानता, गैर-हस्तक्षेप और शांतिपूर्ण समाधान” पर आधारित रही है—जिसकी झलक संविधान के अनुच्छेद 51 में भी मिलती है।

उनका तर्क है कि जब ब्रिक्स जैसे मंचों पर भारत, रूस और चीन जैसे साझेदार देशों के साथ खड़ा होता है, तब “वैश्विक दक्षिण” को यह भरोसा होना चाहिए कि भारत संप्रभुता के सिद्धांत पर सुसंगत रुख अपनाएगा। अन्यथा, कल को वही देश भारत से समर्थन की अपेक्षा क्यों करेंगे?

ऐतिहासिक संदर्भ और नैतिक पूंजी

सोनिया गांधी ने पूर्व प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee की 2001 की तेहरान यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि तब भारत-ईरान संबंधों को सभ्यतागत और समकालीन दोनों स्तरों पर सुदृढ़ बताया गया था। उनके अनुसार, “भारत की नैतिक पूंजी” उसकी उस परंपरा से बनी है, जिसमें उसने संप्रभुता, शांति और न्याय की पैरवी कठिन समय में भी की।

उन्होंने “वसुधैव कुटुंबकम्” के आदर्श का हवाला देते हुए कहा कि यह केवल औपचारिक कूटनीति का नारा नहीं, बल्कि न्याय, संयम और संवाद के प्रति प्रतिबद्धता है—भले ही वह असुविधाजनक क्यों न हो।


निष्कर्ष:-

 रणनीतिक स्पष्टता बनाम सामरिक चुप्पी

ईरान-इज़राइल टकराव और खामेनेई की हत्या ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सोनिया गांधी के अनुसार, ऐसे मोड़ पर भारत की चुप्पी “तटस्थता” नहीं, बल्कि सिद्धांतगत शिथिलता का संकेत है। सरकार के समर्थक इसे संतुलित कूटनीति और हित-सुरक्षा की रणनीति बता सकते हैं, लेकिन विपक्ष इसे नैतिक और कानूनी आधार से विचलन मान रहा है।

आख़िरकार, बहस इस बात पर है कि उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में भारत किस प्रकार की विदेश नीति चाहता है—सिर्फ़ सामरिक संतुलन की, या सिद्धांतों पर आधारित मुखर कूटनीति की। संसद में संभावित बहस इस द्वंद्व को स्पष्ट दिशा दे सकती है।

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