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Sirsi Sambhal All India Mushaira 2026:: जब छोटे शहर ने उर्दू अदब की बड़ी विरासत को फिर से जिंदा कर दिया

 सिरसी/सम्भल (उत्तर प्रदेश), 30 मार्च 2026।✍🏻 Z S Razzaqi |  वरिष्ठ पत्रकार 

उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी, लखनऊ के तत्वावधान में सिरसी के इंडियन मैरिज हॉल (बुद्ध बाजार) में आयोजित ऑल इंडिया मुशायरा न केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम रहा, बल्कि यह उर्दू अदब की जीवित परंपरा, उसकी ऐतिहासिक गहराई और आधुनिक समय में उसकी प्रासंगिकता का शानदार प्रतीक बनकर उभरा। यह आयोजन एक ऐसी रात में तब्दील हो गया, जहाँ लफ़्ज़ों की खुशबू, एहसास की नर्मी और तहज़ीब की रौनक देर रात तक महफ़िल को रोशन करती रही।


मुशायरे की परंपरा: इतिहास की रौशनी में सिरसी का आज

मुशायरे की परंपरा भारतीय उपमहाद्वीप की उस अदबी विरासत से जुड़ी है, जिसकी जड़ें 18वीं सदी के दरबारी दौर से लेकर आम जनमानस तक फैली हुई हैं। दिल्ली, लखनऊ और हैदराबाद जैसे शहरों से शुरू हुआ यह सिलसिला धीरे-धीरे छोटे कस्बों और नगरों तक पहुँचा—जहाँ सिरसी जैसे शहरों ने इस परंपरा को न सिर्फ अपनाया, बल्कि उसे जीवित भी रखा।

आज जब डिजिटल युग में साहित्य की अभिव्यक्ति के माध्यम बदल रहे हैं, ऐसे में सिरसी का यह मुशायरा इस बात का प्रमाण है कि उर्दू शायरी का जादू अब भी लोगों के दिलों में उसी तरह बसता है, जैसे सदियों पहले बसता था।


गरिमामय उपस्थिति और शानदार संचालन

इस प्रतिष्ठित मुशायरे की अध्यक्षता मशहूर शायर अनवर कैफ़ी (मुरादाबाद) ने की, जिनकी शायरी और व्यक्तित्व दोनों ही अदबी दुनिया में सम्मान का स्थान रखते हैं। मुख्य अतिथि के रूप में कौसर अब्बास (चेयरमैन, नगर पंचायत सिरसी) की मौजूदगी ने कार्यक्रम को सामाजिक-प्रशासनिक समर्थन का आयाम दिया, जबकि मुजाहिद फ़राज़ की उपस्थिति ने महफ़िल में और भी गरिमा जोड़ दी।

मेहमान-ए-एज़ाज़ी के रूप में कशिश वारसी (क़ौमी सदर, भारतीय सूफ़ी फाउंडेशन / एडिटर ग्लोबल न्यूज़) और डॉ. मुनव्वर ताबिश की शिरकत ने कार्यक्रम की प्रतिष्ठा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

मुशायरे की निज़ामत हकीम बुरहान सम्भली ने जिस अंदाज़ में की, वह काबिले-तारीफ रहा। उनके लफ़्ज़ों की मिठास और प्रस्तुति की रवानी ने श्रोताओं को लगातार जोड़े रखा।


देशभर के शायरों की शिरकत: अल्फ़ाज़ की बरसात

इस ऑल इंडिया मुशायरे में देश के विभिन्न हिस्सों से आए नामचीन शायरों ने अपनी ग़ज़लों और नज़्मों से महफ़िल को रूहानी बना दिया। प्रमुख शायरों में:

  • डॉ. शफीक़ उर रहमान बरकाती
  • शिबान क़ादरी (अमरोहा)
  • सुलेमान फ़राज़ (हसनपुर)
  • नासिर अमरोहवी
  • अभिषेक तिवारी (शिमला)
  • निज़ाम नौशाही (मुंबई)
  • डॉ. अन्स इकान (मेरठ)
  • ताहिर संभली

इन सभी शायरों ने अपने-अपने अंदाज़ में इश्क़, समाज, सियासत और इंसानी जज़्बात को पेश किया। श्रोताओं ने हर शेर पर “वाह-वाह” और “मुक़र्रर अर्ज़ है” की सदाओं से महफ़िल को जीवंत बनाए रखा।

सभी शायरों को सर्टिफिकेट और ट्रॉफी देकर किया सम्मानित

कार्यक्रम के अंत में महफ़िल अपने एक बेहद ख़ूबसूरत और यादगार मुक़ाम पर पहुँची, जब उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी की ओर से सभी आमंत्रित शायरों को सर्टिफिकेट और ट्रॉफी देकर सम्मानित किया गया। यह पल सिर्फ एक औपचारिकता नहीं था, बल्कि उर्दू अदब की उस ख़िदमत का एहतिराम था, जिसे ये शायर अपने लफ़्ज़ों के ज़रिए बरसों से ज़िंदा रखे हुए हैं।

सम्मान के इस जज़्बाती और रूहानी लम्हे ने पूरी महफ़िल को एक नई ऊँचाई दे दी—जहाँ तालियों की गूंज, मुस्कुराते चेहरे और आंखों में चमक इस बात की गवाही दे रहे थे कि सिरसी का यह मुशायरा सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि अदब और मोहब्बत का एक यादगार जश्न बन चुका है।


सिरसी: एक छोटा शहर, बड़ी अदबी पहचान

सिरसी जैसे कस्बे में इस स्तर का ऑल इंडिया मुशायरा आयोजित होना इस बात का संकेत है कि उर्दू अदब अब सिर्फ महानगरों तक सीमित नहीं है। यहाँ की अवाम में शायरी के प्रति जो मोहब्बत दिखाई दी, वह यह बताती है कि छोटे शहर भी अब सांस्कृतिक नक्शे पर अपनी मजबूत पहचान बना रहे हैं।

यह आयोजन स्थानीय प्रतिभाओं के लिए भी प्रेरणा बना, जिन्होंने बड़े शायरों को सुनकर अपने अदबी सफर को नई दिशा देने का संकल्प लिया।


उर्दू अदब का भविष्य: परंपरा और नवाचार का संगम

आज जब सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर शायरी नए रूप में सामने आ रही है, ऐसे में पारंपरिक मुशायरों का महत्व और भी बढ़ जाता है। सिरसी का यह आयोजन इस बात का उदाहरण है कि कैसे पुरानी परंपराएँ नए दौर के साथ तालमेल बिठाकर आगे बढ़ सकती हैं।

उर्दू अकादमी द्वारा इस तरह के आयोजनों को समर्थन देना न केवल भाषा और साहित्य के संरक्षण के लिए आवश्यक है, बल्कि यह नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का भी महत्वपूर्ण माध्यम है।


आयोजकों का आभार और समापन

कार्यक्रम के अंत में आयोजकों—एम ए खान, डॉ. शाकिर हुसैन इस्लाही, अशरफ अली ख़ान, अर्जुन कुमार कश्यप, तंज़ील ख़ान एवं दानिश ग़दीरी—ने सभी अतिथियों, शायरों और उपस्थित जनसमूह का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन उर्दू अदब के प्रचार-प्रसार में मील का पत्थर साबित होते हैं और भविष्य में भी इस परंपरा को और मजबूत किया जाएगा।



निष्कर्ष:-

 एक रात, जो इतिहास में दर्ज हो गई

बहुत कामयाब सिरसी का यह ऑल इंडिया मुशायरा केवल एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह एक सांस्कृतिक आंदोलन की तरह सामने आया—जहाँ इतिहास, साहित्य और वर्तमान का संगम देखने को मिला। यह रात इस बात की गवाह बनी कि जब लफ़्ज़ दिल से निकलते हैं, तो वे सरहदों और समय की सीमाओं को पार कर जाते हैं।

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