Type Here to Get Search Results !

ADS5

ADS2

“कुछ रुतें डॉक्टर ताहिर रज़्ज़ाक़ी के नाम” — संभल की सरज़मीं पर सजेगी उर्दू अदब, यादों और तहज़ीब की एक ऐतिहासिक शाम

 उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक शहर संभल एक बार फिर उर्दू अदब की रूहानी महक से सराबोर होने जा रहा है। सराय तरीन स्थित शब्बीर पैलेस में “क़लमकार फ़ाउंडेशन” के ज़ेरे-एहतिमाम एक बेहद ख़ास, भावनात्मक और उच्च स्तरीय अदबी महफ़िल का आयोजन किया जा रहा है, जिसका शीर्षक रखा गया है 

“कुछ रुतें डॉक्टर ताहिर रज़्ज़ाक़ी के नाम”

यह आयोजन केवल एक पारंपरिक मुशायरा नहीं, बल्कि उर्दू अदब के सच्चे ख़ादिम, संजीदा शायर, विचारशील बुद्धिजीवी और तहज़ीबी शख़्सियत मरहूम डॉक्टर ताहिर रज़्ज़ाक़ी को पेश किया जाने वाला एक गहरा और अर्थपूर्ण ख़िराज-ए-अक़ीदत है।

15 मई शुक्रवार की रात 8:30 बजे आयोजित होने वाली यह महफ़िल अदब, एहसास, इल्म और सांस्कृतिक विरासत का ऐसा संगम बनने जा रही है, जिसकी गूंज केवल संभल तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उर्दू साहित्यिक हलकों में दूर तक महसूस की जाएगी।

संभल की धरती पर उर्दू तहज़ीब का जीवंत उत्सव

संभल और सराय तरीन की पहचान केवल ऐतिहासिक और व्यापारिक शहरों के रूप में नहीं रही, बल्कि यह इलाका हमेशा से उर्दू अदब, शायरी और इल्मी रवायतों का एक अहम केंद्र माना जाता रहा है। यहां की महफ़िलें केवल कार्यक्रम नहीं होतीं, बल्कि वे समाज की सांस्कृतिक रूह को ज़िंदा रखने का माध्यम बनती हैं।

ऐसे दौर में, जब डिजिटल दुनिया ने इंसानी रिश्तों और साहित्यिक बैठकों की गर्माहट को कम कर दिया है, “कुछ रुतें डॉक्टर ताहिर रज़्ज़ाक़ी के नाम” जैसा आयोजन इस बात का सबूत है कि उर्दू अदब आज भी लोगों के दिलों में उसी मोहब्बत और एहतराम के साथ ज़िंदा है।

डॉक्टर ताहिर रज़्ज़ाक़ी — एक शख़्सियत, एक तहज़ीब, एक अदबी विरासत

डॉक्टर ताहिर रज़्ज़ाक़ी मरहूम केवल एक शायर नहीं थे, बल्कि वे उर्दू ज़ुबान की उस तहज़ीबी परंपरा के प्रतिनिधि थे, जिसने इल्म, इंसानियत, मोहब्बत और सामाजिक संवेदनाओं को अपनी तहरीरों का हिस्सा बनाया।

उनकी शायरी में जहां ज़िंदगी की सच्चाइयों की गहराई दिखाई देती थी, वहीं इंसानी रिश्तों की नर्मी और समाज के दर्द की झलक भी साफ़ महसूस होती थी। उन्होंने अपने फ़िक्र-ओ-फ़न से न केवल पाठकों और श्रोताओं के दिलों को रोशन किया, बल्कि उर्दू साहित्य के क्षितिज पर एक ऐसी बौद्धिक रोशनी छोड़ी, जो आने वाले समय में भी अदब के चाहने वालों को राह दिखाती रहेगी।

साहित्यिक हलकों में उन्हें एक ऐसे शायर और लेखक के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने शब्दों को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि उन्हें समाज और इंसानियत की आवाज़ में तब्दील कर दिया।

यह महफ़िल केवल मुशायरा नहीं, एहसासों का कारवां होगी

आयोजकों के अनुसार यह कार्यक्रम सिर्फ़ ग़ज़लों और नज़्मों की पेशकश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह डॉक्टर ताहिर रज़्ज़ाक़ी की साहित्यिक, सामाजिक और तहज़ीबी सेवाओं का सामूहिक स्मरण होगा।

महफ़िल में शामिल होने वाले शायर अपने कलाम के ज़रिए न केवल मरहूम को श्रद्धांजलि देंगे, बल्कि उर्दू अदब की उस रूह को भी ज़िंदा करेंगे, जो समाज में मोहब्बत, भाईचारे और सांस्कृतिक जागरूकता का संदेश देती है।

क़लमकार फ़ाउंडेशन ने तमाम साहित्यकारों, शायरों और अदब-प्रेमियों से इस ऐतिहासिक शाम में अधिक से अधिक संख्या में शामिल होने की अपील की है। संस्था की ओर से विशेष रूप से सभी शायरों से अनुरोध किया गया है कि वे मरहूम की अदबी सेवाओं के सम्मान में कम-से-कम एक मानक और प्रभावशाली क़िता पेश करें।

प्रतिष्ठित साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों की होगी मौजूदगी

इस भव्य अदबी आयोजन की सरपरस्ती मशहूर साहित्यकार डॉक्टर नसीम-उज़-ज़फ़र साहब करेंगे, जबकि इसकी सदारत सुप्रसिद्ध शायर डॉक्टर मुनव्वर ताबिश साहब के ज़िम्मे होगी।

महफ़िल की निज़ामत जाने-माने अदबी व्यक्तित्व मीर शाह हुसैन आरिफ़ साहब करेंगे, जिनकी साहित्यिक शैली और मंच संचालन हमेशा से लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र रहे हैं।

कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप में कांग्रेस नेता हाजी मोहम्मद शफ़ी साहब शरीक होंगे। इसके अलावा सुल्तान मोहम्मद ख़ां कलीम साहब और सैयद हुसैन अफ़सर साहब मेहमान-ए-ज़ीवक़ार होंगे,मेंबर आरेफीन, मुशायरे की इफ्तेताह फरमाएंगे 

डॉक्टर ताहिर रज़्ज़ाक़ी की अदबी सेवाओं पर विस्तृत और विश्लेषणात्मक चर्चा प्रसिद्ध विद्वान डॉक्टर आबिद हुसैन हैदरी साहब द्वारा प्रस्तुत की जाएगी, जबकि इस्तक़बालिया कलिमात ज़ियाउल क़मर रज़्ज़ाक़ी साहब पेश करेंगे।

देशभर के चर्चित शायरों से सजेगी महफ़िल

इस मुशायरे की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह भी है कि इसमें विभिन्न शहरों से नामचीन और लोकप्रिय शायर हिस्सा लेने जा रहे हैं।

महफ़िल में एडवोकेट तौफ़ीक़ आज़ाद, डॉक्टर शफ़ीक़ुर्रहमान बरकाती, सैयद शीबान  क़ादरी, सुलेमान फ़राज़, फ़हीम बिस्मिल, तनवीर अशरफ़ी, निज़ाम नौशाही, नौशाद अंगड़, फ़हीम साक़िब, ताहिर हुसैन ताहिर, मुजाहिद नादान, इंजीनियर मिदहत सऊद, मुज़म्मिल खां मुज़म्मिल, आसी हसनपुरी, वसीम हसनपुरी, डॉक्टर अनस इक़ान मेरठी, नौशाद गोबंदपुरी, क़दीर ज़ाफ़िर, वसीम अरहम, इरफ़ान सबा, नौशाद सुल्तानी और सरफ़राज़ ज़ुहूरी जैसे प्रतिष्ठित शायर अपने कलाम से महफ़िल को यादगार बनाएंगे।

इन साहित्यिक हस्तियों की मौजूदगी इस आयोजन को राष्ट्रीय स्तर की अदबी पहचान देने जा रही है।

नई पीढ़ी को उर्दू अदब से जोड़ने की कोशिश

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की अदबी महफ़िलें केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होतीं, बल्कि वे समाज की सांस्कृतिक चेतना को मज़बूत करने का काम करती हैं।

आज जब युवा पीढ़ी डिजिटल माध्यमों की ओर तेज़ी से बढ़ रही है, ऐसे आयोजनों के ज़रिए उन्हें उर्दू साहित्य, शायरी और तहज़ीबी मूल्यों से जोड़ना बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। “कुछ रुतें डॉक्टर ताहिर रज़्ज़ाक़ी के नाम” इसी सांस्कृतिक और बौद्धिक मिशन का हिस्सा माना जा रहा है।

आयोजकों ने की अधिक से अधिक सहभागिता की अपील

कार्यक्रम के कन्वीनर ज़िया-उस-सहर रज़्ज़ाक़ी और सहायक कन्वीनर डॉक्टर शाकिर इस्लाही ने सभी अदब-नवाज़ लोगों से इस ऐतिहासिक और भावनात्मक शाम में शामिल होने की अपील की है।

उनका कहना है कि यह महफ़िल डॉक्टर ताहिर रज़्ज़ाक़ी की यादों को ताज़ा करने के साथ-साथ उर्दू साहित्य की उस जीवंत परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास है, जिसने हमेशा समाज को मोहब्बत, इल्म और इंसानियत का पैग़ाम दिया है।

संभल के शब्बीर पैलेस में सजने वाली यह अदबी शाम निश्चित रूप से आने वाले समय में एक यादगार साहित्यिक घटना के रूप में याद की जाएगी, जहां शायरी केवल अल्फ़ाज़ नहीं बल्कि एहसास, तहज़ीब और इंसानी रिश्तों की जीवंत तस्वीर बनकर सामने आएगी।



एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.

ADS3

ADS4