संभल | 3 मई 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
मंडी किशन दास सराय स्थित कौसैन मुनव्वर के निवास पर आयोजित इस विशेष समारोह में शहर की जानी-मानी साहित्यिक, सामाजिक और शैक्षिक हस्तियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। कार्यक्रम का वातावरण पूरी तरह अदबी रंगों, इल्मी गुफ़्तगू और शायरी की ख़ुशबू से महका हुआ दिखाई दिया। साहित्यकारों, शिक्षकों, शायरों और उर्दू भाषा से प्रेम रखने वाले लोगों ने बड़ी संख्या में कार्यक्रम में भाग लेकर इसे एक शानदार अदबी महफ़िल में तब्दील कर दिया।
“संभल तरेहि मुशायरे ” ने एक वर्ष की साहित्यिक यात्रा को किया दस्तावेज़
बज़्म-ए-अब्र की ओर से पिछले एक वर्ष से लगातार “संभल तरेहि मुशायरे ” शीर्षक के अंतर्गत महान शायर अल्लामा अब्र अहसनी गुन्नौरी के मिसरा-ए-तरह पर नियमित तरही मुशायरों का आयोजन किया जा रहा था। इन मुशायरों में न केवल सम्भल बल्कि विभिन्न शहरों के शायरों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अपनी बेहतरीन ग़ज़लों, नज़्मों और अशआर के माध्यम से महफ़िलों को यादगार बनाया।
इसी एक वर्ष की साहित्यिक यात्रा को संजोते हुए डॉ. मुनव्वर ताबिश द्वारा चयनित कलाम, शायरों के तआर्रुफ़ और अदबी गतिविधियों को एक उच्चस्तरीय पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया। यह पुस्तक अपने उत्कृष्ट संपादन, साहित्यिक गुणवत्ता और प्रस्तुति के कारण उर्दू अदब की दुनिया में विशेष महत्व रखती है।
कुरआन की तिलावत और नात से हुई कार्यक्रम की शुरुआत
कार्यक्रम का शुभारंभ हकीम माजिद द्वारा पवित्र कुरआन शरीफ़ की तिलावत से हुआ, जिसने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक गरिमा से भर दिया। इसके पश्चात आसी हसन पुरी ने बारगाह-ए-रिसालत में ख़ूबसूरत नात पेश कर श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। प्रारंभिक सत्र में बज़्म-ए-अब्र की साहित्यिक गतिविधियों, उसके उद्देश्यों और उर्दू भाषा के संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया।
“यह पुस्तक उर्दू साहित्य में मील का पत्थर साबित होगी” — डॉ. आबिद हुसैन हैदरी
समारोह के मुख्य अतिथि और प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ. आबिद हुसैन हैदरी ने अपने प्रभावशाली संबोधन में कहा कि सम्भल की धरती सदियों से इल्म, अदब और तहज़ीब की पहचान रही है। यहाँ से अनेक महत्वपूर्ण साहित्यिक रचनाएँ और पुस्तकें प्रकाशित होती रही हैं, लेकिन बज़्म-ए-अब्र की यह प्रस्तुति अपने स्वरूप और उद्देश्य दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
![]() |
| सुल्तान मोहम्मद खान कलीम, डॉ. मुनव्वर ताबिश को सम्मान-पत्र भेंट करते हुए |
उन्होंने कहा कि यह पुस्तक केवल मुशायरों का संग्रह नहीं, बल्कि एक पूरे साहित्यिक आंदोलन का जीवंत दस्तावेज़ है। इसमें शामिल शायरों का परिचय, उनके चयनित कलाम और साहित्यिक दृष्टिकोण नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन का स्रोत बनेंगे। उन्होंने डॉ. मुनव्वर ताबिश की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने अत्यंत गंभीरता, समर्पण और साहित्यिक दृष्टि के साथ इस पुस्तक का संपादन किया है, जो भविष्य में उर्दू साहित्य की दुनिया में एक मील का पत्थर सिद्ध होगी।
नई पीढ़ी में भाषा और अभिव्यक्ति का संस्कार विकसित करते हैं ऐसे आयोजन
मीर शाह हुसैन आरिफ ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम समाज में भाषा, संवेदनशीलता और अभिव्यक्ति की शक्ति को जीवित रखने का कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जब नई पीढ़ी डिजिटल माध्यमों की ओर अधिक आकर्षित हो रही है, ऐसे आयोजनों की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।
उन्होंने उम्मीद जताई कि बज़्म-ए-अब्र भविष्य में भी इसी उत्साह और प्रतिबद्धता के साथ अपनी साहित्यिक गतिविधियों को जारी रखेगी और उर्दू अदब को नई रचनात्मक ऊँचाइयाँ प्रदान करेगी।
प्रतिष्ठित हस्तियों ने किया पुस्तक का औपचारिक लोकार्पण
समारोह का सबसे विशेष क्षण वह रहा जब शहर की प्रतिष्ठित साहित्यिक और सामाजिक हस्तियों ने सामूहिक रूप से पुस्तक का औपचारिक विमोचन किया। इस अवसर पर ज़मीर सालकी अदीबी, शकील साबरी, डॉ. नफीस अहमद नफीस, सैयद हुसैन अफसर, सुल्तान मोहम्मद खान कलीम, मीर शाह हुसैन आरिफ, ज़िया-उस-सहर रज़्ज़ाकी, शफीकुर्रहमान बरकाती, ज़िया-उर-रहमान बरकाती, सुहैल चमन, ताहिर सलामी, डॉ. शाकिर हुसैन इस्लाही, निज़ाम नौशाही, ताहिर हुसैन ताहिर और डॉ. नाज़िम कुंदरकीवी सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
पुस्तक के विमोचन के साथ ही उपस्थित साहित्यप्रेमियों ने इस प्रयास की खुले दिल से सराहना की और इसे सम्भल के साहित्यिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।
सम्मान और उपहारों से नवाज़े गए डॉ. मुनव्वर ताबिश
कार्यक्रम के दौरान बज़्म-ए-अब्र के संरक्षक सुल्तान मोहम्मद खान कलीम ने डॉ. मुनव्वर ताबिश को सम्मान-पत्र भेंट कर उनके साहित्यिक योगदान की सराहना की। वहीं शफीकुर्रहमान बरकाती ने उन्हें चाँदी का कलम भेंट किया, जो साहित्य और लेखन के प्रति सम्मान का प्रतीक बना। ज़िया-उर-रहमान बरकाती ने भी विशेष उपहार देकर डॉ. ताबिश के प्रयासों को सम्मानित किया।
![]() |
| ज़िया उर रेहमान बरकाती से उपहार प्राप्त करते हुए मुनव्वर ताबिश साहब |
इन सम्मानों ने समारोह को और अधिक भावनात्मक तथा प्रेरणादायक बना दिया।
संक्षिप्त मुशायरे ने बाँधा समां
पुस्तक विमोचन के पश्चात एक संक्षिप्त लेकिन शानदार मुशायरे का आयोजन भी किया गया, जिसमें उपस्थित शायरों ने अपने चुनिंदा अशआर और कलाम पेश किए। शायरी की इस महफ़िल ने देर तक समां बाँधे रखा और श्रोताओं ने दिल खोलकर दाद पेश की।
मुशायरे में पेश किए गए अशआर ने न केवल उर्दू शायरी की मिठास को जीवंत किया, बल्कि यह भी साबित किया कि सम्भल की धरती आज भी अदब और तहज़ीब की परंपरा को मजबूती से आगे बढ़ा रही है।
साहित्यिक इतिहास में दर्ज हुआ यादगार समारोह
यह पूरा आयोजन सम्भल की साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए एक गौरवपूर्ण अध्याय बनकर सामने आया। बज़्म-ए-अब्र ने जिस गंभीरता और प्रतिबद्धता के साथ उर्दू साहित्य की सेवा का बीड़ा उठाया है, वह आने वाले समय में निश्चित रूप से नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनेगा।
![]() |
| मुशायरे का आनंद लेते हुए श्रोता |
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार ज़मीर सालकी अदीबी ने की, जबकि संचालन की ज़िम्मेदारी डॉ. शाकिर हुसैन इस्लाही ने अत्यंत कुशलता और प्रभावशाली अंदाज़ में निभाई।
संभल की इस अदबी शाम ने यह संदेश दिया कि जब साहित्य, तहज़ीब और विचार एक मंच पर एकत्र होते हैं, तो केवल एक कार्यक्रम नहीं बल्कि इतिहास रचा जाता है।


.jpg)
.jpg)