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इज़राइल यात्रा के बाद घिरे प्रधानमंत्री मोदी: ईरान पर हमलों के बीच भारत की कूटनीति, अर्थव्यवस्था और रणनीतिक संतुलन पर उठे सवाल

 2 मार्च  2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार

प्रधानमंत्री Narendra Modi की हालिया इज़राइल यात्रा ऐसे समय में हुई जब पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक परिदृश्य असाधारण तनाव से गुजर रहा था। दो दिवसीय इस दौरे में भारत और इज़राइल के बीच रक्षा सहयोग, व्यापार विस्तार और काउंटर-टेररिज़्म साझेदारी को मजबूत करने पर जोर दिया गया। लेकिन यात्रा के कुछ ही दिनों बाद ईरान पर हुए समन्वित हवाई हमलों ने भारत की कूटनीतिक स्थिति को जटिल बना दिया है। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि यह दौरा “गलत समय” पर हुआ और इससे भारत की पारंपरिक संतुलित विदेश नीति पर प्रश्नचिह्न लग गया।


विपक्ष का हमला: “तटस्थता से विचलन” का आरोप

मुख्य विपक्षी दल Indian National Congress ने प्रधानमंत्री की यात्रा को “समय से असंगत” बताते हुए कहा कि इससे इज़राइल के साथ “पक्षपातपूर्ण संरेखण” (partisan alignment) का संदेश गया। पार्टी प्रवक्ता जयराम रमेश ने इसे भारत के मूल्यों और सिद्धांतों से विचलन बताया। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने ईरान के सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei की हत्या को “निंदनीय” करार दिया।

वामपंथी दल Communist Party of India ने भी हमलों की तीखी आलोचना की और कहा कि भारत को किसी भी सैन्य कार्रवाई का समर्थन नहीं करना चाहिए। पूर्व राजनयिक के.सी. सिंह ने मीडिया साक्षात्कार में कहा कि इस दौरे से भारत की “रणनीतिक तटस्थता” (strategic neutrality) पर आंच आई है।


सरकार की प्रतिक्रिया: संतुलन साधने की कोशिश

प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से इज़राइल और संयुक्त अरब अमीरात के नेताओं से बातचीत की जानकारी दी। उन्होंने क्षेत्र में हिंसा रोकने की अपील की, हालांकि ईरान का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया। इज़राइल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu से वार्ता में उन्होंने शांति और स्थिरता की आवश्यकता पर बल दिया।

विदेश मंत्रालय की ओर से औपचारिक विस्तृत बयान सामने नहीं आया, जिससे राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।


कश्मीर में विरोध प्रदर्शन, सामाजिक संवेदनशीलता

भारत के एकमात्र मुस्लिम-बहुल क्षेत्र Jammu and Kashmir के कुछ हिस्सों में विरोध प्रदर्शन देखने को मिले। क्षेत्र के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने शांति बनाए रखने की अपील की और पुलिस से संयम बरतने को कहा। यह घटनाक्रम दर्शाता है कि पश्चिम एशिया का संकट भारत की आंतरिक सामाजिक-राजनीतिक संवेदनशीलताओं को भी प्रभावित कर सकता है।


आर्थिक प्रभाव: तेल कीमतों से बढ़ी चिंता

ईरान संकट का सबसे तात्कालिक असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है। होरमुज़ जलडमरूमध्य में व्यवधान की आशंका से वैश्विक बाज़ार में उथल-पुथल मच गई। ब्रेंट क्रूड की कीमत 13% तक उछलकर 82 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई—जो जनवरी 2025 के बाद का उच्चतम स्तर है।

भारत प्रतिदिन लगभग 50 लाख बैरल तेल आयात करता है और विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। यदि तेल कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर टिकती हैं, तो चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) लगभग 10 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। इससे रुपये पर दबाव और ईंधन मुद्रास्फीति (fuel inflation) में वृद्धि की आशंका है।

इंडसइंड बैंक के अर्थशास्त्री गौरव कपूर के अनुसार, “तेल की ऊंची कीमतें भारत के व्यापार संतुलन और मुद्रा स्थिरता दोनों के लिए चुनौती बन सकती हैं।”


तेल आयात का समीकरण और रूस फैक्टर

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत अपने लगभग 32% तेल आयात रूस से करता रहा है, जबकि 18% इराक से और शेष खाड़ी देशों व अमेरिका से। लेकिन अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा रूस से आयात रोकने के दबाव में लगाए गए दंडात्मक टैरिफ के बाद रूसी आपूर्ति में गिरावट आई है। ऐसे में पश्चिम एशिया में अस्थिरता भारत के ऊर्जा सुरक्षा समीकरण को और जटिल बना सकती है।


व्यापार और लॉजिस्टिक्स पर असर

यदि लाल सागर और खाड़ी के प्रमुख समुद्री मार्ग बाधित होते हैं, तो जहाजों को केप ऑफ गुड होप के रास्ते भेजना पड़ेगा, जिससे 15–20 दिन अतिरिक्त लग सकते हैं। इससे निर्यात लागत बढ़ेगी और आपूर्ति शृंखला (supply chain) बाधित होगी।

भारतीय निर्यात संगठनों के अनुसार, मध्य-पूर्व के लिए माल ढुलाई अस्थायी रूप से प्रभावित हुई है। स्थिति अत्यधिक अस्थिर (highly volatile) बताई जा रही है।


चाबहार पोर्ट: रणनीतिक निवेश पर संकट

ईरान में स्थित Chabahar Port भारत की क्षेत्रीय रणनीति का अहम हिस्सा है। 2024 में भारत ने इस बंदरगाह के संचालन के लिए दीर्घकालिक समझौता किया था, जिससे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पाकिस्तान को बायपास कर पहुंच बनाई जा सके। लेकिन ईरान पर प्रतिबंधों और वर्तमान संकट के कारण यह निवेश जोखिम में पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय नीति का महत्वपूर्ण साझेदार रहा है—विशेषकर अफगानिस्तान जैसे मुद्दों पर। ऐसे में यह संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं होगा, परंतु वर्तमान संकट अनिश्चितता अवश्य बढ़ा रहा है।


कूटनीतिक संतुलन की चुनौती

भारत परंपरागत रूप से “रणनीतिक स्वायत्तता” (strategic autonomy) की नीति अपनाता आया है—जहाँ वह अमेरिका, इज़राइल, ईरान और खाड़ी देशों के साथ समानांतर संबंध बनाए रखता है। लेकिन मौजूदा संकट ने इस संतुलन को कठिन परीक्षा में डाल दिया है।

एक ओर रक्षा और टेक्नोलॉजी साझेदारी के लिए इज़राइल महत्वपूर्ण है, तो दूसरी ओर ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए ईरान व खाड़ी देश अनिवार्य हैं। भारत के लगभग 90 लाख नागरिक खाड़ी क्षेत्र में कार्यरत हैं, जिनकी सुरक्षा भी सर्वोच्च प्राथमिकता है।


निष्कर्ष:-

 अनिश्चितता के दौर में भारत की अग्निपरीक्षा

पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव ने भारत की विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता—तीनों को एक साथ चुनौती दी है। प्रधानमंत्री मोदी की इज़राइल यात्रा ने कूटनीतिक बहस को तेज कर दिया है, जबकि सरकार संतुलित संदेश देने की कोशिश में है।

आने वाले दिनों में तेल कीमतों, समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय कूटनीति की दिशा तय करेगी कि यह संकट भारत के लिए अल्पकालिक झटका साबित होगा या दीर्घकालिक रणनीतिक पुनर्संतुलन का कारण बनेगा। भारत के लिए यह समय धैर्य, संतुलन और बहुपक्षीय संवाद को प्राथमिकता देने का है—ताकि राष्ट्रीय हित, आर्थिक स्थिरता और क्षेत्रीय शांति तीनों सुरक्षित रह सकें।

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