2 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार
न्यूयॉर्क सिटी के नवनियुक्त मेयर ज़ोहरान ममदानी द्वारा छात्र नेता उमर ख़ालिद के नाम लिखा गया एक साधारण-सा हस्तलिखित नोट इस समय असाधारण राजनीतिक, क़ानूनी और कूटनीतिक महत्व हासिल कर चुका है। यह मामला अब केवल एक व्यक्ति की गिरफ़्तारी या ज़मानत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम नागरिक स्वतंत्रता, न्यायिक प्रक्रिया बनाम अंतरराष्ट्रीय दबाव, और संप्रभुता बनाम वैश्विक मानवाधिकार विमर्श की बहस का केंद्र बन चुका है।
एक संदेश, जिसने सीमाएँ लांघ दीं
ज़ोहरान ममदानी ने उमर ख़ालिद को भेजे अपने संक्षिप्त संदेश में लिखा—
“प्रिय उमर, मैं अक्सर आपकी उस बात के बारे में सोचता हूं जिसमें आपने कड़वाहट को अपने भीतर हावी न होने देने की अहमियत बताई थी। आपके माता-पिता से मिलकर मुझे खुशी हुई। हम सब आपके साथ हैं।”
यह नोट उमर ख़ालिद की साथी बनज्योत्सना लाहिड़ी द्वारा सोशल मीडिया पर साझा किया गया। देखते ही देखते यह संदेश व्यक्तिगत संवेदना से आगे बढ़कर राजनीतिक प्रतीक बन गया। समर्थकों के लिए यह एकजुटता और नैतिक समर्थन का संकेत है, जबकि आलोचकों के लिए यह भारत की न्यायिक प्रक्रिया में बाहरी हस्तक्षेप का उदाहरण।
उमर ख़ालिद: गिरफ़्तारी से अब तक की क़ानूनी यात्रा
जेएनयू के पूर्व पीएचडी शोधार्थी और छात्र नेता उमर ख़ालिद को सितंबर 2020 में दिल्ली दंगों से जुड़े एक कथित षड्यंत्र के मामले में गिरफ़्तार किया गया था। उनके ख़िलाफ़ यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया गया, जो भारत के सबसे सख़्त आतंकवाद-रोधी क़ानूनों में से एक है।
हालांकि, एक एफआईआर में उन्हें आरोपों से मुक्त किया जा चुका है, लेकिन यूएपीए से जुड़े दूसरे मामले में वे अब भी न्यायिक हिरासत में हैं। पिछले पाँच वर्षों में उनकी ज़मानत याचिकाएं कई बार ख़ारिज हुई हैं। दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना फ़ैसला सुरक्षित रखा, जिससे यह स्पष्ट है कि अंतिम निर्णय अब भी न्यायपालिका के हाथ में है।
दिसंबर में उन्हें मानवीय आधार पर अपनी बहन की शादी में शामिल होने की अनुमति दी गई, लेकिन ज़मानत की सख़्त शर्तों के चलते वे घर से बाहर तक नहीं जा सके। यह स्थिति उनके समर्थकों के लिए क़ानून की कठोरता का प्रतीक बनी, जबकि सरकार समर्थकों ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा आवश्यक एहतियात बताया।
अमेरिका में बढ़ता समर्थन और राजनीतिक एकजुटता
ज़ोहरान ममदानी इससे पहले भी सार्वजनिक मंचों पर उमर ख़ालिद के समर्थन में बोल चुके हैं। जून 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा से पहले न्यूयॉर्क में आयोजित ‘हाउडी डेमोक्रेसी’ कार्यक्रम में ममदानी ने जेल से लिखे उमर ख़ालिद के पत्र के अंश पढ़े थे।
अब ममदानी अकेले नहीं हैं। अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी के कई सांसद—जिम मैकगवर्न, जेमी रस्किन, प्रमिला जयपाल, रशीदा तलैब, क्रिस वैन होलेन और अन्य—ने भारत के अधिकारियों को पत्र लिखकर उमर ख़ालिद को ज़मानत देने और उनके मुक़दमे को शीघ्र शुरू करने की अपील की है।
इन सांसदों का तर्क है कि बिना ट्रायल के वर्षों तक हिरासत अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के विपरीत है। यह तर्क अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गूंज रहा है और भारत की लोकतांत्रिक छवि को लेकर नई बहस छेड़ रहा है।
भारत की प्रतिक्रिया: संप्रभुता और न्यायिक स्वतंत्रता का सवाल
इस अमेरिकी अपील पर भारत में तीखी प्रतिक्रिया भी देखने को मिली है। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने इसे भारत के आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप बताया। उनका कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश की न्यायिक प्रक्रिया बाहरी राजनीतिक दबाव से संचालित नहीं हो सकती।
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि ऐसे बयान उस समय भारत-अमेरिका संबंधों को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जब दोनों देश रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा साझेदारी को मज़बूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
राजनीतिक और वैचारिक पृष्ठभूमि
उमर ख़ालिद का नाम पहली बार 2016 में जेएनयू विवाद के दौरान कन्हैया कुमार के साथ राष्ट्रीय बहस में आया था। इसके बाद उनके कुछ बयानों और सोशल मीडिया गतिविधियों को लेकर वे लगातार विवादों में रहे। समर्थक उन्हें असहमति की आवाज़ मानते हैं, जबकि आलोचक उन्हें राष्ट्र-विरोधी विचारधारा से जोड़ते हैं।
2018 में उन पर हुआ कथित गोलीबारी का हमला, कश्मीर मुद्दे पर उनकी पोस्ट्स और दिल्ली दंगों से जुड़ा मामला—इन सभी घटनाओं ने उमर ख़ालिद को भारत के सबसे विवादित सार्वजनिक चेहरों में शामिल कर दिया।
एक व्यक्ति से आगे का सवाल
ज़ोहरान ममदानी का हस्तलिखित नोट और अमेरिकी सांसदों की चिट्ठी इस बात का संकेत हैं कि उमर ख़ालिद का मामला अब एक व्यक्ति की क़ानूनी लड़ाई नहीं रहा। यह मामला आज—
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आतंकवाद-रोधी क़ानूनों की व्याख्या
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नागरिक स्वतंत्रता की सीमाएं
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न्यायिक प्रक्रिया की गति
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और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विमर्श
इन सभी सवालों का संगम बन चुका है।
निष्कर्ष:-
भारत के लिए एक जटिल परीक्षा
अंततः उमर ख़ालिद का भविष्य भारतीय न्यायपालिका तय करेगी। लेकिन यह स्पष्ट है कि इस मामले ने भारत को एक कठिन संतुलन साधने की स्थिति में खड़ा कर दिया है—जहाँ उसे राष्ट्रीय सुरक्षा, न्यायिक स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय लोकतांत्रिक छवि के बीच संतुलन बनाना होगा।
ज़ोहरान ममदानी का वह छोटा-सा नोट शायद क़ानूनी फ़ैसलों को न बदले, लेकिन उसने यह ज़रूर साबित कर दिया है कि आज की दुनिया में स्थानीय न्यायिक मामले भी वैश्विक राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं।

