3 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
देशभर में स्वच्छता का मॉडल माने जाने वाले और लगातार आठ वर्षों से भारत का ‘सबसे स्वच्छ शहर’ घोषित इंदौर में एक गंभीर और शर्मनाक स्वास्थ्य आपदा सामने आई है। सीवेज से दूषित पेयजल के सेवन के कारण अब तक कम से कम 10 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें पांच महीने का एक मासूम बच्चा भी शामिल है, जबकि 270 से अधिक लोग अस्पतालों में भर्ती कराए गए हैं। कई मरीजों की हालत अब भी नाजुक बनी हुई है।
यह घटना न केवल इंदौर की तथाकथित स्वच्छता व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि देश की जल प्रबंधन और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की गहरी खामियों को भी उजागर करती है।
महीनों से चेतावनी दे रहे थे लोग, प्रशासन ने नहीं सुनी
इंदौर के भागीरथपुरा इलाके, जो एक घनी आबादी वाला और आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्र है, वहां के निवासी पिछले कई महीनों से नल के पानी में बदबू, गंदगी और रंग बदलने की शिकायत कर रहे थे। स्थानीय लोगों के अनुसार, उन्होंने नगर निगम और जल आपूर्ति विभाग को कई बार शिकायतें दीं, लेकिन हर बार फाइलें दफ्तरों में ही घूमती रहीं।
विडंबना यह है कि जिस शहर को कचरा पृथक्करण, सफाई और रैंकिंग के लिए देशभर में सराहा जाता रहा, वहीं पेयजल जैसी बुनियादी सुविधा की अनदेखी ने जानलेवा रूप ले लिया।
सीवेज कैसे मिला पानी में? जांच में बड़ा खुलासा
नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि एक सार्वजनिक शौचालय को पेयजल पाइपलाइन के ठीक ऊपर बना दिया गया था, और वह भी बिना सेप्टिक टैंक के। इसी वजह से सीवेज सीधे पानी की मुख्य लाइन में रिसने लगा।
इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने स्वीकार किया कि
“मुख्य जल टैंक से आने वाली लाइन में सीवेज मिल रहा था, जिसके कारण डायरिया और गंभीर संक्रमण फैला।”
उल्टी, दस्त और तेज बुखार से अस्पतालों में हड़कंप
सोमवार रात से ही इलाके के लोग उल्टी, दस्त, तेज बुखार और डिहाइड्रेशन की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचने लगे। देखते ही देखते सरकारी और निजी अस्पतालों में मरीजों की भीड़ लग गई।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार:
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कम से कम 32 मरीज ICU में भर्ती हैं
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2,456 संदिग्ध मरीजों की पहचान घर-घर जाकर की गई
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कई लोगों को मौके पर ही प्राथमिक उपचार देना पड़ा
पानी के सैंपल की जांच में मानव मल से जुड़े खतरनाक बैक्टीरिया पाए गए, जो सीधे सीवेज प्रदूषण की पुष्टि करते हैं।
मासूम की मौत ने झकझोरा, पिता का दर्दनाक बयान
पांच महीने के बच्चे की मौत ने पूरे शहर को झकझोर दिया। बच्चे के पिता सुनील साहू ने बताया:
“हमने नल के पानी को फिल्टर करके बोतल में पिलाया। हमें कभी नहीं बताया गया कि पानी ज़हरीला है। पूरे मोहल्ले में वही पानी आ रहा था, कोई चेतावनी नहीं दी गई।”
यह बयान प्रशासनिक संवेदनहीनता की भयावह तस्वीर पेश करता है।
प्रशासनिक लापरवाही पर गिरी गाज, अधिकारी निलंबित
नगर निगम के पार्षद कमल वाघेला ने इस मामले को
“ड्यूटी में घोर लापरवाही (Gross Dereliction of Duty)”
करार दिया है।
जांच पूरी होने तक कई नगर निगम अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है, हालांकि स्थानीय लोग इसे केवल प्रतीकात्मक कार्रवाई मान रहे हैं।
राजनीति गरमाई, विपक्ष ने सरकार को घेरा
इस त्रासदी को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी भी तेज हो गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भाजपा-शासित राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए कहा:
“स्वच्छ पानी कोई एहसान नहीं, बल्कि जीवन का मौलिक अधिकार है। इस लापरवाही की जवाबदेही तय होनी चाहिए।”
वहीं मुख्यमंत्री मोहन यादव ने आश्वासन दिया कि:
“ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए नए नियम बनाए जाएंगे और किसी को बख्शा नहीं जाएगा।”
राष्ट्रीय जल सुरक्षा पर बड़ा सवाल
यह घटना ऐसे समय सामने आई है जब देशभर में पेयजल की गुणवत्ता को लेकर गंभीर चिंताएं पहले से मौजूद हैं। रिपोर्टों के मुताबिक:
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दिल्ली सरकार की केवल 8% जल परीक्षण लैब्स ही राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त हैं
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देशभर में भी केवल 59% सरकारी जल लैब्स मानकों पर खरी उतरती हैं
विशेषज्ञों का कहना है कि तेजी से बढ़ती शहरी आबादी, कमजोर निगरानी और अधूरी जांच व्यवस्था आने वाले समय में और बड़े जलजनित रोग प्रकोप का कारण बन सकती है।
‘स्वच्छता रैंकिंग’ बनाम ज़मीनी हकीकत
इंदौर की यह त्रासदी पूरे देश के लिए एक चेतावनी है कि अगर जल प्रबंधन को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो ‘स्वच्छ शहर’ का तमगा भी जानें नहीं बचा पाएगा।
