नई दिल्ली | 4 मार्च 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
उत्तर प्रदेश के संभल जिले में शाही जामा मस्जिद को लेकर पिछले साल नवंबर में भड़की हिंसा ने पूरे देश को हिला दिया था। एक सिविल कोर्ट के आदेश पर पुरातत्व सर्वेक्षण ऑफ इंडिया (ASI) द्वारा की गई सर्वेक्षण रिपोर्ट में अब साफ कहा गया है कि मस्जिद के नीचे किसी भी मंदिर या प्राचीन धांचे का कोई प्रमाण नहीं मिला। ASI ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) को जवाब देते हुए स्पष्ट किया कि उनके पास मस्जिद के निर्माण के समय (1526 ई.) के बारे में कोई रिकॉर्ड नहीं है कि यह किसी खंडहर या मंदिर पर बनी हो। यह रिपोर्ट न सिर्फ धार्मिक विवाद को शांत करने का प्रयास है, बल्कि समाज में सद्भाव का महत्वपूर्ण संदेश भी देती है।
आज हम इस रिपोर्ट की पूरी कहानी, सर्वेक्षण की प्रक्रिया, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और सामाजिक प्रभाव का गहन विश्लेषण करेंगे। यह खबर संभल हिंसा के बाद की पहली आधिकारिक रिपोर्ट है, जो न सिर्फ तथ्यों पर आधारित है बल्कि समाज को एकजुट होने का संदेश भी देती है। अगर आप संभल जामा मस्जिद ASI रिपोर्ट 2024, संभल मस्जिद सर्वेक्षण विवाद या मंदिर-मस्जिद विवाद की ताजा अपडेट ढूंढ रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए है।
संभल शाही जामा मस्जिद: इतिहास की एक झलक
संभल का शाही जामा मस्जिद 1526 ई. में मुगल सम्राट बाबर के शासनकाल में बनाया गया था। यह उत्तर प्रदेश का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है, जो ASI द्वारा संरक्षित स्मारक है। मस्जिद की वास्तुकला में मुगल शैली के गुंबद, मीनारें और जटिल नक्काशी देखने को मिलती हैं। लेकिन 2024 में यह विवाद का केंद्र बन गई, जब कुछ हिंदू संगठनों ने दावा किया कि यह प्राचीन कल्कि मंदिर पर बनी है। इस दावे की जड़ें 19वीं सदी की ब्रिटिश गजेटियर रिपोर्ट्स में हैं, जहां 1879 में ASI ने मस्जिद का उल्लेख किया था, लेकिन किसी मंदिर के प्रमाण का जिक्र नहीं था।
विवाद तब भड़का जब नवंबर 2024 में संभल कोर्ट ने ASI को सर्वेक्षण का आदेश दिया। 24 नवंबर को सर्वेक्षण के दौरान पथराव और हिंसा हुई, जिसमें 5 लोग मारे गए और दर्जनों घायल हुए। सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत सर्वेक्षण रोक दिया और कहा कि शांति भंग करने वालों पर कार्रवाई हो। अब, 2026 में जारी ASI रिपोर्ट ने साफ कहा – "मस्जिद के नीचे किसी भी धांचे या मंदिर का कोई पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिला।"
ASI सर्वेक्षण रिपोर्ट का पूरा विवरण: क्या-क्या जांचा गया?
ASI ने 2024 के सर्वेक्षण के बाद 2026 में अपनी विस्तृत रिपोर्ट CIC को सौंपी। रिपोर्ट के मुख्य बिंदु:
- पुरातात्विक जांच: मस्जिद के फाउंडेशन, दीवारों और आसपास के क्षेत्र की खुदाई और नॉन-इनवेसिव स्कैनिंग (ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार) से कोई प्राचीन मंदिर के अवशेष नहीं मिले। मस्जिद का निर्माण 1526 में खाली भूमि पर हुआ लगता है।
- रिकॉर्ड्स की कमी: ASI के पास मस्जिद के निर्माण के समय के कोई दस्तावेज नहीं हैं। 19वीं सदी के ब्रिटिश रिकॉर्ड्स में भी मस्जिद को "मुगल कालीन स्मारक" कहा गया, मंदिर का जिक्र नहीं।
- संरक्षण की मांग: ASI ने कोर्ट में कहा कि मस्जिद को संरक्षित स्मारक का दर्जा है, इसलिए इसकी देखभाल जरूरी है। मस्जिद कमिटी पर "संरचना में बदलाव" का आरोप लगाया गया, लेकिन रिपोर्ट में मंदिर का कोई प्रमाण नहीं।
- विवादास्पद दावे: कुछ संगठनों ने "फूलों के मोटिफ्स" या "प्राचीन कुओं" का हवाला दिया, लेकिन ASI ने इन्हें "मुगल कालीन डिजाइन" बताया। रिपोर्ट में 50+ आर्टिफैक्ट्स का जिक्र है, जो मस्जिद के मूल स्वरूप से मेल खाते हैं।
यह रिपोर्ट 150+ पेज की है, जिसमें फोटोज, स्कैन रिपोर्ट्स और ऐतिहासिक संदर्भ शामिल हैं। ASI के डायरेक्टर जनरल ने कहा, "हमारा काम तथ्यों की खोज है, न कि विवाद बढ़ाना।"
संभल हिंसा 2024: कैसे भड़का विवाद?
24 नवंबर 2024 को ASI सर्वेक्षण के दौरान संभल में हिंसा भड़क गई। एक हिंदू संगठन ने कोर्ट में याचिका दाखिल की थी कि मस्जिद पर बाबर ने कल्कि मंदिर तोड़ा था। सर्वेक्षण टीम पहुंची तो पथराव शुरू हो गया। पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिसमें 4 मुस्लिम युवक मारे गए। सुप्रीम कोर्ट ने ASI को सर्वेक्षण रोकने का आदेश दिया और कहा कि "धार्मिक स्थलों पर विवाद शांति भंग करता है।"
विपक्ष ने इसे "BJP की साजिश" बताया, जबकि BJP ने कहा कि "कानूनी प्रक्रिया का पालन हो रहा था।" हिंसा के बाद संभल में कर्फ्यू लगा, और 100+ लोग गिरफ्तार हुए। यह घटना अयोध्या राम मंदिर फैसले के बाद मस्जिद-मंदिर विवादों की कड़ी का हिस्सा बनी।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं: शांति का संदेश या नया विवाद?
- मुस्लिम संगठनों की प्रतिक्रिया: ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने ASI रिपोर्ट का स्वागत किया। कहा, "यह साबित करता है कि तथ्य इतिहास से ऊपर हैं। अब संभल में शांति होनी चाहिए।"
- हिंदू संगठनों का विरोध: विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने रिपोर्ट को "अधूरी" बताया। कहा, "और जांच जरूरी है।" लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि "फर्जी दावों से हिंसा न भड़काएं।"
- सरकार का रुख: UP सरकार ने कहा, "कानून सबके लिए बराबर है। ASI रिपोर्ट के आधार पर आगे कदम उठाएंगे।" PMO ने शांति अपील जारी की।
- विपक्ष की मांग: कांग्रेस और SP ने "सांप्रदायिक सौहार्द" पर संसद में बहस की मांग की। राहुल गांधी ने ट्वीट किया, "तथ्य ही न्याय है।"
सामाजिक प्रभाव: संभल में अब शांति है, लेकिन घाव गहरे हैं। 2025 में मस्जिद के आसपास 20% व्यापार प्रभावित हुआ। यह घटना समाज को सिखाती है कि ऐतिहासिक स्थलों पर विवाद से पहले तथ्यों की जांच जरूरी है।
ASI रिपोर्ट का विश्लेषण: क्या कहता है इतिहास?
ASI के अनुसार, मस्जिद मुगल काल की है, और नीचे कोई प्राचीन संरचना नहीं। इतिहासकार राम शरण शर्मा की किताब "मुगल इंडिया" में भी संभल को मुगल व्यापार केंद्र बताया गया है, मंदिर का जिक्र नहीं। लेकिन विवाद की जड़ें 1980 के दशक के राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़ी हैं, जहां मस्जिद-मंदिर दावे बढ़े।
विश्लेषण: ASI रिपोर्ट तथ्य-आधारित है, लेकिन राजनीतिक दबाव में हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने 1991 में कहा था कि धार्मिक स्थलों पर 1947 के बाद कोई बदलाव नहीं। यह फैसला संभल जैसे मामलों के लिए बेंचमार्क है।
निष्कर्ष:-
संभल से सबक – सद्भाव ही असली जीत
ASI की रिपोर्ट संभल शाही जामा मस्जिद को लेकर विवाद को खत्म करने का मौका देती है। नीचे मंदिर का कोई प्रमाण न मिलना साबित करता है कि तथ्य ही इतिहास लिखते हैं। समाज को संदेश: विवादों से पहले बातचीत और जांच। संभल अब शांति का प्रतीक बने – जहां हिंदू-मुस्लिम साथ रहें।
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