23 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
संभल (उत्तर प्रदेश) की ज़िला अदालत परिसर बुधवार को असामान्य दृश्य का गवाह बनी, जब दर्जनों वकील सड़कों पर उतर आए। नारे गूंज रहे थे—
“गुंडागर्दी नहीं चलेगी… तानाशाही नहीं चलेगी… सीजेएम साहब को वापस लाओ!”
यह विरोध प्रदर्शन किसी साधारण तबादले के खिलाफ नहीं था, बल्कि उस न्यायिक आदेश की पृष्ठभूमि में था जिसने पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। मामला जुड़ा है संभल हिंसा, तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी, और उस आदेश से, जिसमें 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए गए थे।
क्यों भड़का वकीलों का आक्रोश?
संभल के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट विभांशु सुधीर का अचानक तबादला कर उन्हें सुल्तानपुर में सिविल जज (सीनियर डिविजन) बना दिया गया। यह आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट के प्रशासनिक फैसले के तहत आया, जिसमें कुल 14 न्यायिक अधिकारियों का स्थानांतरण किया गया।
लेकिन इस तबादले का समय और संदर्भ—दोनों ने सवाल खड़े कर दिए।
वरिष्ठ अधिवक्ता रोहन सिंह यादव का कहना है—
“जब अख़बारों में तबादले की खबर आई, तो आम लोगों में यह संदेश गया कि सीजेएम पर दबाव था। लोगों को लगा कि पुलिस प्रशासन के खिलाफ गए फैसले की ‘कीमत’ चुकाई जा रही है।”
वकीलों का दावा है कि विभांशु सुधीर एक न्यायप्रिय, निष्पक्ष और साहसी अधिकारी के रूप में जाने जाते थे, जिनकी कार्यशैली से न सिर्फ अधिवक्ता बल्कि आम नागरिक भी संतुष्ट थे।
अनुज चौधरी केस: वह आदेश जिसने व्यवस्था को झकझोर दिया
13 जनवरी 2026 को सीजेएम विभांशु सुधीर ने संभल हिंसा से जुड़े एक मामले में ऐतिहासिक आदेश पारित किया। याचिकाकर्ता यामीन ने आरोप लगाया था कि 24 नवंबर 2024 को उनका बेटा जामा मस्जिद के पास ठेले पर बिस्किट बेच रहा था, तभी पुलिस फायरिंग में उसे गोली लगी।
याचिका में प्रस्तुत किए गए थे—
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मेडिकल रिपोर्ट
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ऑपरेशन के दौरान निकाली गई गोली
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इलाज से जुड़े दस्तावेज़
सीजेएम ने अपने 11 पन्नों के आदेश में कहा—
“सरकारी ड्यूटी का हवाला देकर किसी संभावित आपराधिक कृत्य को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। किसी नागरिक पर गोली चलाना पुलिस की ड्यूटी का हिस्सा नहीं हो सकता।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस रिपोर्ट और मेडिकल साक्ष्यों में गंभीर विरोधाभास है। इसी आधार पर तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी समेत 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया गया।
तबादले के बाद उठता सवाल—‘न्याय कैसे मिलेगा?’
सीजेएम के तबादले की खबर सामने आते ही पीड़ित परिवार में निराशा फैल गई। याचिकाकर्ता की बेटी रज़िया ने अपने वकील से फोन पर सिर्फ एक सवाल पूछा—
“अब हमें न्याय कौन देगा?”
यह सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना बन गया है जिसमें न्याय और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बीच की रेखा धुंधली होती नज़र आती है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: न्यायपालिका बनाम सत्ता?
समाजवादी पार्टी प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस तबादले को लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत बताया। उन्होंने लिखा—
“सत्य का स्थानांतरण नहीं होता। न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आघात लोकतंत्र पर सीधा हमला है।”
इससे पहले भी वे अनुज चौधरी के खिलाफ एफआईआर के आदेश को ऐतिहासिक बताते हुए कह चुके थे कि “अब उन्हें बचाने कोई नहीं आएगा।”
लेकिन क्या वाकई यह दंडात्मक ट्रांसफर है?
उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह इस पूरे विवाद को अलग नज़रिये से देखते हैं। उनके मुताबिक—
“न्यायिक अधिकारियों के तबादले हाईकोर्ट के प्रशासनिक अधिकार में आते हैं। इसे राज्य सरकार या पुलिस दबाव से जोड़ना पूरी तरह गलत है।”
उनका कहना है कि हर सरकारी अधिकारी अपने करियर में 15–20 बार ट्रांसफर झेलता है और इसे सज़ा की तरह देखना भ्रम फैलाने जैसा है।
कौन हैं अनुज चौधरी, जिन पर केंद्रित है पूरा विवाद?
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2012 बैच के डिप्टी एसपी
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अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित पहलवान
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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व
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सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स
संभल हिंसा, होली-जुमा बयान, ईद-गुझिया टिप्पणी और आज़म ख़ान से सार्वजनिक बहस—इन सबने उन्हें एक विवादास्पद लेकिन प्रभावशाली पुलिस अधिकारी के रूप में स्थापित किया है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद उनके बयानों का बचाव कर चुके हैं और उन्हें “पहलवान की स्पष्ट भाषा” कह चुके हैं।
निष्कर्ष:
प्रशासनिक प्रक्रिया या न्याय पर असर?
कानूनी रूप से सीजेएम का तबादला एक प्रशासनिक निर्णय हो सकता है, लेकिन सामाजिक और नैतिक दृष्टि से यह मामला कहीं गहरे सवाल छोड़ जाता है—
क्या संवेदनशील मामलों में समयबद्ध ट्रांसफर भरोसे को कमजोर करता है?
संभल का यह मामला अब सिर्फ एक एफआईआर या तबादले की कहानी नहीं, बल्कि न्यायपालिका, पुलिस और लोकतांत्रिक विश्वास की परीक्षा बन चुका है।ये भी पढ़ें


