23 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
बालासाहेब की जयंती, एक पोस्ट और मुंबई की राजनीति में नई हलचल
महाराष्ट्र की राजनीति में जब भी ठाकरे परिवार का कोई सदस्य सार्वजनिक मंच से कुछ कहता है, तो उसके शब्दों के बीच छिपे संकेतों को पढ़ा जाता है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे की जन्मशताब्दी पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) प्रमुख राज ठाकरे द्वारा सोशल मीडिया पर किया गया एक भावनात्मक लेकिन राजनीतिक रूप से बेहद अर्थपूर्ण पोस्ट, मुंबई की राजनीति में नई अटकलों को जन्म दे गया है।
केडीएमसी झटका और बदले समीकरण
कल्याण–डोंबिवली नगर निगम (KDMC) में हालिया घटनाक्रम ने इन अटकलों को और हवा दे दी है। जहाँ एमएनएस के पास केवल पाँच सीटें थीं, वहीं उसने रणनीतिक तौर पर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को समर्थन देकर मेयर की राजनीति की दिशा बदल दी।
यह कदम सिर्फ स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बीएमसी के लिए ‘ट्रायल रन’ के तौर पर देखा जा रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि कुछ समय पहले तक बीएमसी चुनावों में ठाकरे बंधु—राज और उद्धव—दो दशकों बाद एक साथ दिखाई दिए थे। उस एकजुटता को मराठी अस्मिता की वापसी के रूप में प्रचारित किया गया था। लेकिन केडीएमसी के घटनाक्रम ने उस एकता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया।
बीएमसी: सत्ता का असली केंद्र
एशिया की सबसे अमीर नगरपालिकाओं में से एक बीएमसी हमेशा से महाराष्ट्र की राजनीति का पावर सेंटर रही है।
2026 के बीएमसी चुनाव परिणामों के अनुसार:
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बीजेपी: 89 सीटें
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शिंदे गुट शिवसेना: 29 सीटें
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उद्धव ठाकरे गुट (UBT): 65 सीटें
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कांग्रेस: 24 सीटें
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AIMIM: 8 सीटें
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एनसीपी (अजित पवार): 3
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सपा: 2
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एनसीपी (शरद पवार): 1
114 सीटों के बहुमत आंकड़े को महायुति (बीजेपी + शिंदे सेना) पहले ही पार कर चुकी है। इसके बावजूद मेयर पद को लेकर राजनीतिक खींचतान तेज है, खासकर इसलिए क्योंकि इस बार मेयर पद महिला उम्मीदवार के लिए आरक्षित है।
यहीं पर राज ठाकरे की भूमिका किंगमेकर जैसी बनती दिख रही है।
राज ठाकरे का पोस्ट: भावनात्मक भी, राजनीतिक भी
राज ठाकरे के पोस्ट में बालासाहेब ठाकरे की राजनीति, मराठी अस्मिता और सिद्धांतों की खुलकर चर्चा है, लेकिन सबसे अहम पंक्ति वही है जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी:
“अगर इस बदले हुए राजनीतिक दौर में मुझे कभी थोड़ा लचीलापन अपनाना पड़ा, तो वह न तो निजी स्वार्थ के लिए होगा और न ही सत्ता की लालसा के लिए।”
राज ठाकरे ने साफ तौर पर यह संकेत दिया कि राजनीति में कठोरता से ज़्यादा ज़रूरी है उद्देश्य। उन्होंने बालासाहेब के उदाहरण देते हुए कहा कि लचीलापन कभी भी मराठी स्वाभिमान से समझौता नहीं था।
क्या उद्धव से बढ़ी दूरी?
उद्धव ठाकरे गुट के नेताओं, खासकर संजय राउत, ने केडीएमसी में एमएनएस के फैसले को लेकर सार्वजनिक रूप से नाराज़गी जताई। यह भी कहा गया कि राज ठाकरे स्थानीय नेताओं के फैसलों से ‘व्यथित’ थे, लेकिन सवाल यह है कि—
क्या यह सिर्फ स्थानीय असंतोष था या एक सोची-समझी रणनीति?
राज ठाकरे के हालिया बयानों में उद्धव ठाकरे का नाम नहीं लिया जाना भी राजनीतिक विश्लेषकों को सोचने पर मजबूर कर रहा है।
बीजेपी या शिंदे सेना: किसके करीब राज?
राज ठाकरे की राजनीति हमेशा से अप्रत्याशित रही है।
कभी कांग्रेस के खिलाफ तीखे तेवर,
कभी बीजेपी के मुद्दों से वैचारिक सामंजस्य,
और अब शिंदे सेना को नगर निगम में समर्थन—
यह सब संकेत देता है कि एमएनएस भावनाओं से नहीं, नगर निगम की सत्ता संरचना को ध्यान में रखकर फैसले ले रही है।
राज ठाकरे का साफ संदेश यही दिखता है—
नगर निकाय की राजनीति विचारधाराओं से ज़्यादा नियंत्रण और प्रभाव की होती है।
बालासाहेब की विरासत और भविष्य की राजनीति
अपने पोस्ट में राज ठाकरे ने आज की राजनीति को अवसरवादी बताते हुए कहा कि आज सत्ता ही सफलता का पैमाना बन गई है, जबकि बालासाहेब के दौर में मुद्दे, भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता प्राथमिकता हुआ करती थी।
उन्होंने यह भी कहा कि सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन जो पीढ़ियों को प्रभावित करे, वही असली नेता होता है।
यह बयान सिर्फ स्मरण नहीं, बल्कि आने वाले राजनीतिक फैसलों का नैतिक आधार भी माना जा रहा है।
निष्कर्ष:
संकेत साफ हैं, जवाब अभी बाकी
राज ठाकरे ने सीधे तौर पर न तो बीजेपी का नाम लिया, न शिंदे सेना का, और न ही उद्धव ठाकरे से दूरी की घोषणा की। लेकिन ‘लचीलापन’ शब्द ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में एमएनएस कोई बड़ा और चौंकाने वाला फैसला ले सकती है।
बीएमसी की राजनीति अब सिर्फ सीटों का खेल नहीं रह गई है, बल्कि यह ठाकरे विरासत, मराठी पहचान और महाराष्ट्र की भविष्य की सत्ता संरचना का सवाल बन चुकी है।
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