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UN की सर्वोच्च अदालत में खुला रोहिंग्या नरसंहार का ऐतिहासिक मुकदमा

 12 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार 

संयुक्त राष्ट्र की सर्वोच्च न्यायिक संस्था अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने सोमवार को म्यांमार के खिलाफ रोहिंग्या मुस्लिम अल्पसंख्यकों के कथित नरसंहार से जुड़ा एक ऐतिहासिक मुकदमा औपचारिक रूप से शुरू कर दिया। यह पिछले एक दशक से अधिक समय में पहला ऐसा मामला है, जिसमें ICJ किसी नरसंहार के आरोप की पूर्ण सुनवाई कर रहा है।

यह मुकदमा न केवल म्यांमार के भविष्य के लिए अहम है, बल्कि वैश्विक स्तर पर नरसंहार की कानूनी परिभाषा, जवाबदेही और दंड प्रक्रिया को भी नई दिशा दे सकता है।


‘यह कानून की बहस नहीं, इंसानों के अस्तित्व का सवाल है’

गाम्बिया का ICJ में तीखा आरोप

इस मामले में याचिकाकर्ता देश गाम्बिया की ओर से उसके न्याय मंत्री दौदा जालो ने ICJ के न्यायाधीशों के सामने स्पष्ट शब्दों में कहा कि—

“यह अंतरराष्ट्रीय कानून की जटिल तकनीकी बहस का मामला नहीं है। यह वास्तविक लोगों, वास्तविक कहानियों और एक पूरे समुदाय के विनाश का मामला है। म्यांमार के रोहिंग्या लोगों को सुनियोजित तरीके से मिटाने की कोशिश की गई।”

गाम्बिया ने आरोप लगाया कि म्यांमार की सेना ने रोहिंग्या समुदाय को नष्ट करने के इरादे से सैन्य अभियान चलाया, जो नरसंहार सम्मेलन (Genocide Convention) का सीधा उल्लंघन है।


2017 का सैन्य अभियान और मानवीय त्रासदी

सात लाख से अधिक रोहिंग्या बेघर

साल 2017 में म्यांमार की सेना ने रखाइन प्रांत में एक व्यापक सैन्य अभियान शुरू किया, जिसके परिणामस्वरूप करीब 7.3 से 7.5 लाख रोहिंग्या अपने घरों से पलायन कर बांग्लादेश में शरण लेने को मजबूर हुए।

शरणार्थियों ने अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को बताया कि—

  • बड़े पैमाने पर हत्याएं की गईं

  • महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ

  • पूरे के पूरे गांव जला दिए गए

  • बच्चों और बुजुर्गों को भी नहीं बख्शा गया

संयुक्त राष्ट्र की एक तथ्य-खोज जांच टीम ने बाद में निष्कर्ष निकाला कि इस सैन्य अभियान में “नरसंहार की मंशा वाले कृत्य” शामिल थे।

हालांकि, म्यांमार की तत्कालीन सरकार और सेना ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे आतंकवाद-विरोधी कार्रवाई बताया।


ICJ में सुनवाई क्यों है ऐतिहासिक

यह मुकदमा कई मायनों में ऐतिहासिक है—

  • यह 10 वर्षों में पहला पूर्ण नरसंहार मुकदमा है

  • यह तय करेगा कि राज्य को नरसंहार के लिए कैसे जिम्मेदार ठहराया जाए

  • यह अन्य अंतरराष्ट्रीय मामलों पर भी प्रभाव डालेगा

विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले का असर दक्षिण अफ्रीका द्वारा इज़राइल के खिलाफ गाजा युद्ध को लेकर दायर याचिका जैसे मामलों पर भी पड़ सकता है।

संयुक्त राष्ट्र के Independent Investigative Mechanism for Myanmar के प्रमुख निकोलस कूम्जियन के अनुसार—

“यह मामला नरसंहार की परिभाषा, प्रमाण और उपचार के मानकों को तय करने में मिसाल बनेगा।”

ICJ की सुनवाई तीन सप्ताह तक चलेगी।


कॉक्स बाज़ार से उठी न्याय की उम्मीद

शरणार्थियों की भावनात्मक प्रतिक्रिया

बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार शरणार्थी शिविरों में रह रहे रोहिंग्या समुदाय के लिए यह मुकदमा नई उम्मीद लेकर आया है।

रोहिंग्या कार्यकर्ता तौफीक अल मोशिन कहते हैं—

“हम मानते हैं कि यह सुनवाई हमारे दशकों पुराने दर्द और पहचान के इनकार को खत्म करने की दिशा में पहला कदम है।”

दो बच्चों की मां जनिफा बेगम का कहना है—

“हमारी औरतों की इज्जत लूटी गई, गांव जलाए गए, पुरुष मारे गए। हम सिर्फ न्याय और शांति चाहते हैं।”

कई शरणार्थी यह भी जानते हैं कि ICJ के पास फैसले को लागू कराने की सीधी शक्ति नहीं है, फिर भी उन्हें उम्मीद है कि यह फैसला अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाएगा।


रोहिंग्या पहली बार अंतरराष्ट्रीय अदालत में सुने जाएंगे

यह पहली बार है जब रोहिंग्या पीड़ितों की आवाज़ किसी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में दर्ज होगी, हालांकि संवेदनशीलता और सुरक्षा कारणों से ये सत्र जनता और मीडिया के लिए बंद रहेंगे।

मानवाधिकार संगठन Legal Action Worldwide के अनुसार—

“यदि ICJ म्यांमार को नरसंहार के लिए जिम्मेदार ठहराता है, तो यह इतिहास में पहली बार होगा जब किसी राज्य को इस अपराध के लिए कानूनी रूप से दोषी ठहराया जाएगा।”


म्यांमार की राजनीति और बदला हुआ रुख

2019 की प्रारंभिक सुनवाई में म्यांमार की तत्कालीन नेता आंग सान सू ची ने आरोपों को “भ्रामक और अधूरा” बताया था।
लेकिन 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद हालात बदल गए।

तख्तापलट के बाद बनी विपक्षी नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट (NUG) ने—

  • ICJ के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार किया

  • पहले दायर सभी आपत्तियां वापस लीं

  • पहली बार आधिकारिक रूप से “रोहिंग्या” शब्द को मान्यता दी

NUG ने स्वीकार किया कि पूर्व सरकार की नाकामियों के कारण अल्पसंख्यकों पर गंभीर अत्याचार हुए।


ICC में अलग मुकदमा, सैन्य प्रमुख पर गिरफ्तारी वारंट

ICJ के समानांतर, अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) में भी म्यांमार के सैन्य प्रमुख मिन आंग ह्लाइंग के खिलाफ अलग मामला चल रहा है।

ICC के अनुसार—

  • उन पर मानवता के खिलाफ अपराध

  • जबरन निर्वासन

  • रोहिंग्या समुदाय के उत्पीड़न

के आरोप हैं।

ब्रिटेन स्थित Burmese Rohingya Organisation UK का दावा है कि 2021 के बाद से रोहिंग्याओं के खिलाफ अत्याचार और तेज हुए हैं।


निष्कर्ष:-

न्याय की लंबी राह, लेकिन ऐतिहासिक शुरुआत

ICJ में शुरू हुआ यह मुकदमा रोहिंग्या समुदाय के लिए सिर्फ कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि अस्तित्व और पहचान की लड़ाई है। भले ही फैसला आने में सालों लगें, लेकिन यह प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय न्याय प्रणाली की परीक्षा भी है।

दुनिया की नजरें अब हेग पर टिकी हैं — यह देखने के लिए कि क्या अंतरराष्ट्रीय कानून, दशकों से हाशिए पर पड़े रोहिंग्या समुदाय के लिए वास्तविक न्याय का रास्ता खोल पाएगा।

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