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ग्रीनलैंड पर ट्रंप की ज़िद से दुनिया में भूचाल, दावोस में NATO और यूरोप से टकराव तय

 21 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार  

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में हैं। स्विट्ज़रलैंड के दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के मंच पर ट्रंप न सिर्फ़ अमेरिका की आर्थिक उपलब्धियों का ढोल पीटने वाले हैं, बल्कि उनकी सबसे विवादास्पद विदेश नीति — ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने की महत्वाकांक्षा — भी दुनिया के सामने और तेज़ी से उभरने वाली है।

यूरोपीय देशों की तीखी आपत्तियों और नाटो सहयोगियों की चेतावनियों के बावजूद ट्रंप ने साफ़ संकेत दे दिया है कि वह इस मुद्दे पर पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। विशेषज्ञ इसे पिछले कई दशकों में ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों की सबसे बड़ी दरार मान रहे हैं।


ग्रीनलैंड क्यों बना ट्रंप की प्राथमिकता?

डोनाल्ड ट्रंप का तर्क सीधा है —
ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है।

ट्रंप के मुताबिक़:

  • आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती सैन्य व रणनीतिक मौजूदगी

  • प्राकृतिक संसाधनों और नई समुद्री राहों पर नियंत्रण की होड़

  • पहले से मौजूद अमेरिकी सैन्य बेस की रणनीतिक अहमियत

इन सभी वजहों से अमेरिका को ग्रीनलैंड की “ज़रूरत” है।

ट्रंप ने दावोस रवाना होने से पहले प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा,

“हमें ग्रीनलैंड सुरक्षा के लिए चाहिए। यह सिर्फ़ अमेरिका ही नहीं, बल्कि नाटो की सुरक्षा का भी मामला है।”

हालाँकि जब उनसे पूछा गया कि वह ग्रीनलैंड हासिल करने के लिए कितनी दूर तक जा सकते हैं, तो उनका रहस्यमयी जवाब था —

“आपको खुद पता चल जाएगा।”


यूरोप और NATO की चिंता: गठबंधन पर खतरा?

ट्रंप की इस आक्रामक रणनीति से नाटो देशों में गहरी बेचैनी है। कई नेताओं ने खुलकर चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने दबाव या सैन्य विकल्प की बात की, तो इससे नाटो की एकता को गंभीर झटका लग सकता है।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने निजी संदेश में ट्रंप से इस नीति पर पुनर्विचार करने को कहा। लेकिन कूटनीतिक मर्यादा तोड़ते हुए ट्रंप ने वह निजी संदेश सार्वजनिक कर दिया, जिसमें मैक्रों ने साफ़ लिखा था—

“मैं समझ नहीं पा रहा कि आप ग्रीनलैंड को लेकर क्या कर रहे हैं।”

यह कदम यूरोपीय राजधानियों में बेहद नकारात्मक संकेत के तौर पर देखा गया।


डेनमार्क और ग्रीनलैंड की पेशकश भी नाकाफ़ी

डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सरकारें अमेरिका को वहां अधिक सैन्य और रणनीतिक मौजूदगी की अनुमति देने को तैयार हैं, लेकिन वे संप्रभुता से समझौता करने के पक्ष में नहीं हैं।

इसके बावजूद ट्रंप ने सोशल मीडिया पर एक संशोधित तस्वीर साझा की, जिसमें वह 57,000 की आबादी वाले ग्रीनलैंड पर अमेरिकी झंडा गाड़ते नज़र आ रहे हैं। इस तस्वीर को यूरोप में उकसावे की कार्रवाई माना गया।


क्या यह ट्रंप की ‘विरासत परियोजना’ है?

रॉयटर्स से जुड़े सूत्रों के मुताबिक़, ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की दिलचस्पी सिर्फ़ सुरक्षा तक सीमित नहीं है।
यह उनकी राजनीतिक विरासत से भी जुड़ी हुई है।

अगर ऐसा हुआ, तो:

  • 1959 के बाद (जब अलास्का और हवाई अमेरिका के राज्य बने)

  • यह अमेरिका का सबसे बड़ा क्षेत्रीय विस्तार होगा

ट्रंप कथित तौर पर इस कदम को अपने राष्ट्रपति काल की ऐतिहासिक उपलब्धि बनाना चाहते हैं।


दावोस में ट्रंप का दूसरा एजेंडा: अमेरिकी अर्थव्यवस्था

ग्रीनलैंड विवाद के बीच ट्रंप का आधिकारिक एजेंडा कुछ और है।
दावोस में अपने मुख्य भाषण में वह:

  • अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती का दावा करेंगे

  • वैश्विक मंदी के लिए यूरोपीय नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराएंगे

  • हाउसिंग संकट पर नई योजना पेश करेंगे

व्हाइट हाउस के मुताबिक़, ट्रंप ऐसी योजना का ऐलान करेंगे, जिसमें अमेरिकियों को 401(k) रिटायरमेंट सेविंग्स से घर की डाउन पेमेंट की अनुमति दी जा सकती है।

हालाँकि जनमत सर्वे बताते हैं कि अमेरिकी जनता उनकी आर्थिक नीतियों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है।


संयुक्त राष्ट्र और ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को लेकर विवाद

दावोस दौरे के दौरान ट्रंप एक और विवादित कदम उठाने जा रहे हैं।
वह अपने द्वारा गठित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे, जिसका उद्देश्य गाज़ा के पुनर्विकास से जुड़ा है।

ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि यह बोर्ड भविष्य में वैश्विक संकटों पर भी काम कर सकता है — एक ऐसा क्षेत्र, जो अब तक संयुक्त राष्ट्र की भूमिका रहा है।

संयुक्त राष्ट्र पर टिप्पणी करते हुए ट्रंप ने कहा:

“मुझे यूएन पसंद है, लेकिन यह कभी अपनी पूरी क्षमता पर खरा नहीं उतरा।”


आगे क्या?

दावोस में ट्रंप की मौजूदगी:

ग्रीनलैंड पर वैश्विक बहस को और तीखा करेगी

अमेरिका-यूरोप रिश्तों की दिशा तय कर सकती है
नाटो की एकता की असली परीक्षा बनेगी

गुरुवार देर रात ट्रंप वॉशिंगटन लौटेंगे, लेकिन उनके बयान और फैसले आने वाले महीनों तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करते रहेंगे।

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