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9 महीने अंतरिक्ष में रहीं सुनीता विलियम्स, लेकिन इतिहास रचने वाले भारतीय अंतरिक्ष यात्री से मिलना रह गया अधूरा

 21 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार   

अंतरिक्ष से धरती तक: एक ऐतिहासिक यात्रा, एक चूकती हुई मुलाक़ात

अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में कई यादगार क्षण दर्ज हैं, लेकिन कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो उपलब्धियों के साथ मानवीय भावनाओं को भी छू जाती हैं। अमेरिका की दिग्गज अंतरिक्ष यात्री सुनीता ‘सूनी’ विलियम्स की हालिया अंतरिक्ष यात्रा ऐसी ही एक कहानी बन गई—जहाँ 286 दिन अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर बिताने के बाद भी वह एक ऐतिहासिक मुलाक़ात से चूक गईं।

सुनीता विलियम्स हाल ही में दिल्ली पहुँचीं, जहाँ उन्होंने एक संवाद सत्र “Eyes on the Stars, Feet on the Ground” में अपनी असाधारण अंतरिक्ष यात्रा, चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं पर खुलकर बात की। इसी दौरान उन्होंने बताया कि कैसे वह भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला से मिलने से बस कुछ दिन दूर रह गईं।


ISS पर 9 महीने, लेकिन समय ने नहीं दिया साथ

सुनीता विलियम्स का यह मिशन मूल रूप से सिर्फ 8 दिनों का होना था। वह बोइंग स्टारलाइनर के जरिए 2024 में ISS पहुँची थीं, लेकिन तकनीकी खराबी के कारण वही यान उन्हें वापस पृथ्वी नहीं ला सका। परिणामस्वरूप, मिशन अस्थायी रूप से “लॉन्ग-ड्यूरेशन स्पेसफ्लाइट” में बदल गया।

बाद में SpaceX Crew Dragon (Freedom) के ज़रिये सुनीता विलियम्स और उनके साथी बुच विलमोर को मार्च 2025 में सुरक्षित धरती पर लाया गया। तब तक दोनों 286 दिन अंतरिक्ष में बिता चुके थे।

इसी बीच, भारत के लिए ऐतिहासिक क्षण तब आया जब ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला जून 2025 में Axiom मिशन के तहत ISS पहुँचे—लेकिन तब तक सुनीता विलियम्स स्टेशन छोड़ चुकी थीं।

“इतना लंबा समय अंतरिक्ष में बिताने के बावजूद, मैं शुभांशु से मिल नहीं सकी—यह अफ़सोस जरूर रहेगा,”
— सुनीता विलियम्स, दिल्ली कार्यक्रम में


धरती पर वापसी: स्वास्थ्य चुनौतियाँ, लेकिन हौसले बुलंद

लंबे समय तक शून्य गुरुत्वाकर्षण में रहने के बाद सुनीता विलियम्स को शारीरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा—मांसपेशियों की कमजोरी, संतुलन में कठिनाई और थकान जैसी समस्याएँ आम रहीं। इसके बावजूद, दिल्ली में वह पूरी ऊर्जा और आत्मविश्वास के साथ नज़र आईं।

कार्यक्रम का सबसे भावुक क्षण तब आया जब उन्होंने कल्पना चावला की मां, 90 वर्षीय संयोजिता चावला, को मंच से उतरकर गले लगाया। यह दृश्य केवल दो परिवारों का नहीं, बल्कि अंतरिक्ष इतिहास की दो पीढ़ियों का मिलन था।


चंद्रमा, मंगल और नई ‘स्पेस रेस’

सुनीता विलियम्स ने मौजूदा वैश्विक हालात को एक नई अंतरिक्ष दौड़ (Modern Space Race) बताया। उनका कहना था कि दुनिया दोबारा चंद्रमा की ओर लौट रही है—लेकिन इस बार लक्ष्य केवल पहुँचने का नहीं, बल्कि सस्टेनेबल और सहयोगी मॉडल विकसित करने का है।

“हमें चंद्रमा पर उसी तरह नियमों के साथ काम करना होगा, जैसे अंटार्कटिका में करते हैं—लोकतांत्रिक, साझा और शांतिपूर्ण तरीके से,”
— सुनीता विलियम्स


अंतरिक्ष का निजीकरण: अवसरों की नई दुनिया

सुनीता विलियम्स ने अंतरिक्ष के बढ़ते व्यावसायीकरण (Commercialisation of Space) को सकारात्मक बदलाव बताया। उनके अनुसार, अब अंतरिक्ष सिर्फ रॉकेट और एस्ट्रोनॉट तक सीमित नहीं है—

  • सैटेलाइट टेक्नोलॉजी

  • माइक्रोग्रैविटी रिसर्च

  • अंतरिक्ष में 3D मेटल प्रिंटिंग

  • प्राइवेट स्पेस कंपनियाँ

ये सभी क्षेत्र युवाओं के लिए नए करियर विकल्प खोल रहे हैं।


एक साधारण शुरुआत, असाधारण मुकाम

दिलचस्प बात यह है कि सुनीता विलियम्स ने कभी बचपन में अंतरिक्ष यात्री बनने का सपना नहीं देखा था। ब्लैक-एंड-व्हाइट टीवी पर Star Trek देखना, फिर नौसेना में भर्ती होना—और वहीं से अंतरिक्ष तक का सफर शुरू हुआ।

  • अमेरिकी नौसेना में 4,000+ उड़ान घंटे

  • 40 से अधिक प्रकार के विमान

  • NASA में 27 वर्षों की सेवा

  • 608 दिन अंतरिक्ष में (NASA में दूसरा स्थान)

  • 9 स्पेसवॉक, कुल 62 घंटे 6 मिनट

  • अंतरिक्ष में मैराथन दौड़ने वाली पहली इंसान


नासा की श्रद्धांजलि और एक युग का अंत

NASA ने सुनीता विलियम्स को मानव अंतरिक्ष उड़ान की पथप्रदर्शक बताया। एजेंसी के अनुसार, उनका योगदान Artemis मिशन, चंद्रमा और मंगल अभियानों की नींव बन चुका है।

“स्पेस मेरा सबसे पसंदीदा स्थान रहा है… तीन बार अंतरिक्ष जाना मेरे जीवन का सबसे बड़ा सम्मान है,”
— सुनीता विलियम्स

मार्च 2025 में धरती पर लौटने के साथ ही सुनीता विलियम्स ने आधिकारिक रूप से अंतरिक्ष यात्री के रूप में अपने करियर को विराम दिया—लेकिन उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।


निष्कर्ष:-

सुनीता विलियम्स की कहानी सिर्फ एक लंबी अंतरिक्ष यात्रा नहीं, बल्कि धैर्य, विज्ञान, सहयोग और मानवीय संवेदना की कहानी है। भले ही शुभांशु शुक्ला से उनकी मुलाक़ात न हो सकी, लेकिन दोनों की यात्राएँ भारत और दुनिया के युवाओं के लिए एक साझा संदेश छोड़ती हैं—

सितारों तक पहुँचने के रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन सपनों की दिशा एक ही होती है।

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