21 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि 23 जनवरी को बसंत पंचमी के अवसर पर हिंदू समुदाय द्वारा प्रस्तावित धार्मिक अनुष्ठान और उसी दिन शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय की जुमे की नमाज़, दोनों शांतिपूर्ण, अनुशासित और प्रशासनिक निगरानी में आयोजित की जाएं।
यह आदेश न केवल तात्कालिक धार्मिक कार्यक्रमों से जुड़ा है, बल्कि इसके दूरगामी निहितार्थ धार्मिक स्वतंत्रता, सार्वजनिक व्यवस्था और ऐतिहासिक धरोहरों की संवैधानिक सुरक्षा से भी जुड़े हुए हैं।
संवैधानिक पीठ और सुनवाई का व्यापक परिप्रेक्ष्य
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने की। यह कार्यवाही हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस द्वारा दाखिल उस आवेदन पर हुई, जिसमें बसंत पंचमी के दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक निरंतर पूजा, हवन और पारंपरिक अनुष्ठानों की अनुमति मांगी गई थी।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि बसंत पंचमी केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि विद्या, ज्ञान और संस्कृति से जुड़ा पर्व है, जिसका भोजशाला से ऐतिहासिक संबंध रहा है।
भोजशाला विवाद: इतिहास, आस्था और राजनीति का संगम
भोजशाला एक 11वीं शताब्दी का स्मारक है, जो राजा भोज के काल से जोड़ा जाता है और वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है।
यहीं से विवाद की जड़ें निकलती हैं—
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हिंदू समुदाय इसे माँ सरस्वती (वाग्देवी) का प्राचीन मंदिर मानता है
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जबकि मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में देखता है
यह विवाद केवल धार्मिक नहीं, बल्कि इतिहास की व्याख्या, सांस्कृतिक स्मृति और संवैधानिक अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है।
साल 2003 में प्रशासनिक हस्तक्षेप के बाद एक व्यवस्था तय की गई थी, जिसके तहत:
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मंगलवार को हिंदू पूजा
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शुक्रवार को मुस्लिम नमाज़
की अनुमति दी गई।
अदालत में टकराव नहीं, समाधान की कोशिश
हिंदू पक्ष की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने अदालत को बताया कि बसंत पंचमी पर परंपरागत रूप से दिनभर धार्मिक गतिविधियाँ चलती हैं और इनमें किसी भी प्रकार का व्यवधान आस्था के अधिकार का उल्लंघन होगा।
दूसरी ओर, मस्जिद कमेटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि जुमे की नमाज़ का समय इस्लामी शरीयत से निर्धारित होता है, जिसे प्रशासनिक या न्यायिक आदेश से बदला नहीं जा सकता।
उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि नमाज़ के बाद मुस्लिम समुदाय स्वेच्छा से परिसर खाली कर देगा।
केंद्र, राज्य और ASI की भूमिका
केंद्र सरकार और ASI की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज तथा मध्य प्रदेश के महाधिवक्ता ने अदालत को आश्वस्त किया कि:
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स्थिति पर पूरी प्रशासनिक निगरानी रहेगी
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पर्याप्त सुरक्षा बल तैनात होंगे
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किसी भी प्रकार की अफवाह या उकसावे को सख्ती से रोका जाएगा
सुप्रीम कोर्ट का व्यावहारिक और संतुलित आदेश
अदालत ने एक ऐसा समाधान सामने रखा, जिसमें किसी भी समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता बाधित न हो, और सार्वजनिक शांति भी बनी रहे।
आदेश के अनुसार:
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दोपहर 1 से 3 बजे तक जुमे की नमाज़ के लिए परिसर के भीतर एक अलग और सुरक्षित क्षेत्र चिन्हित किया जाएगा
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प्रवेश और निकास के लिए अलग रास्ते होंगे
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नमाज़ में शामिल होने वाले लोगों की संख्या पहले से प्रशासन को दी जाएगी
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आवश्यकता पड़ने पर पास सिस्टम या अन्य नियंत्रण उपाय लागू किए जाएंगे
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हिंदू समुदाय को बसंत पंचमी के अनुष्ठानों के लिए अलग स्थान दिया जाएगा
अदालत की सख्त लेकिन संतुलित टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि:
“यह अपेक्षा की जाती है कि दोनों पक्ष आपसी सम्मान, संयम और सहयोग का परिचय देंगे। राज्य और जिला प्रशासन के साथ समन्वय स्थापित कर कानून-व्यवस्था बनाए रखना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।”
ASI सर्वे और मूल कानूनी लड़ाई
यह आदेश उस विशेष अनुमति याचिका से जुड़ा है, जो मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी, धार द्वारा दायर की गई थी। इसमें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस अंतरिम आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें ASI को भोजशाला परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने की अनुमति दी गई थी।
अप्रैल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने:
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सर्वे की अनुमति दी
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लेकिन कोई खुदाई या ढांचे में परिवर्तन न करने की सख्त शर्त लगाई
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और यह भी स्पष्ट किया कि सर्वे रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई बिना न्यायालय की अनुमति नहीं होगी
अब अदालत ने निर्देश दिया है कि:
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हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच मामले की सुनवाई करे
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ASI की सीलबंद रिपोर्ट खोली जाए
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सभी पक्षों को आपत्ति दर्ज करने का पूरा अवसर दिया जाए
निष्कर्ष:-
न्यायिक संयम का संदेश
भोजशाला–कमाल मौला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश एक बार फिर यह रेखांकित करता है कि भारतीय न्यायपालिका धार्मिक टकराव नहीं, बल्कि संवैधानिक संतुलन का पक्षधर है।
यह फैसला न तो किसी आस्था की जीत है और न किसी की हार, बल्कि यह संदेश है कि लोकतंत्र में अधिकारों का प्रयोग शांति और मर्यादा के साथ ही संभव है।
