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त्रिपुरा: चंदा विवाद बना साम्प्रदायिक हिंसा, मुस्लिम बस्तियों में आगजनी से दर्जनों परिवार बेघर

त्रिपुरा 13 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार    
त्रिपुरा के उनाकोटी जिले की फटिकरॉय विधानसभा सीट—जो अब तक अपेक्षाकृत शांत और सामुदायिक सह-अस्तित्व के लिए जानी जाती थी—शनिवार को हिंसा, आगजनी और भय के ऐसे दौर से गुज़री, जिसने न केवल दर्जनों मुस्लिम परिवारों को बेघर कर दिया, बल्कि राज्य की कानून-व्यवस्था, पुलिस की भूमिका और राजनीतिक जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

सैदारपाड़ा–शिमुलतला और कुमारघाट के आसपास के इलाकों में आज भी जली हुई दीवारों की गंध, पिघली टीन की चादरें और राख में तब्दील दुकानें उस सुबह की गवाही देती हैं, जब एक धार्मिक चंदा अभियान अचानक सुनियोजित साम्प्रदायिक हिंसा में बदल गया।


जब परंपरा विवाद में बदल गई

स्थानीय निवासियों के अनुसार, फटिकरॉय और उसके आसपास के गांवों में वर्षों से यह परंपरा रही है कि धार्मिक आयोजनों—चाहे वे किसी भी समुदाय के हों—में सभी मिलकर सहयोग करते हैं। मुस्लिम परिवारों द्वारा हिंदू त्योहारों के लिए आर्थिक सहयोग, निर्माण सामग्री और श्रम देना यहां आम बात रही है।

लेकिन इस बार माहौल अलग था।

शनिवार सुबह, कथित तौर पर बाहरी लोगों का एक समूह मुस्लिम बहुल इलाकों में घूमते हुए धार्मिक आयोजन के नाम पर चंदा मांगने लगा। कई दुकानदारों और घरों ने समय मांगा या चंदा वसूली के तरीके पर सवाल उठाया। आरोप है कि इसी बात पर उन्हें गालियां दी गईं, धमकाया गया और दबाव बनाया गया।

यहीं से तनाव ने खतरनाक मोड़ ले लिया।


भैरवथली से शुरू हुआ टकराव

हिंसा की शुरुआत भैरवथली इलाके से मानी जा रही है। यहां एक टॉम-टॉम वाहन को रोका गया, जिसमें लकड़ी के तख्ते लदे थे। यह लकड़ी मसेब्बीर अली की थी—जो वर्षों से लाइसेंसधारी लकड़ी व्यापारी हैं।

स्थानीय लोगों के अनुसार, यह लकड़ी मस्जिद के मिम्बर (पुलपिट) के निर्माण के लिए ले जाई जा रही थी। आरोप है कि वाहन को यह कहकर रोक लिया गया कि जब तक पूजा के लिए चंदा नहीं दिया जाएगा, इसे आगे नहीं जाने दिया जाएगा।

सूचना मिलने पर मसेब्बीर अली मौके पर पहुंचे और कथित तौर पर चंदा बाद में देने का आश्वासन दिया।

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई।


व्यापारी पर हमला और लूट का आरोप

चश्मदीदों के मुताबिक, मसेब्बीर अली पर लाठियों और घूंसे से हमला किया गया। आरोप है कि उनके पास मौजूद करीब 80,000 रुपये नकद, जो व्यवसायिक लेन-देन के लिए थे, छीन लिए गए। गंभीर रूप से घायल होकर वे मौके पर ही गिर पड़े।

घटना की खबर फैलते ही आसपास के इलाकों में तनाव तेजी से फैल गया।

मसेब्बीर अली को पहले फटिकरॉय अस्पताल ले जाया गया, जहां परिवार का आरोप है कि उन्हें पर्याप्त आपात उपचार नहीं मिला। बाद में उन्हें कैलाशहर जिला अस्पताल रेफर किया गया। परिजनों का कहना है कि इलाज में हुई देरी से उनकी हालत और बिगड़ गई। ताज़ा जानकारी के अनुसार, वे अब भी गंभीर स्थिति में हैं।


आगजनी, तोड़फोड़ और रोज़गार का विनाश

देर सुबह तक हालात पूरी तरह बेकाबू हो चुके थे। प्रत्यक्षदर्शियों का आरोप है कि हिंदू समुदाय से जुड़े समूह मुस्लिम इलाकों में घुसे और घरों, दुकानों, वाहनों और कृषि संपत्तियों को निशाना बनाकर आगजनी शुरू कर दी

कुछ ही मिनटों में दुकानें और वाहन धू-धू कर जलने लगे।

आसमा खातून, जिनकी छोटी-सी खाने के तेल की दुकान उनके परिवार की इकलौती आमदनी थी, अब खंडहर के सामने खड़ी थीं।
“मैंने आग बुझाने की कोशिश की, तो मुझे मारा गया। अब हमारे पास कुछ नहीं बचा,” उन्होंने कहा।

मुतासिर मिया, जो ऑटो चलाकर गुज़ारा करते थे, अपने तीनों ऑटो खो बैठे।
अजबोर अली का एकमात्र ऑटो भी जल गया।
अली अहमद, जिन्होंने बेंगलुरु में वर्षों मेहनत कर एक डम्पर ट्रक खरीदा था, उसे जलते हुए देख असहाय रह गए।

किसान मोकद्दस अली के दो ट्रैक्टर, पशु आहार और पोल्ट्री यूनिट नष्ट हो गए। वे खुद भी हिंसा में घायल हुए और अस्पताल में भर्ती हैं।

कई घरों की दीवारें गिरा दी गईं, सामान लूटा गया या जला दिया गया।

स्थानीय लोगों का कहना है कि नुकसान बेतरतीब नहीं, बल्कि एक के बाद एक संपत्तियों को चुनकर किया गया।


मस्जिद पर हमले के आरोप, धार्मिक भावनाओं को गहरी चोट

हिंसा का सबसे संवेदनशील पहलू वह आरोप है, जिसमें कहा गया कि इलाके की एक मस्जिद को निशाना बनाया गया।

स्थानीय निवासियों का दावा है कि उपद्रवियों ने मस्जिद के दरवाज़े और खिड़कियां तोड़ीं, अंदर आग लगाई, नई टाइलें तोड़ दीं और यहां तक कि कुरान शरीफ की प्रतियां जलाने के आरोप भी सामने आए हैं।

यह मस्जिद पुलिस चौकी से अधिक दूर नहीं है—यही तथ्य आक्रोश को और बढ़ाता है।

एक बुज़ुर्ग स्थानीय निवासी ने कहा,
“यह सिर्फ ईंट-पत्थर का नुकसान नहीं था। यह हमारी आस्था और सम्मान पर हमला था।”


पुलिस पर निष्क्रियता के आरोप

मुस्लिम समुदाय का आरोप है कि हिंसा के दौरान पुलिस मौके पर मौजूद थी, लेकिन उसने आगजनी और तोड़फोड़ रोकने के लिए प्रभावी हस्तक्षेप नहीं किया।

हालात बिगड़ने के बाद प्रशासन ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 लागू की, जिसके तहत आवाजाही और सार्वजनिक जमावड़ों पर प्रतिबंध लगाया गया। सशस्त्र अर्धसैनिक बलों की तैनाती के बाद ही स्थिति कुछ हद तक नियंत्रित हो सकी।

कुछ गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रभावित मुस्लिम समुदाय के तीन लोगों को भी हिरासत में लिया गया, जिससे नाराज़गी और बढ़ गई।


राजनीतिक बयानबाज़ी और बढ़ता विवाद

यह हिंसा 51वीं विधानसभा सीट में हुई, जिसका प्रतिनिधित्व मंत्री सुधांशु दास करते हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उन्होंने इसे मीडिया में “दो समूहों के बीच झड़प” बताया—जिसे पीड़ित समुदाय सिरे से खारिज करता है।

राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और CPIM नेता जितेंद्र चौधरी ने भाजपा सरकार पर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा में विफल रहने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जब कुमारघाट और फटिकरॉय जल रहे थे, तब मुख्यमंत्री उत्तर त्रिपुरा में रोड शो में व्यस्त थे।

कांग्रेस का एक प्रतिनिधिमंडल जब हिंसा प्रभावित इलाकों का दौरा करने पहुंचा, तो पुलिस ने सुरक्षा कारणों का हवाला देकर उन्हें रोक दिया।
कांग्रेस विधायक दल के नेता बिराजित सिन्हा ने इसे राजनीतिक निगरानी रोकने की कोशिश बताया।

इस बीच, राज्य वक्फ बोर्ड के चेयरमैन और पूर्व विधायक मोबासर अली ने प्रभावित इलाकों का दौरा किया, पीड़ित परिवारों से मुलाकात की और निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए FIR दर्ज कराई।


बेघर परिवार, असुरक्षित भविष्य

आज, दर्जनों परिवार रिश्तेदारों और पड़ोसियों की मदद पर निर्भर हैं। उनके पास न घर है, न रोज़गार, न ही यह भरोसा कि न्याय मिलेगा।

पीड़ितों की मांग स्पष्ट है—
निष्पक्ष जांच,
दोषियों की गिरफ्तारी और सख्त सजा,
और हुए नुकसान के लिए पर्याप्त मुआवज़ा।

फिलहाल फटिकरॉय में शांति तो है, लेकिन यह शांति डर और अनिश्चितता से भरी हुई है।
यह सवाल अब भी हवा में है—
क्या यह हिंसा महज़ एक विवाद थी, या एक बड़ी विफलता का संकेत?

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