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ISRO के PSLV रॉकेट पर फिर संकट: लगातार दूसरी विफलता, भारत ने एक और रणनीतिक उपग्रह गंवाया

नई दिल्ली |13 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार   

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक चिंताजनक घटनाक्रम में, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के भरोसेमंद माने जाने वाले PSLV (पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल) रॉकेट ने एक बार फिर निराश किया है।
जनवरी 2026 में हुए PSLV-C62 मिशन की विफलता, मई 2025 के PSLV-C61 फेल्योर के बाद, इस रॉकेट की लगातार दूसरी असफल उड़ान है—जो अब केवल तकनीकी चूक नहीं, बल्कि रणनीतिक और संस्थागत चिंता का विषय बन चुकी है।

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33 वर्षों का रिकॉर्ड, लेकिन हालिया झटके असाधारण

PSLV को ISRO का “वर्कहॉर्स” कहा जाता रहा है।
पिछले 33 वर्षों में 64 उड़ानों के दौरान इसकी सफलता दर उल्लेखनीय रही है।
हालाँकि, अब तक की चार प्रमुख विफलताओं में से दो केवल आठ महीनों के भीतर होना, वह भी एक ही स्टेज (तीसरे चरण) से जुड़ी तकनीकी गड़बड़ियों के कारण—इसे एक असाधारण और चिंताजनक पैटर्न बना देता है।

PSLV-C62: 2026 की पहली उड़ान, लेकिन उम्मीदों पर पानी

12 जनवरी 2026 को हुआ PSLV-C62 मिशन,

  • ISRO का 2026 का पहला लॉन्च था

  • और मई 2025 की विफलता के बाद PSLV की ‘कमबैक फ्लाइट’ मानी जा रही थी

लेकिन यह मिशन भी मध्य-उड़ान में विफल हो गया।

ISRO प्रमुख का आधिकारिक बयान

लॉन्च के बाद श्रीहरिकोटा से दिए गए टेलीविज़न बयान में ISRO प्रमुख डॉ. वी. नारायणन ने कहा:

“PSLV एक चार-चरणीय रॉकेट है। तीसरे चरण के लगभग अंत तक रॉकेट का प्रदर्शन अपेक्षित था। लेकिन तीसरे चरण के अंत में वाहन में गड़बड़ी और उड़ान पथ में विचलन देखा गया। हम पूरे डेटा का विश्लेषण कर रहे हैं।”

गौरतलब है कि मई 2025 की विफलता में भी, लगभग यही स्थिति सामने आई थी—
जहाँ तीसरे चरण के ठोस ईंधन मोटर में चैम्बर प्रेशर गिरने की बात सामने आई थी।

एक ही समस्या, दो बार: तीसरा चरण फिर सवालों में

PSLV का तीसरा चरण ठोस ईंधन (Solid Fuel Motor) पर आधारित होता है, जो उच्च विश्वसनीयता के लिए जाना जाता है।
लेकिन:

  • PSLV-C61 (मई 2025)

  • PSLV-C62 (जनवरी 2026)

दोनों में तीसरे चरण की असामान्य कार्यप्रणाली देखी गई।

यह तथ्य अब क्वालिटी कंट्रोल, मैन्युफैक्चरिंग कंसिस्टेंसी और टेस्टिंग प्रोटोकॉल पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

EOS-N1 ‘अन्वेषा’: एक अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक नुकसान

PSLV-C62 का मुख्य पेलोड था EOS-N1, जिसे ‘अन्वेषा’ नाम दिया गया था।
यह उपग्रह:

  • DRDO द्वारा विकसित किया गया था

  • पृथ्वी से 511 किलोमीटर की कक्षा में स्थापित होना था

  • और यह एक हाइपरस्पेक्ट्रल अर्थ ऑब्ज़र्वेशन सैटेलाइट था

हाइपरस्पेक्ट्रल तकनीक क्यों अहम है?

हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग तकनीक:

  • सतह से परावर्तित प्रकाश के सूक्ष्म तरंगदैर्ध्य (wavelengths) को पहचानती है

  • मिट्टी, पानी, धातु, कंक्रीट, वनस्पति जैसी वस्तुओं को उनकी ‘स्पेक्ट्रल सिग्नेचर’ से अलग कर सकती है

इसका उपयोग:

  • फसल स्वास्थ्य

  • जल गुणवत्ता

  • भूमि उपयोग

  • और सबसे अहम—छिपे हुए सैन्य ठिकानों की पहचान में किया जा सकता है

इस लिहाज़ से EOS-N1 की विफलता केवल वैज्ञानिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा सीधा नुकसान है।

15 सह-यात्री उपग्रह भी नष्ट

इस मिशन में EOS-N1 के साथ:

  • भारत के 7

  • यूरोप के 2

  • ब्राज़ील के 5

  • और नेपाल का 1

कुल 15 छोटे उपग्रह भी शामिल थे।
इनमें से कई स्टार्टअप्स और शैक्षणिक संस्थानों के प्रयोगात्मक मिशन थे, जो अब अंतरिक्ष में पहुँच ही नहीं सके।

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पारदर्शिता पर सवाल: FAC रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं

ISRO की एक बड़ी पहचान रही है—पारदर्शिता
परंतु:

  • मई 2025 के PSLV-C61 फेल्योर

  • और जनवरी 2025 में NVS-02 रणनीतिक उपग्रह की विफलता

इन दोनों की Failure Analysis Committee (FAC) रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है।

हालाँकि, यह जानकारी सामने आई है कि रिपोर्टें भारत सरकार को सौंपी जा चुकी हैं, लेकिन जनता और अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के लिए इन्हें साझा न करना, ISRO की पारंपरिक कार्यसंस्कृति से हटकर माना जा रहा है।

विदेशी ग्राहकों का भरोसा और ISRO की साख

ISRO न केवल भारत के लिए, बल्कि:

  • विदेशी सरकारों

  • अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों

  • और निजी कंपनियों

के उपग्रह भी लॉन्च करता है।
ऐसे में FAC रिपोर्ट्स की सार्वजनिक उपलब्धता,
विश्वास बहाली और वैश्विक प्रतिष्ठा के लिए अत्यंत आवश्यक मानी जाती है।


निष्कर्ष: तकनीकी चूक से आगे, संस्थागत चेतावनी

PSLV-C61 और PSLV-C62 की लगातार विफलताएँ यह संकेत देती हैं कि:

समस्या केवल “एक मिशन की” नहीं

बल्कि प्रणालीगत समीक्षा की आवश्यकता है

ISRO की उपलब्धियाँ ऐतिहासिक हैं, लेकिन रणनीतिक उपग्रहों की बार-बार हानि,
और एक ही स्टेज में दोहराई जा रही विफलता,
अब सुधारात्मक कदमों की माँग करती है—
तेज़, पारदर्शी और तकनीकी रूप से कठोर।

भारत का अंतरिक्ष भविष्य मजबूत है, लेकिन उसे सुरक्षित रखने के लिए आत्ममंथन और जवाबदेही अनिवार्य है।

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