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शायर एवं वरिष्ठ पत्रकार मीर शाह हुसैन आरिफ के आवास पर नियाज़-ए-इमाम लंगर-ए-आम का भव्य, साहित्यिक और सामाजिक महत्व से परिपूर्ण आयोजन

संभल | 14 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार    

शहर की गंगा-जमुनी तहज़ीब, मानवीय मूल्यों और सामाजिक सौहार्द की परंपरा को जीवंत रखते हुए आज 14 जनवरी को मशहूर शायर एवं वरिष्ठ पत्रकार मीर शाह हुसैन आरिफ के आवास पर, जो ऐतिहासिक भूरे शाह वाली ज़ियारत के समीप स्थित है, नियाज़ लंगर-ए-आम का अत्यंत गरिमामय और सुव्यवस्थित आयोजन किया गया। यह आयोजन न केवल एक धार्मिक परंपरा का निर्वाह था, बल्कि इसमें साहित्य, पत्रकारिता, शिक्षा और समाज सेवा की साझा भावना भी स्पष्ट रूप से दिखाई दी।

सुबह से ही आयोजन स्थल पर रौनक बनी रही। शहर के कोने-कोने से आए बुद्धिजीवी, शिक्षाविद, वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता बड़ी संख्या में एकत्र हुए। सभी ने आपसी प्रेम, भाईचारे और इंसानियत के पैग़ाम के साथ नियाज़ में शिरकत की। लंगर-ए-आम की व्यवस्था अत्यंत अनुशासित और सलीकेदार रही, जिसमें हर वर्ग के लोगों ने समान रूप से भाग लिया—यही इस परंपरा की सबसे बड़ी खूबी रही।

इस अवसर पर जिन प्रमुख और प्रतिष्ठित हस्तियों की मौजूदगी रही, उनमें प्रोफेसर आबिद हुसैन हैदरी, डॉ. रशीक अनवरडॉ. किश्वर जहाँ ज़ैदी, डॉ. नसीमुज़्ज़फर, प्रोफेसर रियाज़ अनवर, प्रोफेसर मोहम्मद अहमद, प्रोफेसर नदीम, प्रोफेसर फहीम, अहमद,  ज़िआउस सहर रज़ज़ाक़ीनज़ीर खान, रेहान अली खान, आज़म अब्बासी और कौसर अज़गर नक़वी के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय रहे। इन सभी गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा को और ऊँचाई प्रदान की।

कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में विश्व-विख्यात शायर डॉ. नसीमुज़्ज़फर ने कहा कि नियाज़ और लंगर केवल भोजन वितरण की प्रक्रिया नहीं, बल्कि यह समाज में बराबरी, करुणा और साझा उत्तरदायित्व की भावना को मज़बूत करने का माध्यम है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि जब साहित्य, संस्कृति और सेवा एक साथ आते हैं, तो समाज में सकारात्मक चेतना का विस्तार होता है।

डॉ. किश्वर जहाँ ज़ैदी ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन हमें हमारी जड़ों से जोड़ते हैं और यह याद दिलाते हैं कि सामाजिक एकता और मानवीय संवेदनशीलता किसी भी सभ्य समाज की बुनियाद होती है। उन्होंने मीर शाह हुसैन आरिफ की इस पहल को शहर की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

कार्यक्रम के दौरान साहित्य, समाज और समय से जुड़े विषयों पर अनौपचारिक चर्चाएँ भी होती रहीं। शायरों और पत्रकारों के बीच संवाद ने माहौल को और जीवंत बना दिया। यह आयोजन एक तरह से साहित्यिक संगोष्ठी और सामाजिक समागम का स्वरूप भी लेता नजर आया, जहाँ विचारों का आदान-प्रदान खुलकर हुआ।

अंत में मोहम्मद जफ़र आरज़ू, जमाल हुसैन और अलमदार यूसुफ़ ने संयुक्त रूप से मंच से सभी अतिथियों, विद्वानों, पत्रकारों और सहयोगियों का दिल से आभार प्रकट किया। उन्होंने कहा कि सभी की सहभागिता और सद्भाव के कारण ही यह आयोजन सफल और यादगार बन सका।

कुल मिलाकर, मीर शाह हुसैन आरिफ के आवास पर आयोजित नियाज़ लंगर-ए-आम का यह कार्यक्रम धार्मिक आस्था, साहित्यिक चेतना और सामाजिक समरसता का एक सुंदर संगम साबित हुआ। इसने एक बार फिर यह संदेश दिया कि जब इंसानियत, सेवा और संस्कृति साथ चलती हैं, तो समाज में सकारात्मक ऊर्जा और आपसी भाईचारे की मजबूत नींव पड़ती है।

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