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मुंबई मेयर पद पर सियासी घमासान: BJP की राह में शिंदे सेना बन सकती है बड़ी चुनौती

मुंबई | 17 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार    

मुंबई की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। देश की सबसे अमीर नगर निकाय—बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC)—में सत्ता परिवर्तन लगभग तय माना जा रहा है, लेकिन असली लड़ाई अब मेयर पद को लेकर शुरू हो चुकी है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) भले ही सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी हो, परंतु मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना (शिंदे गुट) इस पूरे खेल में ऐसी स्थिति में है कि वह BJP की योजनाओं में “स्पैनर” डाल सकती है।

Symbolic Image 

राजनीतिक सूत्रों और विश्लेषकों के अनुसार, बीएमसी में बहुमत का गणित जितना सरल दिखता है, सत्ता-साझेदारी का समीकरण उतना ही जटिल और संवेदनशील है।


बीएमसी चुनाव परिणाम: बहुमत से ऊपर, लेकिन निर्भरता पूरी

227 सदस्यीय बृहन्मुंबई नगर निगम में बहुमत का जादुई आंकड़ा 114 है। ताजा नतीजों के मुताबिक:

  • BJP: 88 वार्डों में जीत या बढ़त

  • शिंदे गुट की शिवसेना: 29 वार्डों में बढ़त

  • कुल (महायुति): 117 सीटें

संख्यात्मक रूप से देखें तो महायुति बहुमत से सिर्फ तीन सीट ऊपर है। यही पतला अंतर शिंदे गुट को असाधारण राजनीतिक ताकत देता है। साफ है कि शिंदे शिवसेना के बिना BJP बीएमसी नहीं चला सकती, और यही मजबूरी शिंदे के लिए सौदेबाज़ी का सबसे मजबूत हथियार बन गई है।


‘किंगमेकर’ की भूमिका में शिंदे

भले ही शिंदे गुट की सीटें BJP से लगभग एक-तिहाई हों, लेकिन मौजूदा हालात में उनकी भूमिका निर्णायक है। NDTV से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इसी गणित के आधार पर एकनाथ शिंदे अपनी पार्टी से मेयर बनाने का दबाव बना सकते हैं।

शिंदे गुट के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से यह संकेत देना भी शुरू कर दिया है कि
“मुंबई का मेयर शिवसेना का होना चाहिए, क्योंकि यह बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक और भावनात्मक विरासत रही है।”

यह तर्क केवल सत्ता का नहीं, बल्कि शिवसेना की ऐतिहासिक पहचान और कार्यकर्ताओं की भावनाओं से भी जुड़ा हुआ है।


25 वर्षों की विरासत और ठाकरे काल की छाया

यह तथ्य नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि अविभाजित शिवसेना ने लगातार लगभग 25 वर्षों (1997–2022) तक बीएमसी में मेयर पद अपने पास रखा। ठाकरे परिवार के लिए बीएमसी सिर्फ एक नगर निगम नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति का केंद्र रही है।

शिंदे गुट खुद को उसी शिवसेना की “वास्तविक उत्तराधिकारी” के रूप में पेश करता है। ऐसे में यदि मेयर पद पूरी तरह BJP को दे दिया जाता है, तो शिंदे को अपने ही समर्थकों के बीच जवाबदेही का सामना करना पड़ सकता है।


शिंदे का बयान: सियासी भाषा में संतुलन

नतीजों के बाद मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने बेहद संतुलित और कूटनीतिक बयान दिया:

“हमारा एजेंडा विकास है। हमने महायुति के रूप में चुनाव लड़ा है और हम बैठकर तय करेंगे कि मुंबई के हित में क्या सबसे बेहतर है।”

इस बयान में न तो मेयर पद की मांग खुलकर रखी गई, न ही BJP को खुली छूट दी गई। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह बयान दरअसल दबाव बनाने की रणनीति है—ताकि बातचीत की मेज़ पर शिंदे की सौदेबाज़ी मजबूत बनी रहे।


क्या निकलेगा ‘ढाई-ढाई साल’ का फॉर्मूला?

राजनीतिक हलकों में एक संभावित समाधान पर चर्चा तेज है—
मेयर पद का कार्यकाल दो हिस्सों में बांटना।

  • पहले 2.5 साल: शिंदे गुट का मेयर

  • शेष 2.5 साल: BJP का मेयर

इस तरह का फॉर्मूला महाराष्ट्र की राजनीति में नया नहीं है और इससे दोनों दल अपने-अपने समर्थकों को संतुष्ट कर सकते हैं। हालांकि, यह तभी संभव है जब दोनों पक्षों में भरोसा और लिखित सहमति बने।


ठाणे फैक्टर: शिंदे की ताकत या समझौते की वजह?

इस पूरे घटनाक्रम में ठाणे नगर निगम की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है। 131 सदस्यीय ठाणे नगर निगम में:

  • शिंदे शिवसेना: 70+ सीटें

  • BJP: केवल 28 सीटें

यहां शिंदे गुट अपने दम पर मेयर बना सकता है। ठाणे, मुंबई का सैटेलाइट शहर होने के साथ-साथ राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

विश्लेषकों का मानना है कि ठाणे में इतनी मजबूत स्थिति शिंदे को बीएमसी में कुछ लचीलापन दिखाने की गुंजाइश दे सकती है। बदले में वे मुंबई में:

  • स्थायी समिति (Standing Committee) की अध्यक्षता

  • प्रमुख समितियों का नियंत्रण

  • अहम वार्डों पर पकड़

जैसी शक्तिशाली जिम्मेदारियां अपने पास रख सकते हैं।


पर्दे के पीछे तीखी बातचीत तय

राजनीतिक विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि यदि शिंदे बिना किसी ठोस हिस्सेदारी के मेयर पद छोड़ देते हैं, तो इससे उनके कार्यकर्ताओं में निराशा और असंतोष फैल सकता है। यही कारण है कि:

  • उप-महापौर पद

  • स्थायी समिति की कुर्सी

  • बजट और ठेकों से जुड़ी समितियां

इन सभी मुद्दों पर बंद कमरे में कड़ी मोलभाव लगभग तय मानी जा रही है।


निष्कर्ष:-

 सत्ता महायुति की, लेकिन शर्तें शिंदे तय करेंगे?

बीएमसी में सत्ता का गणित भले ही महायुति के पक्ष में जाता दिख रहा हो, लेकिन मेयर पद को लेकर अंतिम फैसला आसान नहीं है। BJP संख्या बल में आगे है, पर राजनीतिक मजबूरी शिंदे के पाले में है

आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि मुंबई की राजनीति में विकास का एजेंडा भारी पड़ता है या शिवसेना की ऐतिहासिक विरासत और आंतरिक शक्ति-संतुलन एक नया सियासी मोड़ ले आता है। एक बात तय है—
मुंबई का मेयर कौन बनेगा, यह फैसला सिर्फ आंकड़ों से नहीं, बल्कि सियासी सौदेबाज़ी से तय होगा।

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