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चाबहार से पीछे हटता भारत: क्या अमेरिकी दबाव में दम तोड़ रही है मोदी सरकार की ‘स्वतंत्र विदेश नीति’?

  17 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार  

अमेरिका के इशारों पर डोलती रणनीति और सवालों के घेरे में ‘विश्वगुरु’ का दावा

ईरान के चाबहार बंदरगाह को लेकर उठी ताज़ा बहस ने एक बार फिर भारत की विदेश नीति की वास्तविक स्थिति को नंगा कर दिया है। जिस चाबहार परियोजना को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद भारत की रणनीतिक स्वायत्तता, क्षेत्रीय नेतृत्व और पाकिस्तान को बाइपास करने की ऐतिहासिक उपलब्धि बताते रहे, उसी से भारत के कथित तौर पर पीछे हटने की खबरें आज सरकार के तमाम दावों पर सवालिया निशान लगा रही हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर 25 प्रतिशत टैरिफ़ लगाने की घोषणा के बाद जिस तरह भारत की नीति लड़खड़ाती दिखाई दे रही है, वह केवल चाबहार तक सीमित नहीं है—यह पूरी मोदी सरकार की विदेश नीति की वैचारिक विफलता को उजागर करता है।


चाबहार: एक बंदरगाह नहीं, भारत की रणनीतिक रीढ़

चाबहार बंदरगाह भारत के लिए सिर्फ़ एक कारोबारी परियोजना नहीं थी। यह भारत की उस दीर्घकालिक रणनीति का केंद्र था, जिसके ज़रिए वह:

  • पाकिस्तान को बाइपास कर

  • अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुँच

  • इंटरनेशनल नॉर्थ–साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) को मज़बूती

  • और चीन के ग्वादर पोर्ट के मुक़ाबले एक ठोस जवाब

दे सकता था।

साल 2003 में इसकी परिकल्पना हुई, 2016 में नरेंद्र मोदी ने इसे मंज़ूरी दी, 2019 में पहली खेप आई और 2024 में 10 साल का ऑपरेशन समझौता हुआ—जिसे खुद मोदी सरकार ने “किसी तीसरे देश के दबाव से मुक्त निर्णय” बताया था।

आज वही सरकार अमेरिकी टैरिफ़ और प्रतिबंधों की आशंका से इस परियोजना से दूरी बनाती नज़र आ रही है।


अमेरिकी दबाव और भारत की चुप्पी: क्या यही ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ है?

विदेश मंत्रालय यह कहकर बचाव में है कि अमेरिका से छूट को अंतिम रूप देने के लिए बातचीत जारी है। लेकिन सबसे अहम बात यह है कि सरकार ने चाबहार से पीछे हटने की रिपोर्टों का स्पष्ट खंडन नहीं किया है।

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़:

  • भारत ने तय निवेश ईरान को ट्रांसफर कर दिया

  • इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड ने संचालन से दूरी बना ली

  • ताकि भविष्य के अमेरिकी प्रतिबंधों से बचा जा सके

अगर यह सच है, तो यह एक कूटनीतिक समझदारी नहीं, बल्कि रणनीतिक आत्मसमर्पण है।


मोदी सरकार बनाम मोदी के अपने बयान

याद दिलाना ज़रूरी है कि 2024 में प्रधानमंत्री मोदी ने साफ़ कहा था:

“हम अपने फैसले किसी तीसरे देश के दबाव में नहीं लेते।”

आज सवाल यह है—
तो फिर चाबहार से पीछे हटने की मजबूरी किसकी है?
क्या अमेरिका अब ‘तीसरा देश’ नहीं रहा?


चीन को खुली छूट, भारत पर सख़्ती—और मोदी सरकार की खामोशी

रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी का सवाल बेहद तीखा है। अमेरिका ने:

  • चीन को ईरान से तेल खरीदने पर गंभीर सज़ा नहीं दी

  • जबकि भारत ने 2019 में अमेरिकी इशारे पर ईरान से तेल खरीद बंद कर दी

नतीजा?

  • भारत–ईरान ऊर्जा संबंध टूटे

  • चीन को सस्ता ईरानी तेल मिला

  • और आज वही चीन ईरान का सबसे बड़ा लाभार्थी है

तो फिर मोदी सरकार अमेरिका से यह सवाल क्यों नहीं पूछती कि नियम सबके लिए बराबर क्यों नहीं?


‘विश्वगुरु’ की छवि और ज़मीनी हकीकत

वरिष्ठ विश्लेषक सदानंद धुमे और क्रिस्टोफर क्लौरी जैसे अंतरराष्ट्रीय जानकारों की टिप्पणी मोदी सरकार की उस ब्रांडिंग को चुनौती देती है, जिसमें भारत को एक उभरती महाशक्ति के रूप में पेश किया जाता है।

हकीकत यह है कि:

  • 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का शोर

  • 20–30 ट्रिलियन डॉलर की ताक़तों के सामने

  • नीति-निर्माण में आत्मविश्वास पैदा नहीं कर पा रहा

घरेलू राजनीति में ‘विश्वगुरु’ का नारा भले बिक जाए, लेकिन वैश्विक मंच पर भारत अब भी दबाव झेलने वाली मध्यम शक्ति ही बना हुआ है।


क्या यह केवल चाबहार का मामला है? नहीं।

यह मामला:

  • रूस से तेल खरीद

  • ईरान से रिश्ते

  • अमेरिका के साथ असमान साझेदारी

  • और ‘मल्टीपोलर’ विदेश नीति के खोखले दावों

सबका जोड़ है।

ज़ोरावर दौलत सिंह सही कहते हैं कि भारत पिछले एक दशक से अमेरिकी भू-राजनीतिक ढांचे में फिट होने की कोशिश करता रहा है—वह भी अपने ही हितों की क़ीमत पर।


निष्कर्ष:-

 सवाल मोदी से ही बनता है ?

चाबहार पर उठी बहस असल में एक बड़ा सवाल पूछती है:

क्या भारत अब भी स्वतंत्र विदेश नीति वाला देश है, या अमेरिकी दबाव में फैसले लेने वाला सहयोगी?

अगर मोदी सरकार आज चाबहार जैसे रणनीतिक प्रोजेक्ट पर डगमगाती है, तो कल और किस मोर्चे पर समझौता होगा?

यह लेख किसी एक बंदरगाह की नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति की साख, आत्मविश्वास और राजनीतिक ईमानदारी की पड़ताल है—और इस कसौटी पर मोदी सरकार फिलहाल कठघरे में खड़ी दिखाई देती है।

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