नई दिल्ली | 15 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार
लेकिन क्या संवैधानिक टकराव में अदालत भी सवालों के घेरे में?
प्रवर्तन निदेशालय (ED) और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच जारी टकराव ने अब केवल कानूनी नहीं, बल्कि संवैधानिक और राजनीतिक विमर्श का रूप ले लिया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा ED अधिकारियों के खिलाफ दर्ज FIRs पर रोक और ममता बनर्जी सरकार से जवाब तलब किए जाने को एक ओर जहाँ राज्य सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इस पूरे घटनाक्रम ने न्यायपालिका की भूमिका और उसकी स्वतंत्रता को लेकर भी नई बहस को जन्म दे दिया है।
सुप्रीम कोर्ट की सख़्त टिप्पणी: “कानूनहीनता का रास्ता”
न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्रा और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने कहा—
“यदि इन सवालों का जवाब नहीं मिला, तो इससे कानूनहीनता की स्थिति पैदा होगी। यदि कोई केंद्रीय एजेंसी bona fide तरीके से गंभीर अपराध की जांच कर रही है, तो क्या उसे राजनीतिक गतिविधियों के ज़रिये रोका जा सकता है?”
इस टिप्पणी के साथ ही कोर्ट ने संकेत दिया कि वह इस मामले को राज्य एजेंसियों द्वारा केंद्रीय जांच में हस्तक्षेप के एक गंभीर उदाहरण के रूप में देख रही है।
FIR पर रोक और शीर्ष अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग
सुप्रीम कोर्ट ने ED अधिकारियों के खिलाफ दर्ज FIRs पर रोक लगाते हुए गृह मंत्रालय, DoPT, पश्चिम बंगाल सरकार, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस से जवाब मांगा है।
इसके साथ ही बंगाल के DGP राजीव कुमार और कोलकाता पुलिस कमिश्नर मनोज कुमार वर्मा को निलंबित करने की मांग वाली याचिका पर भी जवाब तलब किया गया है।
ED ने इस पूरे मामले की CBI जांच कराने की मांग भी रखी है, जिसे अदालत ने गंभीरता से लेते हुए अगली सुनवाई 3 फरवरी को तय की है।
कोलकाता हाईकोर्ट की अव्यवस्था पर सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी
इस मामले से जुड़ी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 9 जनवरी को कोलकाता हाईकोर्ट में हुई अराजकता पर भी तीखी नाराज़गी जताई।
Solicitor General तुषार मेहता ने इसे “मॉबोक्रेसी” बताया और कहा कि अदालत को जंतर-मंतर में बदल दिया गया।
पीठ ने टिप्पणी की—
“क्या हाईकोर्ट को विरोध स्थल में बदल दिया गया था?”
ED के आरोप बनाम ममता सरकार का बचाव
ED का आरोप है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्वयं I-PAC सह-संस्थापक प्रतीक जैन के आवास से सबूत हटाए, जिसे Solicitor General ने “चोरी” करार दिया।
वहीं ममता बनर्जी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि ED की कार्रवाई विधानसभा चुनाव से ठीक पहले की गई और I-PAC के पास मौजूद चुनावी डेटा गोपनीय है, जिसकी रक्षा करना मुख्यमंत्री का अधिकार है।
यहीं से उठता है बड़ा सवाल: क्या संस्थाएं निष्पक्ष हैं?
इस पूरे मामले ने एक पुराने, लेकिन लगातार उठते रहे सवाल को फिर से केंद्र में ला दिया है।
विपक्षी दलों और नागरिक समाज के एक बड़े वर्ग का आरोप रहा है कि बीते वर्षों में सत्ता पक्ष ने लगभग सभी संवैधानिक संस्थाओं पर प्रभाव बढ़ाया है — चाहे वह जांच एजेंसियां हों, राज्यपाल हों या नियामक संस्थाएं।
इसी आरोप की एक कड़ी के रूप में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर भी प्रश्नचिह्न लगाए जाते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि कई संवेदनशील मामलों में अदालत ने:
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सत्ता के विरुद्ध अपेक्षित कठोरता नहीं दिखाई
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फैसलों में असाधारण विलंब हुआ
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या फिर अंतरिम आदेशों तक सीमित रहकर मूल प्रश्नों को टाल दिया गया
ऐसे उदाहरण पहले भी देखे जा चुके हैं, जहाँ अदालत ने तीखी टिप्पणियां तो कीं, लेकिन ठोस और निर्णायक फैसले देने से परहेज़ किया।
“भावनाएं बार-बार बेकाबू नहीं हो सकतीं”
जब बंगाल सरकार की ओर से 9 जनवरी की घटना को “भावनात्मक प्रतिक्रिया” बताया गया, तो सुप्रीम कोर्ट ने सख़्त लहजे में कहा—
“भावनाएं बार-बार काबू से बाहर नहीं जा सकतीं।”
यह टिप्पणी सिर्फ़ बंगाल सरकार के लिए नहीं, बल्कि सत्ता और संस्थाओं — दोनों के लिए चेतावनी मानी जा रही है।
निष्कर्ष:-
एजेंसियों की लड़ाई या संविधान की परीक्षा?
ED बनाम बंगाल सरकार का यह विवाद अब केवल छापेमारी या FIR तक सीमित नहीं रहा। यह मामला—
संघीय ढांचे
सबकी एक साथ परीक्षा ले रहा है।
3 फरवरी को होने वाली अगली सुनवाई से यह स्पष्ट होगा कि सुप्रीम कोर्ट केवल सख़्त टिप्पणियों तक सीमित रहता है या फिर वास्तव में सत्ता और व्यवस्था — दोनों के लिए एक स्पष्ट संवैधानिक लकीर खींचता है।
यही वह बिंदु है, जहाँ से यह मामला इतिहास में न्यायपालिका की दृढ़ता या उसकी सीमाओं — दोनों में से किसी एक के उदाहरण के रूप में दर्ज हो सकता है।
