नई दिल्ली | 20 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार
भारतीय जनता पार्टी के इतिहास में कई ऐसे मोड़ आए हैं जब संगठन मज़बूत दिखता था, सत्ता स्थिर लगती थी और नेतृत्व निर्विवाद प्रतीत होता था—लेकिन ठीक उसी समय भीतर ही भीतर सबसे गहरी चुनौतियाँ आकार ले रही थीं। 45 वर्षीय नितिन नबीन का बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना भी ऐसा ही एक क्षण है।
ऊपर से देखने पर यह एक सहज, सुरक्षित और नियंत्रित नेतृत्व परिवर्तन लगता है। लेकिन परतें हटाइए, तो यह नियुक्ति पार्टी के भीतर चल रही पीढ़ीगत बदलाव, शक्ति-संतुलन, वैचारिक तनाव और भविष्य की अनिश्चित राजनीति की ओर इशारा करती है।
यह लेख नितिन नबीन की नियुक्ति को सिर्फ़ “पाँच चुनौतियों” में नहीं बाँधता, बल्कि इसे बीजेपी के अगले दशक की दिशा तय करने वाले राजनीतिक मोड़ के रूप में देखता है।
जनसंघ से बीजेपी तक: इतिहास की छाया में वर्तमान
जब अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी युवा अवस्था में जनसंघ के अध्यक्ष बने थे, तब पार्टी सत्ता के हाशिये पर थी। संघर्ष, वैचारिक स्पष्टता और संगठन निर्माण ही उनका मूल लक्ष्य था।
नितिन नबीन इसके ठीक उलट परिस्थिति में अध्यक्ष बने हैं—
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केंद्र में लगातार तीसरी बार सरकार
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240 लोकसभा सीटें
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21 राज्यों में सत्ता या सत्ता-साझेदारी
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राज्यसभा में निर्णायक उपस्थिति
इतिहास बताता है कि सत्ता में बैठी पार्टी के लिए सबसे कठिन काम जीतना नहीं, बल्कि अपनी जीत को टिकाए रखना होता है।
चुनौती नहीं, बल्कि परीक्षा: नितिन नबीन का वास्तविक इम्तिहान
1. चुनावी विजय से राजनीतिक वैधता तक
2026 से 2029 का समय बीजेपी के लिए केवल चुनावों की श्रृंखला नहीं है, बल्कि राजनीतिक पुनर्संरचना का दौर है।
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परिसीमन
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महिला आरक्षण
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शहरी–ग्रामीण जनसांख्यिकीय बदलाव
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युवा मतदाताओं का मोहभंग
इन सबके बीच नितिन नबीन को पार्टी को केवल चुनाव जीतने वाली मशीन नहीं, बल्कि नए सामाजिक समीकरणों से जुड़ी राजनीतिक इकाई के रूप में ढालना होगा।
पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में बीजेपी की समस्या सिर्फ़ संगठन की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्वीकार्यता की है।
2. मोदी युग के बाद का प्रश्न: उत्तराधिकारी नहीं, उत्तरजीविता
नरेंद्र मोदी सिर्फ़ प्रधानमंत्री नहीं हैं, वे बीजेपी की पहचान हैं।
लेकिन राजनीति में कोई भी पहचान स्थायी नहीं होती।
2029 तक मोदी 80 के क़रीब होंगे। सवाल यह नहीं है कि “मोदी के बाद कौन?”, सवाल यह है कि
क्या बीजेपी मोदी के बाद भी वैसी ही रहेगी?
अमित शाह का संगठनात्मक कौशल बनाम योगी आदित्यनाथ की जन–लोकप्रियता—
यह द्वंद्व पार्टी के भीतर दबा हुआ है, लेकिन मौजूद है।
नितिन नबीन का असली इम्तिहान यही होगा कि वे इस द्वंद्व को
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टकराव बनने से रोकें
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और संक्रमण को संस्थागत रूप दें
3. संगठन बनाम आलाकमान: नियंत्रण की राजनीति
बीजेपी कभी “कैडर-बेस्ड पार्टी” कहलाती थी।
आज वह हाई-कमांड संचालित सत्ता संरचना में बदल चुकी है।
नितिन नबीन संगठन से आए नेता हैं, लेकिन सत्ता का केंद्र संगठन नहीं, बल्कि पीएमओ और शीर्ष नेतृत्व है।
यही उनकी सबसे बड़ी दुविधा है—
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संगठन को मज़बूत करें या
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सत्ता-संतुलन को न छुएँ
इतिहास गवाह है कि जो अध्यक्ष संगठन को ताक़त देता है, वही अंततः सत्ता को असहज करता है।
4. वैश्विक दबाव और घरेलू राजनीति की टकराहट
डोनाल्ड ट्रंप की वापसी ने भारत की विदेश नीति को असहज कर दिया है—
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अमेरिका का संरक्षणवादी रवैया
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चीन से मजबूरी में संवाद
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ईरान पर प्रतिबंधों का दबाव
इन सबका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और रोज़गार नैरेटिव पर पड़ेगा।
जब विकास की रफ्तार धीमी होती है, तब वैचारिक राजनीति तेज़ होती है।
नितिन नबीन को यह तय करना होगा कि बीजेपी
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आर्थिक यथार्थ से भागेगी
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या नए विकास मॉडल की बात करेगी
5. विचारधारा बनाम विविधता: बीजेपी की पुरानी चुनौती
“हिन्दी–हिन्दू–हिन्दुस्तान” की राजनीति ने उत्तर भारत में बीजेपी को ताक़त दी,
लेकिन वही राजनीति दक्षिण और पूरब में दीवार बन गई।
आज का भारत
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बहुभाषी है
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बहुसांस्कृतिक है
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और क्षेत्रीय अस्मिता को लेकर पहले से ज़्यादा सजग है
नितिन नबीन के सामने सवाल यह नहीं है कि विचारधारा बदली जाए या नहीं,
सवाल यह है कि क्या विचारधारा संवाद करना सीख सकती है?
नितिन नबीन: सुरक्षित चयन या रणनीतिक जोखिम?
नितिन नबीन का लो–प्रोफाइल होना उनकी सबसे बड़ी ताक़त भी है और सबसे बड़ी सीमा भी।
वे न तो करिश्माई नेता हैं, न ही वैचारिक धुरी।
लेकिन शायद यही बीजेपी नेतृत्व चाहता है—
एक ऐसा अध्यक्ष
जो व्यवस्था को चुनौती न दे
बल्कि उसे स्थिर रखे।
पर राजनीति में स्थिरता अक्सर ठहराव में बदल जाती है।
निष्कर्ष: कमान हाथ में है, लेकिन दिशा तय नहीं
इतिहास यह तय करेगा कि वे
सिर्फ़ एक संक्रमणकालीन अध्यक्ष बनकर रहेंगे
या
