20 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार
भारत पर अमेरिकी दावा: क्या वाकई रूसी तेल की खरीद बंद हो चुकी है?
स्कॉट बेसेंट ने दावा किया है कि ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत पर लगाए गए 25 प्रतिशत टैरिफ के बाद नई दिल्ली ने रूसी तेल की खरीद को “लगभग पूरी तरह रोक दिया है।” उनका कहना है कि यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदना शुरू किया था, लेकिन अमेरिकी आर्थिक दबाव के चलते भारत ने अपनी नीति में बदलाव किया।
हालाँकि, भारत की ओर से इस दावे की कोई सीधी पुष्टि नहीं की गई है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने “पूरी तरह बंद” करने के बजाय अपनी खरीद रणनीति को धीमा और विविधीकृत किया है। यानी भारत अब भी बाजार स्थितियों के आधार पर निर्णय ले रहा है, न कि किसी एक देश के दबाव में।
500% टैरिफ बिल क्या है और यह कितना खतरनाक है?
अमेरिकी सीनेट में रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम द्वारा पेश किया गया रूस सैंक्शंस बिल इस पूरे विवाद की जड़ है। यह बिल अमेरिका के राष्ट्रपति को यह अधिकार देगा कि वे रूस से तेल खरीदने वाले किसी भी देश पर कम से कम 500% टैरिफ लगा सकें।
इसका सीधा असर उन देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा जो अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए रूस पर निर्भर हैं। भारत, चीन और ब्राज़ील जैसे विकासशील देशों के लिए यह बिल बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।
क्या ट्रंप को सीनेट की मंज़ूरी की ज़रूरत है?
स्कॉट बेसेंट के मुताबिक, ट्रंप को इस तरह के टैरिफ लगाने के लिए सीनेट की अनुमति जरूरी नहीं है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति International Emergency Economic Powers Act (IEPA) के तहत पहले से ही यह अधिकार रखते हैं। हालांकि, सीनेट इस अधिकार को औपचारिक और निर्विवाद बनाना चाहती है ताकि भविष्य में किसी कानूनी चुनौती से बचा जा सके।
यह बयान साफ संकेत देता है कि अमेरिका रूस के खिलाफ आर्थिक युद्ध को और आक्रामक रूप देने की तैयारी में है।
यूरोप बनाम भारत: दोहरे मापदंडों का सवाल
स्कॉट बेसेंट ने अपने बयान में यूरोपीय देशों पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि आज भी कई यूरोपीय देश रूस से तेल खरीद रहे हैं और इस तरह “अप्रत्यक्ष रूप से उस युद्ध को फंड कर रहे हैं जो अंततः उनके ही खिलाफ है।”
इसके उलट, भारत को उन्होंने एक ऐसा देश बताया जिसने अमेरिकी टैरिफ के बाद अपनी नीति में बदलाव किया। यह बयान कूटनीतिक रूप से भारत के लिए राहत भरा माना जा रहा है, क्योंकि अक्सर पश्चिमी देश भारत को रूस के करीब बताकर आलोचना करते रहे हैं।
चीन पर सबसे बड़ा दबाव, भारत पर रणनीतिक संतुलन
इस पूरे घटनाक्रम में चीन अमेरिका का सबसे बड़ा लक्ष्य बना हुआ है। अमेरिका का मानना है कि चीन रूस से तेल खरीदकर न सिर्फ उसे आर्थिक रूप से मज़बूत कर रहा है, बल्कि पश्चिमी प्रतिबंधों को भी कमजोर कर रहा है।
लिंडसे ग्राहम पहले ही कह चुके हैं कि यह विधेयक राष्ट्रपति को “चीन, भारत और ब्राज़ील जैसे देशों पर अभूतपूर्व दबाव” डालने का हथियार देगा। हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत और चीन को एक ही तराजू में तौलना रणनीतिक रूप से सही नहीं है।
भारत की आधिकारिक प्रतिक्रिया: स्पष्ट, लेकिन संतुलित
भारत के विदेश मंत्रालय ने इस मुद्दे पर बेहद सावधानी से प्रतिक्रिया दी है। प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत इस प्रस्तावित अमेरिकी बिल से पूरी तरह अवगत है और उससे जुड़े सभी घटनाक्रमों पर करीबी नज़र रखे हुए है।
उन्होंने यह भी दोहराया कि भारत की ऊर्जा नीति किसी राजनीतिक दबाव से नहीं, बल्कि वैश्विक बाजार स्थितियों और घरेलू ज़रूरतों से तय होती है।
“भारत 1.4 अरब लोगों के लिए सस्ती, सुरक्षित और भरोसेमंद ऊर्जा सुनिश्चित करने को प्राथमिकता देता है।”
ऊर्जा सुरक्षा बनाम भू-राजनीति
विश्लेषकों के अनुसार, यह पूरा विवाद ऊर्जा से कहीं आगे की कहानी कहता है। यह मामला इस बात का उदाहरण है कि कैसे तेल, गैस और टैरिफ अब कूटनीतिक हथियार बन चुके हैं। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता न करे।
अब तक भारत ने यह संतुलन बखूबी साधा है—चाहे वह रूस से संबंध हों या अमेरिका के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग।
निष्कर्ष:
आने वाले समय में और बढ़ेगा दबाव
रूस से तेल खरीद पर 500% अमेरिकी टैरिफ की धमकी आने वाले महीनों में वैश्विक ऊर्जा बाजार, भारत-अमेरिका संबंधों और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को गहराई से प्रभावित कर सकती है। भारत फिलहाल संयम, व्यावहारिकता और रणनीतिक चतुराई के रास्ते पर आगे बढ़ता दिख रहा है, लेकिन यह मुद्दा अभी खत्म होने से बहुत दूर है।
