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मोदी–ट्रंप फोन कॉल विवाद: क्या एक कॉल की कमी से अटक गया भारत–अमेरिका व्यापार समझौता?

9 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार     

अमेरिका के वाणिज्य सचिव के बयान से मचा कूटनीतिक हलचल

भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से लंबित व्यापार समझौते को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। अमेरिका के वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लटनिक ने दावा किया है कि वर्ष 2025 में भारत के साथ प्रस्तावित ट्रेड डील सिर्फ इसलिए पूरी नहीं हो सकी, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फोन नहीं किया।

यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के रिश्ते पहले से ही टैरिफ, रूस-यूक्रेन युद्ध और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर तनावपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं।


“तीन शुक्रवार” और एक फोन कॉल: अमेरिका का दावा क्या है?

एक पॉडकास्ट इंटरव्यू में हॉवर्ड लटनिक ने कहा कि अमेरिका ने भारत को व्यापार समझौता अंतिम रूप देने के लिए “तीन शुक्रवार” का समय दिया था। उनके अनुसार, यह समझौता लगभग तैयार था और अंतिम औपचारिकता के तौर पर प्रधानमंत्री मोदी को राष्ट्रपति ट्रंप से सीधे बात करनी थी।

लटनिक के शब्दों में, भारत इस फोन कॉल को लेकर “असहज” था और इसी हिचकिचाहट ने पूरे समझौते को पटरी से उतार दिया। उन्होंने यहां तक कहा कि वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों से पहले भारत के साथ डील होने की पूरी उम्मीद थी, लेकिन अंतिम क्षणों में सब रुक गया।


भारत का कड़ा खंडन: “तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया”

अमेरिकी दावे के तुरंत बाद भारत सरकार ने इस पर सख्त प्रतिक्रिया दी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि लटनिक की टिप्पणी “तथ्यात्मक रूप से सही नहीं” है।

उन्होंने बताया कि वर्ष 2025 में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच कम से कम आठ बार फोन पर बातचीत हुई थी। भारत के अनुसार, दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर कई बार सहमति के बेहद करीब पहुंचा गया था, लेकिन उसे केवल एक फोन कॉल से जोड़कर देखना वास्तविकता को सरलीकृत करना है।


व्यापार समझौते से दूर क्यों है भारत?

भारत इस समय उन गिनी-चुनी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है जिनके साथ अमेरिका का व्यापक व्यापार समझौता अब तक नहीं हो पाया है। अगस्त 2025 में ट्रंप प्रशासन ने भारतीय निर्यात पर 50 प्रतिशत तक का भारी टैरिफ लगा दिया था, जो एशिया में सबसे अधिक माना गया।

इसका एक बड़ा कारण रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिका की नाराजगी थी, खासकर यूक्रेन युद्ध के बाद। इन टैरिफ्स ने भारत–अमेरिका के आर्थिक संबंधों में कड़वाहट घोल दी, जो अब तक पूरी तरह दूर नहीं हो पाई है।


बार-बार बातचीत, फिर भी कोई समयसीमा नहीं

सितंबर 2025 के बाद से मोदी और ट्रंप के बीच कम से कम चार बार बातचीत हो चुकी है, जिनका उद्देश्य बिगड़े रिश्तों को सुधारना था। इसके बावजूद व्यापार समझौते को लेकर आज तक कोई स्पष्ट समयसीमा सामने नहीं आई है।

स्थिति तब और संवेदनशील हो गई जब राष्ट्रपति ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से यह दावा किया कि उन्होंने मई में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए चार दिवसीय सैन्य टकराव के दौरान युद्धविराम में मध्यस्थता की थी। भारत ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया, जिससे नई दिल्ली में नाराजगी और बढ़ी।


फोन कॉल से आगे की कहानी: क्या यह सत्ता, प्रतिष्ठा और रणनीति की लड़ाई है?

विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद सिर्फ एक फोन कॉल तक सीमित नहीं है। इसके पीछे वैश्विक सत्ता संतुलन, रणनीतिक स्वायत्तता और घरेलू राजनीति जैसे बड़े कारक काम कर रहे हैं।

भारत अब खुद को केवल एक “डील सीकर” देश के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र वैश्विक शक्ति के तौर पर देखता है, जबकि ट्रंप प्रशासन व्यक्तिगत कूटनीति और प्रत्यक्ष संवाद को अत्यधिक महत्व देता रहा है। यही दृष्टिकोणों का टकराव इस गतिरोध की असली वजह माना जा रहा है।


निष्कर्ष:-

 एक अधूरा समझौता, कई अनसुलझे सवाल

मोदी–ट्रंप फोन कॉल को लेकर उठा विवाद भारत–अमेरिका संबंधों की जटिलता को उजागर करता है। जहां अमेरिका इसे एक चूकी हुई राजनीतिक पहल के रूप में देख रहा है, वहीं भारत इसे तथ्यहीन और एकतरफा व्याख्या मानता है।

आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या दोनों देश इस कड़वाहट को पीछे छोड़कर व्यावहारिक आर्थिक सहयोग की ओर बढ़ते हैं, या फिर यह विवाद वैश्विक व्यापार राजनीति में एक स्थायी दरार बन जाएगा।

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