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अगर अदालतें चुप रहीं, तो लोकतंत्र मरेगा”: ED छापेमारी के बाद ममता बनर्जी का तीखा संदेश

 9 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार    

क्या जांच एजेंसियों के दुरुपयोग से भारतीय लोकतंत्र खतरे में है

कोलकाता में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई और उसके बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का खुला प्रतिरोध भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक निर्णायक क्षण बनता जा रहा है। यह केवल एक राज्य सरकार और केंद्रीय एजेंसी के बीच टकराव नहीं है, बल्कि यह उस गहराते संकट की ओर इशारा करता है, जिसमें संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

ईडी द्वारा राजनीतिक रणनीति से जुड़ी संस्था आई-पैक और उसके प्रमुख प्रीतिक जैन के कार्यालय व आवास पर की गई छापेमारी को लेकर ममता बनर्जी ने जिस तरह से सीधे हस्तक्षेप किया, वह सत्ता संघर्ष से कहीं अधिक लोकतांत्रिक आत्मरक्षा का प्रयास माना जा रहा है।


चुनाव से ठीक पहले एजेंसियों की सक्रियता पर सवाल

भारत के राजनीतिक इतिहास में यह कोई नई बात नहीं है कि चुनावों से पहले जांच एजेंसियाँ अचानक सक्रिय हो जाती हैं। लेकिन इस बार आरोप और भी गंभीर हैं। ममता बनर्जी का कहना है कि ईडी की कार्रवाई का उद्देश्य किसी कथित आर्थिक अपराध की जांच नहीं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीति, संगठनात्मक ढांचे और मतदाता डेटा तक पहुंच बनाना था।

मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि जिन हार्ड डिस्क, फाइलों और डिजिटल दस्तावेज़ों को जब्त किया गया, वे पार्टी की आंतरिक रणनीति से जुड़े थे, न कि किसी मनी लॉन्ड्रिंग मामले से। यदि यह आरोप सही है, तो यह लोकतंत्र की जड़ों पर सीधा हमला माना जाएगा।


मुख्यमंत्री का हस्तक्षेप क्यों था ज़रूरी

ममता बनर्जी ने अपने हस्तक्षेप को पूरी तरह जायज़ ठहराते हुए कहा कि यदि कोई केंद्रीय एजेंसी किसी राजनीतिक दल की रणनीतिक जानकारी जबरन अपने कब्ज़े में लेने की कोशिश करे, तो एक निर्वाचित मुख्यमंत्री का कर्तव्य बनता है कि वह उसका विरोध करे।

उनका सवाल सीधा था कि क्या विपक्ष को चुनाव लड़ने से पहले ही अपंग करने की साज़िश अब सरकारी नीति बन चुकी है। यदि ऐसा है, तो यह केवल बंगाल की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश के संघीय ढांचे के लिए खतरा है।


सड़क पर उतरी मुख्यमंत्री, लोकतंत्र के समर्थन में जनता

ईडी कार्रवाई के अगले ही दिन जादवपुर से हाज़रा तक ममता बनर्जी की रैली ने साफ संदेश दिया कि यह लड़ाई सिर्फ एक पार्टी की नहीं है। यह रैली उन लाखों लोगों की आवाज़ बन गई, जो मानते हैं कि लोकतंत्र को अब संस्थागत हमलों से बचाने की ज़रूरत है।

पाँच किलोमीटर से अधिक लंबी इस रैली में ममता बनर्जी ने जनता से सीधे संवाद करते हुए कहा कि सत्ता परिवर्तन ईडी और सीबीआई से नहीं, बल्कि जनता के वोट से होता है


केंद्रीय गृह मंत्री पर तीखा हमला और उसका अर्थ

ममता बनर्जी द्वारा केंद्रीय गृह मंत्री पर की गई टिप्पणी केवल राजनीतिक व्यंग्य नहीं थी। उनका आरोप था कि केंद्रीय एजेंसियों को राज्यों के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि केंद्र सरकार को तृणमूल कांग्रेस से राजनीतिक लड़ाई लड़नी है, तो उसे लोकतांत्रिक तरीके से लड़ना चाहिए।

उनका यह बयान भारतीय राजनीति में एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि क्या केंद्र सरकार अब निष्पक्ष संस्थाओं के बजाय दबाव की राजनीति पर निर्भर हो रही है।


ईडी बनाम निर्वाचित सरकार, कौन तय करेगा सीमा

ईडी और मुख्यमंत्री कार्यालय के बयानों में भारी विरोधाभास सामने आया है। ईडी जहां सबूतों से छेड़छाड़ का आरोप लगा रही है, वहीं ममता बनर्जी कह रही हैं कि एजेंसी खुद पार्टी के संवेदनशील दस्तावेज़ उठाकर ले जाना चाहती थी।

यह स्थिति संवैधानिक संतुलन को लेकर गंभीर चिंता पैदा करती है। यदि किसी राज्य की निर्वाचित सरकार यह महसूस करे कि केंद्रीय एजेंसी उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता को कुचल रही है, तो यह संघीय व्यवस्था के विफल होने का संकेत है।


सुप्रीम कोर्ट की भूमिका, लोकतंत्र की आख़िरी उम्मीद

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल न्यायपालिका की भूमिका को लेकर उठता है। यदि भारत का सुप्रीम कोर्ट समय रहते स्वतः संज्ञान नहीं लेता, तो यह एक खतरनाक परंपरा बन सकती है।

लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है। यह समान अवसर, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और संस्थागत स्वतंत्रता पर आधारित व्यवस्था है। यदि जांच एजेंसियाँ चुनाव से पहले विपक्षी दलों की रणनीति अपने कब्ज़े में लेने लगें, तो यह लोकतंत्र की हत्या के समान होगा।

सुप्रीम कोर्ट का समय पर हस्तक्षेप न केवल बंगाल, बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।


बंगाल की लड़ाई, राष्ट्रीय चेतावनी

ममता बनर्जी का यह विरोध अब सिर्फ पश्चिम बंगाल की राजनीति तक सीमित नहीं रह गया है। यह उन सभी राज्यों और राजनीतिक दलों की आवाज़ बन सकता है, जो मानते हैं कि केंद्र सरकार द्वारा संस्थाओं का राजनीतिक उपयोग भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को खोखला कर रहा है।

यह मामला अब ईडी बनाम तृणमूल कांग्रेस नहीं रहा। यह संविधान बनाम सत्ता के केंद्रीकरण की लड़ाई बन चुका है।


निष्कर्ष:-

यदि भारत में लोकतंत्र को बचाना है, तो न्यायपालिका, विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट को ऐसे मामलों में समय रहते हस्तक्षेप करना होगा। अन्यथा, आने वाले चुनावों में मुकाबला राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि जांच एजेंसियों की रणनीतियों के सहारे तय होगा।

ममता बनर्जी का सड़कों पर उतरना सत्ता की जिद नहीं, बल्कि लोकतंत्र को बचाने की चेतावनी है।
आज अगर आवाज़ नहीं उठी, तो कल लोकतंत्र सिर्फ किताबों में रह जाएगा।

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