Type Here to Get Search Results !

ADS5

ADS2

अमेरिकी कार्रवाई, परमाणु पनडुब्बी की नाकामी और पुतिन की ‘शक्ति-छवि’ पर मंडराता संकट

9 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार    

“जो बाघ की सवारी करता है, वह उतरने से डरता है।”
— चीनी कहावत

यह कहावत आज के रूस और उसके राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की स्थिति को सटीक रूप से परिभाषित करती है। सत्ता, विशेषकर अधिनायकवादी सत्ता, केवल निर्णयों से नहीं बल्कि डर, शक्ति और अजेयता की छवि से चलती है। जिस दिन यह छवि दरकती है, उसी दिन सत्ता की नींव हिलने लगती है।

अटलांटिक महासागर में अमेरिकी विशेष बलों द्वारा रूसी झंडे वाले एक तेल टैंकर को जब्त किया जाना, और वह भी उस समय जब कथित तौर पर एक रूसी परमाणु पनडुब्बी आसपास मौजूद थी—इस घटना ने न केवल रूस की सैन्य क्षमता बल्कि पुतिन की “मजबूत नेता” वाली छवि पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।


परमाणु पनडुब्बी के साये में अमेरिकी ‘पायरेसी’

और दुनिया के सामने बेनकाब होती रूस की सीमाएँ

अमेरिकी तट से लगभग 4000 किलोमीटर दूर, खुले समुद्र में एक रूसी-ध्वजित तेल टैंकर पर अमेरिकी सेना का कब्ज़ा केवल एक रणनीतिक कार्रवाई नहीं थी—यह एक राजनीतिक संदेश था।

यह संदेश साफ था:
अमेरिका, रूस की परमाणु धमकियों से भयभीत नहीं है।

यदि रूस वास्तव में अमेरिका के सामने सैन्य रूप से बराबरी की स्थिति में होता, तो वह इस कार्रवाई को मौन दर्शक बनकर नहीं देखता। एक परमाणु पनडुब्बी की मौजूदगी के बावजूद कोई प्रतिक्रिया न होना, रूस को एक ऐसी शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है जो काग़ज़ पर खतरनाक लेकिन ज़मीनी हकीकत में सीमित है।


पुतिन के सामने ‘Catch-22’

जवाब दें तो तबाही, न दें तो कमजोरी

यह घटना पुतिन को एक ऐसे रणनीतिक जाल (Catch-22) में ले आई है, जहाँ दोनों विकल्प घातक हैं।

  • अगर पुतिन प्रतिक्रिया नहीं देते, तो उनकी राष्ट्रवादी और कट्टर समर्थक राजनीति उन्हें “कमज़ोर शासक” मान सकती है।

  • अगर वे प्रतिक्रिया देते हैं, तो अमेरिका और नाटो के साथ सीधा टकराव रूस को सैन्य और आर्थिक रूप से तबाह कर सकता है।

यूक्रेन युद्ध पिछले चार वर्षों से रूस की सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक ऊर्जा को चूस रहा है। ऐसे में अमेरिका के खिलाफ नया मोर्चा खोलना आत्मघाती कदम होगा।


रूसी संसद में उग्र बयानबाज़ी

लेकिन ज़मीनी हकीकत कहीं और

घटना के बाद रूस की संसद (डूमा) में आक्रोश फूट पड़ा।

डिफेंस कमेटी के उपाध्यक्ष अलेक्सी झुरावलेव ने अमेरिका की कार्रवाई को “खुली समुद्री डकैती” बताते हुए यहाँ तक कह दिया कि रूस को अमेरिकी जहाजों पर टॉरपीडो हमले करने चाहिए।

कुछ नेताओं ने परमाणु हथियारों की धमकी भी दी।

बाल्टिक और ब्लैक सी में अमेरिकी तेल टैंकरों को निशाना बनाने की बातें भी हुईं।

लेकिन यह सब राजनीतिक बयानबाज़ी से आगे नहीं बढ़ सकी।


क्यों चुप रहा क्रेमलिन?

विशेषज्ञों का ठंडा विश्लेषण

भारतीय वायुसेना के पूर्व पायलट और रक्षा विशेषज्ञ विजयेंद्र के. ठाकुर के अनुसार—

“रूस ने अपने टैंकर को इसलिए जब्त होने दिया क्योंकि पारंपरिक युद्ध क्षमता में वह अमेरिका और नाटो के सामने टिक नहीं सकता।”

यह स्वीकारोक्ति केवल बाहरी विश्लेषकों तक सीमित नहीं रही। रूस के सैन्य प्रचारक किरिल फेदोरोव ने भी माना कि अमेरिका के खिलाफ रूस के पास परमाणु हथियारों के अलावा कोई ठोस दबाव नहीं है, और उस रास्ते पर जाने का मतलब—सबकी हार।


यूक्रेन युद्ध: रूस की सबसे बड़ी मजबूरी

चार साल से जारी यूक्रेन युद्ध ने रूस को:

  • सैन्य रूप से थका दिया है

  • आर्थिक रूप से अलग-थलग कर दिया है

  • राजनीतिक रूप से यूरोप के खिलाफ खड़ा कर दिया है

यूरोप रूस को अब केवल एक प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि अस्तित्वगत खतरे के रूप में देखता है। ऐसे में अमेरिका के साथ किसी भी स्तर की टकराहट, पूरे पश्चिमी जगत को रूस के खिलाफ एकजुट कर देगी।

रूस आज व्यावहारिक रूप से अकेला है—
सीरिया में असद सत्ता खो चुके हैं,
वेनेजुएला में मादुरो कमजोर हैं,
ईरान अंदरूनी संकटों से जूझ रहा है।


आर्थिक मोर्चे पर भी शिकंजा

500% टैरिफ की चेतावनी

अमेरिका में प्रस्तावित नया विधेयक रूसी तेल और यूरेनियम खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की बात करता है।

चीन शायद इससे न डरे,
लेकिन भारत जैसे देश अपनी रणनीति पर पुनर्विचार को मजबूर हो सकते हैं।

इसका सीधा असर रूस की युद्ध क्षमता और राजस्व पर पड़ेगा।


रूस के पास विकल्प क्या बचता है?

यूक्रेन ही असली रणभूमि

विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका से सीधे टकराने के बजाय रूस की एकमात्र व्यवहारिक रणनीति है—

यूक्रेन मोर्चे पर पूरी ताकत झोंक देना।

विजयेंद्र ठाकुर के शब्दों में—

“रूस को अमेरिका से लड़ने की नहीं, बल्कि अमेरिका को निराश करने की रणनीति अपनानी चाहिए।”

यदि रूस यूक्रेन में अपने सैन्य लक्ष्य हासिल कर लेता है, तो वही अमेरिका को दिया गया उसका सबसे बड़ा जवाब होगा—चाहे वह नाटो विस्तार हो, 2014 का मैदान आंदोलन हो या अब टैंकर की जब्ती।


निष्कर्ष:-

पुतिन की परीक्षा का समय

अटलांटिक में हुआ यह घटनाक्रम केवल एक टैंकर की जब्ती नहीं है।
यह वैश्विक शक्ति संतुलन,
रूस की सैन्य साख,
और पुतिन की व्यक्तिगत सत्ता की परीक्षा है।

अमेरिका चाहता है कि रूस भ्रमित हो, नया मोर्चा खोले और खुद को कमजोर करे।

रूस के लिए समझदारी इसी में है कि वह ध्यान भटकाने वाले जाल में न फँसे, और उस मोर्चे पर डटा रहे जिसे पुतिन खुद “रूस के अस्तित्व का प्रश्न” कह चुके हैं—यूक्रेन

यही लड़ाई तय करेगी कि पुतिन इतिहास में एक अडिग शासक के रूप में याद किए जाएंगे, या एक ऐसे नेता के रूप में जिसकी शक्ति-छवि अटलांटिक की लहरों में डूब गई।

ये भी पढ़े 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.

ADS3

ADS4