Type Here to Get Search Results !

ADS5

ADS2

I-PAC प्रकरण ने उठाया लोकतंत्र, संघीय ढांचे और एजेंसियों की निष्पक्षता पर बड़ा सवाल

कोलकाता | 8 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार    
पश्चिम बंगाल में प्रवर्तन निदेशालय (ED) और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच टकराव अब केवल एक जांच कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है। I-PAC के सह-संस्थापक प्रतीक जैन के आवास और कार्यालय पर हुई छापेमारी ने केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका, उनकी संवैधानिक सीमाएं और विपक्षी राजनीति पर संभावित दबाव को लेकर एक नई और गंभीर बहस छेड़ दी है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का आरोप है कि यह कार्रवाई किसी मनी लॉन्ड्रिंग जांच से अधिक, तृणमूल कांग्रेस की आंतरिक राजनीतिक रणनीति, उम्मीदवार चयन और संगठनात्मक डेटा को निशाना बनाने की कोशिश थी—एक ऐसा आरोप जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।


“राजनीतिक रणनीति कोई आपराधिक साक्ष्य नहीं होती”

ममता बनर्जी का सीधा और संवैधानिक सवाल

ED की कार्रवाई के दौरान ममता बनर्जी स्वयं प्रतीक जैन के आवास और I-PAC कार्यालय पहुँचीं। बाहर निकलते समय उनके हाथ में फाइल होने को लेकर एजेंसी ने सवाल उठाए, लेकिन मुख्यमंत्री ने इसे लेकर बेहद स्पष्ट रुख अपनाया।

उनका कहना था कि—

  • राजनीतिक दल की रणनीति, चुनावी योजना और उम्मीदवारों की सूची

  • किसी भी क़ानून के तहत अपराध नहीं

  • और न ही इन्हें PMLA जैसे कड़े क़ानूनों के अंतर्गत जब्त किया जा सकता है

ममता बनर्जी ने पूछा—

“अगर केंद्रीय एजेंसियां किसी विपक्षी दल के चुनावी दस्तावेज़ उठाने लगें, तो लोकतंत्र और निष्पक्ष राजनीति का क्या अर्थ बचेगा?”


ED का दावा और उस पर उठते तार्किक सवाल

ED ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री और उनके साथ मौजूद अधिकारियों ने जांच में बाधा डाली और “महत्वपूर्ण साक्ष्य” हटाए।
लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—

क्या किसी राजनीतिक रणनीति दस्तावेज़ को स्वतः ही ‘साक्ष्य’ कहा जा सकता है, जब तक उसका सीधा, प्रमाणित और न्यायालय-स्वीकृत संबंध किसी आर्थिक अपराध से न हो?

अब तक ED ने सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं किया है कि

  • कौन-सा दस्तावेज़

  • किस लेनदेन

  • और किस अवैध धन प्रवाह
    से जुड़ा था।

यही अस्पष्टता TMC के आरोपों को मजबूती देती है।


बिना स्थानीय पुलिस को सूचना: प्रक्रियागत चूक या जानबूझकर अनदेखी?

इस पूरे घटनाक्रम में एक बेहद अहम तथ्य यह भी है कि
स्थानीय पुलिस को पूर्व सूचना दिए बिना छापेमारी की गई

भारतीय संघीय ढांचे में

  • कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है

  • और किसी भी केंद्रीय कार्रवाई में स्थानीय प्रशासन का समन्वय संवैधानिक परंपरा मानी जाती है

इसी आधार पर

  • कोलकाता पुलिस ने ED के खिलाफ FIR दर्ज की

  • और दूसरी FIR प्रतीक जैन की पत्नी की शिकायत पर दर्ज हुई, जिसमें आरोप है कि व्यक्तिगत व संवेदनशील दस्तावेज़ बिना स्पष्ट पंचनामा के ले जाए गए

यह घटनाक्रम केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि प्रक्रियागत वैधता पर भी गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।


जांच या दबाव? समय और संदर्भ पर उठती उंगलियाँ

TMC नेताओं का कहना है कि

  • जब भी बंगाल में राजनीतिक गतिविधियाँ तेज़ होती हैं

  • या केंद्र के खिलाफ राज्य सरकार मुखर होती है

  • तब केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता अचानक बढ़ जाती है

I-PAC, जो एक राजनीतिक सलाहकार संस्था है और कई दलों के साथ काम कर चुकी है, को केवल TMC से जोड़कर देखना भी चयनात्मक दृष्टिकोण का संकेत देता है।


केंद्र–राज्य टकराव और संघीय व्यवस्था की कसौटी

ममता बनर्जी ने सीधे तौर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर आरोप लगाते हुए कहा कि

“बंगाल को डराने और झुकाने की कोशिश हो रही है, लेकिन यह राज्य दबाव की राजनीति स्वीकार नहीं करेगा।”

यह बयान केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संघीय संतुलन की रक्षा का दावा भी है।
संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि
अगर केंद्रीय एजेंसियां विपक्षी शासित राज्यों में राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ा डेटा जब्त करने लगें, तो यह संघीय ढांचे के लिए खतरनाक मिसाल बन सकता है।


विरोध, राजनीति और जनता की प्रतिक्रिया

ED की कार्रवाई के बाद

  • I-PAC कार्यालय के बाहर TMC समर्थकों की भारी भीड़ जुटी

  • नारेबाज़ी हुई

  • और इसे “लोकतंत्र पर हमला” बताया गया

TMC ने इसे केवल पार्टी का नहीं, बल्कि राज्य के आत्मसम्मान का मुद्दा करार दिया है।


विपक्ष के आरोप और उनका जवाब

भाजपा ने इसे “संवैधानिक जांच में हस्तक्षेप” बताया,
जबकि वामपंथी दलों ने इसे “भ्रष्टाचार से बचाव” कहा।

लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि
जब तक जांच एजेंसी ठोस, पारदर्शी और अदालत में टिकने योग्य साक्ष्य सामने नहीं रखती, तब तक इस कार्रवाई पर सवाल उठना स्वाभाविक है।


सबसे बड़ा सवाल:

क्या विपक्षी राजनीति अब जांच एजेंसियों की निगरानी में होगी?

I-PAC प्रकरण ने देश के सामने एक निर्णायक सवाल खड़ा कर दिया है—
क्या भारत में राजनीतिक असहमति और चुनावी रणनीति अब अपराध की श्रेणी में लाई जा रही है?

अगर ऐसा हुआ, तो यह केवल बंगाल नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी होगी।


निष्कर्ष

TMC का पक्ष केवल भावनात्मक या राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि

संवैधानिक अधिकारों
संघीय मर्यादाओं
और जांच एजेंसियों की निष्पक्षता

से जुड़ा ठोस प्रश्न उठाता है।

अब यह मामला कलकत्ता हाईकोर्ट में जाएगा, जहां तय होगा कि
जांच की वैध सीमा क्या है और राजनीति की स्वतंत्रता कहां से शुरू होती है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.

ADS3

ADS4