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रूस से तेल खरीद पर भारत पर 500% टैरिफ की तलवार

 8 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार    

ट्रंप समर्थित अमेरिकी प्रतिबंध विधेयक से वैश्विक ऊर्जा राजनीति में उबाल

रूस–यूक्रेन युद्ध को लगभग चार साल पूरे होने को हैं, लेकिन इस युद्ध की लपटें अब सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधों को झुलसाने लगी हैं। अमेरिका में पेश किया गया एक नया और बेहद कठोर प्रतिबंध विधेयक अब भारत समेत कई देशों के लिए गंभीर रणनीतिक चुनौती बनकर उभर रहा है।

रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम द्वारा पेश किए गए इस द्विदलीय विधेयक को पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मंजूरी मिल चुकी है। यदि यह कानून बनता है, तो रूस से तेल, गैस या यूरेनियम खरीदने वाले देशों पर अमेरिका 500 प्रतिशत तक का आयात शुल्क और सेकेंडरी सैंक्शन लगा सकता है।

यह प्रस्ताव केवल रूस के खिलाफ नहीं है, बल्कि उसके साथ व्यापार करने वाले देशों को भी सीधे निशाने पर लेने की घोषणा है।


क्या है यह Graham–Blumenthal Russia Sanctions Bill

इस विधेयक को रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने मिलकर तैयार किया है। इसका मूल उद्देश्य रूस की आर्थिक जीवनरेखा को काटना है, ताकि यूक्रेन के खिलाफ चल रही सैन्य कार्रवाई को वित्तीय रूप से असंभव बनाया जा सके।

प्रस्तावित कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार मिलेगा कि वे—

  • रूस से तेल, गैस या यूरेनियम खरीदने वाले देशों पर

  • 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगा सकें

  • सेकेंडरी सैंक्शन के जरिए उन देशों के बैंकों, कंपनियों और व्यापारिक संस्थाओं को अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से बाहर कर सकें

यह अमेरिका की अब तक की सबसे आक्रामक आर्थिक कूटनीति मानी जा रही है।


ट्रंप की ‘हरी झंडी’ और व्हाइट हाउस की पुष्टि

सीनेटर ग्राहम के अनुसार, बुधवार को व्हाइट हाउस में उनकी डोनाल्ड ट्रंप से सीधी मुलाकात हुई, जहां ट्रंप ने इस विधेयक को समर्थन देने का आश्वासन दिया। ग्राहम ने कहा कि ट्रंप ने इसे सही समय पर उठाया गया कदम बताया है।

व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने भी एसोसिएटेड प्रेस से बातचीत में इस समर्थन की पुष्टि की, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि यह केवल सीनेटर का व्यक्तिगत बयान नहीं, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर सोच-समझकर लिया गया निर्णय है।

ग्राहम का दावा है कि यूक्रेन शांति वार्ता के लिए कुछ समझौते करने को तैयार है, लेकिन रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन केवल बयानबाज़ी कर रहे हैं और ज़मीनी स्तर पर हमले जारी हैं।


भारत के लिए क्यों है यह मामला बेहद गंभीर

भारत इस विधेयक के संभावित सबसे बड़े प्रभावित देशों में शामिल है। रूस–यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से कच्चे तेल का आयात कई गुना बढ़ाया है। इसकी मुख्य वजह—

  • सस्ता रूसी कच्चा तेल

  • घरेलू ईंधन कीमतों पर नियंत्रण

  • ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता

भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि उसकी ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हितों पर आधारित है, न कि किसी भू-राजनीतिक दबाव पर।

लेकिन यदि अमेरिका वास्तव में 500 प्रतिशत टैरिफ जैसे कदम उठाता है, तो यह भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। इतना भारी शुल्क किसी भी निर्यातक देश के लिए व्यापार को लगभग असंभव बना देता है।


क्या यह भारत पर दबाव बनाने की रणनीति है

राजनयिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विधेयक केवल रूस को सज़ा देने के लिए नहीं, बल्कि भारत, चीन और ब्राज़ील जैसे देशों पर राजनीतिक दबाव बनाने का हथियार भी है।

अमेरिका यह संकेत देना चाहता है कि—

  • वैश्विक मंच पर तटस्थता अब स्वीकार्य नहीं

  • रूस के साथ व्यापार जारी रखना ‘युद्ध को ईंधन देना’ माना जाएगा

  • ऊर्जा सुरक्षा के नाम पर लिए गए फैसलों को भी राजनीतिक कसौटी पर कसा जाएगा

यह रुख भारत की स्वतंत्र विदेश नीति के लिए सीधी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।


क्या यह विधेयक वास्तव में कानून बन पाएगा

हालांकि इस बिल को सीनेट में दर्जनों सांसदों का समर्थन प्राप्त है और प्रतिनिधि सभा में भी इसका समानांतर प्रस्ताव मौजूद है, लेकिन इसकी राजनीतिक यात्रा आसान नहीं मानी जा रही।

अमेरिकी संसद के सामने फिलहाल—

  • सरकारी फंडिंग से जुड़ा अहम प्रस्ताव

  • मार्टिन लूथर किंग जूनियर दिवस के चलते सीनेट अवकाश

  • चुनावी वर्ष की राजनीतिक संवेदनशीलताएँ

जैसे मुद्दे मौजूद हैं। ऐसे में यह देखना अहम होगा कि यह विधेयक वास्तव में मतदान तक पहुंचता है या केवल कूटनीतिक दबाव बनाने का साधन बनकर रह जाता है।


शांति वार्ता और प्रतिबंधों की दोहरी चाल

दिलचस्प बात यह है कि एक ओर ट्रंप प्रशासन यूक्रेन युद्ध समाप्त करने के लिए शांति समझौते की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर इतना कठोर प्रतिबंध विधेयक लाया जा रहा है।

इस शांति प्रक्रिया में—

  • स्टीव विटकॉफ

  • जेरेड कुश्नर

को प्रमुख वार्ताकार की भूमिका सौंपी गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रतिबंध विधेयक रूस को बातचीत की मेज पर झुकाने की रणनीति भी हो सकता है।


वैश्विक ऊर्जा बाजार पर संभावित असर

यदि यह कानून लागू होता है, तो इसके प्रभाव केवल भारत या रूस तक सीमित नहीं रहेंगे—

  • वैश्विक तेल कीमतों में तेज़ उछाल

  • विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव

  • ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में अस्थिरता

  • बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था को झटका

दुनिया एक बार फिर ऊर्जा संकट और राजनीतिक ध्रुवीकरण के दौर में प्रवेश कर सकती है।


निष्कर्ष:-

 भारत के सामने कूटनीतिक अग्निपरीक्षा

यह प्रस्तावित अमेरिकी प्रतिबंध विधेयक भारत के लिए केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि उसकी रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा है। आने वाले हफ्तों में यह साफ हो जाएगा कि अमेरिका इस धमकी को वास्तविक नीति में बदलता है या इसे केवल दबाव की राजनीति तक सीमित रखता है।

एक बात तय है—
रूस–यूक्रेन युद्ध अब सिर्फ युद्ध नहीं रहा, यह वैश्विक सत्ता, ऊर्जा और प्रभुत्व की लड़ाई बन चुका है, जिसमें भारत जैसे देशों की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा निर्णायक हो गई है।

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