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तुर्कमान गेट कार्रवाई पर विवाद गहराया: मस्जिद का हिस्सा टूटने के आरोप, विरोध के बाद हालात बिगड़े

 नई दिल्ली | 7 जनवरी 2026  | पत्रकार कविता | शर्मा  | पत्रकार

तुर्कमान गेट इलाके में फ़ैज़ इलाही मस्जिद के पास अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई अब केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गई है, बल्कि पुलिस कार्रवाई की मंशा और व्यवहार को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जहां एक ओर पुलिस और नगर निगम दिल्ली (MCD) का कहना है कि कार्रवाई पूरी तरह दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के तहत हुई और मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया गया, वहीं स्थानीय लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों ने आरोप लगाया है कि कार्रवाई के दौरान मस्जिद के एक कोने को नुकसान पहुंचा, जिसके बाद इलाके में विरोध भड़क उठा।



स्थानीय लोगों का आरोप: पहले तोड़ा गया हिस्सा, फिर विरोध करने पर धमकाया गया

स्थानीय निवासियों और मस्जिद से जुड़े लोगों का दावा है कि देर रात जब एमसीडी और पुलिस की टीम मौके पर पहुंची, तब बुलडोजर और पुलिस बल की मौजूदगी में मस्जिद के बाहरी कोने को नुकसान पहुंचा। लोगों का कहना है कि यह हिस्सा 0.19 एकड़ सीमा को लेकर चल रहे विवाद से जुड़ा हुआ था, लेकिन कार्रवाई का तरीका अचानक और उकसाने वाला था।

स्थानीय लोगों के अनुसार,
“जब हमने विरोध किया और सवाल उठाए, तो पुलिस ने हमें हटने के लिए धमकाया। इसी से हालात और बिगड़ते चले गए।”

लोगों का कहना है कि विरोध शांतिपूर्ण था, लेकिन पुलिस के सख्त रवैये और दबाव के कारण माहौल तनावपूर्ण हो गया।

अतिक्रमण हटाओ अभियान से आगे की बहस: कानून, निष्पक्षता और नागरिक अधिकार

कुछ सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने इस कार्रवाई को लेकर एक व्यापक और गंभीर चिंता भी जताई है। उनका कहना है कि देश के विभिन्न हिस्सों में अतिक्रमण और अवैध निर्माण के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों में चयनात्मक रवैये की धारणा लगातार मजबूत हो रही है। आरोप लगाया जा रहा है कि बुलडोज़र कार्रवाई और अवैध निर्माण की पहचान का सिलसिला अधिकतर मुस्लिम आबादी वाले इलाकों, मस्जिदों और मुस्लिम नागरिकों के घरों तक सीमित दिखाई देता है, जबकि अन्य धर्मों से जुड़े कथित अवैध धार्मिक स्थलों, कॉलोनियों या प्रभावशाली अतिक्रमणों पर वैसी ही सख्ती शायद ही देखने को मिलती है। आलोचकों का कहना है कि यह असंतुलन कानून के समान अनुप्रयोग और संवैधानिक समानता के सिद्धांत पर सवाल खड़ा करता है, और यदि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो इससे सामाजिक अविश्वास और विभाजन और गहरा हो सकता है।


पुलिस का पक्ष: मस्जिद को नुकसान नहीं, कुछ शरारती तत्वों ने बढ़ाया तनाव

वहीं दिल्ली पुलिस और एमसीडी अधिकारियों ने इन आरोपों को खारिज किया है। अधिकारियों का कहना है कि

  • मस्जिद निर्धारित 0.19 एकड़ क्षेत्र के भीतर आती है

  • कार्रवाई केवल उस सीमा से बाहर बनी संरचनाओं पर की गई

  • मस्जिद को जानबूझकर या अनजाने में कोई क्षति नहीं पहुंचाई गई

संयुक्त पुलिस आयुक्त (सेंट्रल रेंज) के अनुसार,
“कुछ शरारती तत्वों ने कार्रवाई को बाधित करने के लिए पत्थरबाज़ी की, जिसके बाद स्थिति को नियंत्रित करने के लिए न्यूनतम बल प्रयोग करना पड़ा।”


विरोध कैसे हिंसा में बदला

पुलिस के मुताबिक, जैसे ही विरोध तेज़ हुआ, करीब 100 से 150 लोग मौके पर इकट्ठा हो गए। इसी दौरान पत्थरबाज़ी हुई, जिसमें पांच पुलिसकर्मी घायल हो गए। पुलिस का कहना है कि हालात बिगड़ने के बाद कार्रवाई अस्थायी रूप से रोकी गई और इलाके में अतिरिक्त बल तैनात किया गया।


कानूनी पृष्ठभूमि: हाईकोर्ट का आदेश और लंबित याचिका

यह पूरी कार्रवाई दिल्ली हाईकोर्ट के 12 नवंबर के आदेश से जुड़ी है, जिसमें तुर्कमान गेट और रामलीला मैदान क्षेत्र में करीब 38,940 वर्ग फुट अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया गया था।
हालांकि, मस्जिद प्रबंधन समिति ने 22 दिसंबर के एमसीडी आदेश को चुनौती देते हुए याचिका दायर की है, जिस पर हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि मामला “विचार योग्य” है। इससे यह साफ है कि कानूनी प्रक्रिया अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है


जांच की मांग और सवाल

स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि

  • मस्जिद को हुए कथित नुकसान की निष्पक्ष जांच हो

  • सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक किए जाएं

  • पुलिस और प्रशासन की भूमिका की स्वतंत्र समीक्षा की जाए

वहीं प्रशासन का कहना है कि स्थिति फिलहाल नियंत्रण में है और मामले की जांच जारी है।


निष्कर्ष:-

तुर्कमान गेट की घटना अब केवल अतिक्रमण हटाने का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रशासनिक संवेदनशीलता, धार्मिक विश्वास और कानून के क्रियान्वयन के तरीकों पर एक बड़ा सवाल बन चुकी है। जब तक आरोपों और जवाबों की निष्पक्ष जांच नहीं होती, तब तक इस विवाद पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाज़ी होगी।

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