25 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
नई दिल्ली और ब्रुसेल्स के बीच लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर बड़ी सफलता के संकेत मिल रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, भारत सरकार ने यूरोपीय संघ (EU) से आयात होने वाली कारों पर लगने वाले भारी शुल्क को 110 प्रतिशत तक से घटाकर सीधे 40 प्रतिशत करने पर सहमति जता दी है। यह फैसला न केवल भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर में दशकों से चली आ रही संरक्षणवादी नीति में बड़ा बदलाव दर्शाता है, बल्कि वैश्विक निवेशकों के लिए भी एक मजबूत संदेश देता है कि भारत अब नियंत्रित लेकिन निर्णायक उदारीकरण की राह पर है।
सीमित संख्या में कारों पर तुरंत लागू होगा नया टैक्स स्ट्रक्चर
सूत्रों के मुताबिक, यह टैक्स कटौती शुरुआत में यूरोपीय संघ के 27 देशों से आने वाली उन कारों पर लागू होगी जिनकी आयात कीमत 15,000 यूरो (लगभग 17,700 डॉलर) से अधिक है। शुरुआती चरण में सीमित संख्या में वाहनों को इस रियायत का लाभ मिलेगा, जबकि समय के साथ यह शुल्क और घटकर 10 प्रतिशत तक लाया जा सकता है। यह प्रावधान यूरोपीय कार निर्माताओं को भारतीय बाजार में अपने प्रीमियम और मिड-सेगमेंट मॉडलों की टेस्टिंग का अवसर देगा।
‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहलाने वाला समझौता क्यों है अहम
भारत-EU व्यापार समझौते को नीति-निर्माता “मदर ऑफ ऑल डील्स” कह रहे हैं। इसका कारण केवल कारों पर शुल्क में कटौती नहीं, बल्कि इसका व्यापक आर्थिक दायरा है। इस समझौते से भारत के वस्त्र, जेम्स एंड ज्वेलरी और अन्य निर्यात-आधारित उद्योगों को बड़ा सहारा मिल सकता है, खासकर ऐसे समय में जब अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों को ऊंचे टैरिफ का सामना करना पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत की वैश्विक सप्लाई चेन में भूमिका को और मज़बूत करेगा और यूरोपीय कंपनियों को चीन पर निर्भरता कम करने का व्यावहारिक विकल्प देगा।
घरेलू ऑटो उद्योग की सुरक्षा के लिए EV सेक्टर को बाहर रखा गया
हालांकि यह उदारीकरण व्यापक है, लेकिन सरकार ने इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के मामले में सावधानी बरती है। बैटरी इलेक्ट्रिक वाहनों को अगले पांच वर्षों तक इस आयात शुल्क कटौती से बाहर रखा जाएगा। इसका मकसद घरेलू कंपनियों—जैसे टाटा मोटर्स और महिंद्रा एंड महिंद्रा—द्वारा किए गए भारी निवेश को सुरक्षा देना है। पांच साल बाद EV सेक्टर में भी समान तरह की टैक्स कटौती लागू किए जाने की संभावना है।
यूरोपीय कार कंपनियों को मिलेगा बड़ा अवसर
कम आयात शुल्क से वोक्सवैगन, मर्सिडीज-बेंज, बीएमडब्ल्यू, रेनो और स्टेलैंटिस जैसी यूरोपीय कंपनियों को सीधा फायदा मिलेगा। ये कंपनियां भारत में पहले से मौजूद हैं, लेकिन ऊंचे आयात शुल्क के कारण इनकी बाजार हिस्सेदारी सीमित रही है। फिलहाल यूरोपीय ब्रांड्स की हिस्सेदारी भारत के 44 लाख यूनिट सालाना कार बाजार में चार प्रतिशत से भी कम है।
विश्लेषकों के अनुसार, सस्ते आयात से कंपनियां भारतीय ग्राहकों के रुझान को बेहतर ढंग से समझ सकेंगी और उसके बाद स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग में बड़े निवेश का फैसला ले पाएंगी।
2030 तक 6 मिलियन यूनिट का बाजार और बढ़ती प्रतिस्पर्धा
भारत का कार बाजार 2030 तक 60 लाख यूनिट सालाना तक पहुंचने का अनुमान है। इस समय बाजार पर मारुति सुज़ुकी, टाटा मोटर्स और महिंद्रा जैसी घरेलू व जापानी कंपनियों का दबदबा है। लेकिन आयात शुल्क में कटौती से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, जिससे उपभोक्ताओं को बेहतर तकनीक, ज़्यादा विकल्प और संभावित रूप से किफायती कीमतें मिल सकती हैं।
रणनीतिक संकेत: व्यापार से आगे की राजनीति
यह फैसला केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। ऐसे समय में जब वैश्विक व्यापार ध्रुवीकरण का शिकार है, भारत-EU समझौता यह दिखाता है कि भारत संतुलित वैश्वीकरण की नीति अपना रहा है—जहां घरेलू उद्योग की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी, दोनों को साथ लेकर चला जा सके।
कुल मिलाकर, आयातित कारों पर टैरिफ में प्रस्तावित कटौती भारत की व्यापार नीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है। यदि यह समझौता तय समय पर लागू होता है, तो आने वाले वर्षों में भारतीय ऑटो सेक्टर की तस्वीर मौजूदा स्थिति से काफी अलग नज़र आ सकती है—ज़्यादा प्रतिस्पर्धी, ज़्यादा तकनीकी और कहीं अधिक वैश्विक।
