नई दिल्ली | 19 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार
मेरिकी थिंक टैंक की रिपोर्ट का दावा—2023 के मुक़ाबले 97 फ़ीसदी वृद्धि, अल्पसंख्यक समुदाय सबसे ज़्यादा निशाने पर
भारत में नफ़रती भाषण (Hate Speech) की घटनाओं में बीते दो वर्षों के दौरान चिंताजनक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी स्थित एक गैर-सरकारी और गैर-लाभकारी थिंक टैंक ‘सेंटर फ़ॉर स्टडी ऑफ़ ऑर्गेनाइज़्ड हेट’ (CSOH) की ताज़ा रिपोर्ट ने इस प्रवृत्ति को गंभीर सामाजिक और लोकतांत्रिक चुनौती के रूप में रेखांकित किया है।
‘रिपोर्ट 2025: हेट स्पीच इवेंट्स इन इंडिया’ नामक इस अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत में कुल 1,318 प्रत्यक्ष नफ़रती भाषण दर्ज किए गए। यह आंकड़ा न केवल 2024 की तुलना में 13 फ़ीसदी अधिक है, बल्कि 2023 के मुक़ाबले इसमें 97 फ़ीसदी की चौंकाने वाली बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
किन समुदायों को बनाया गया निशाना?
रिपोर्ट के सबसे गंभीर निष्कर्षों में से एक यह है कि दर्ज किए गए कुल मामलों में से 98 फ़ीसदी भाषण मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यक समुदायों के ख़िलाफ़ थे।
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मुस्लिम समुदाय को सीधे तौर पर 1,156 मामलों में निशाना बनाया गया
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ईसाई समुदाय के ख़िलाफ़ 162 घटनाएं दर्ज हुईं, जो पिछले वर्ष की तुलना में 41 फ़ीसदी अधिक हैं
विशेषज्ञों का मानना है कि यह आँकड़े न केवल धार्मिक ध्रुवीकरण को दर्शाते हैं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और संवैधानिक मूल्यों के लिए भी गंभीर चेतावनी हैं।
राज्यवार तस्वीर: उत्तर प्रदेश शीर्ष पर
रिपोर्ट के अनुसार, नफ़रती भाषणों के सबसे अधिक मामले जिन राज्यों में दर्ज हुए, वे इस प्रकार हैं:
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उत्तर प्रदेश – 266 घटनाएं
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महाराष्ट्र – 193
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मध्य प्रदेश – 172
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उत्तराखंड – 155
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दिल्ली – 76
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुल घटनाओं में से 88 फ़ीसदी मामले भाजपा शासित राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में सामने आए, जबकि विपक्ष शासित सात राज्यों में कुल 154 घटनाएं दर्ज हुईं, जो 2024 के मुक़ाबले 34 फ़ीसदी कम हैं।
राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ
CSOH से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता और विश्लेषक हर्ष मंदर का कहना है कि नफ़रती भाषणों की यह प्रवृत्ति अचानक नहीं उभरी, बल्कि इसका सिलसिला 2014 के बाद से लगातार तेज़ हुआ है।
उनके अनुसार,
“2024 के आम चुनावों के दौरान जिस तरह शीर्ष राजनीतिक स्तर से मर्यादाएं तोड़ी गईं, उसने नफ़रती भाषणों के लिए एक तरह से वैधता का रास्ता खोल दिया। इसके बाद यह प्रवाह ऐसे बढ़ा जैसे बांध का फाटक खुल गया हो।”
हर्ष मंदर यह भी बताते हैं कि पहले जहाँ ईसाई समुदाय अपेक्षाकृत कम निशाने पर रहता था, अब मुसलमानों के साथ-साथ ईसाइयों के ख़िलाफ़ भी नफ़रती बयानबाज़ी में तेज़ उछाल देखा जा रहा है।
‘लव जिहाद’ से ‘वोट जिहाद’ तक: भाषा का खतरनाक प्रयोग
रिपोर्ट में दर्ज 656 भाषणों में ऐसे शब्दों और अवधारणाओं का प्रयोग हुआ जिनमें
‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’, ‘थूक जिहाद’, ‘शिक्षा जिहाद’ और ‘वोट जिहाद’ जैसे शब्द शामिल हैं।
इसके अलावा:
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308 भाषणों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हिंसा के लिए आह्वान किया गया
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136 मामलों में हथियार उठाने की बात कही गई
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276 भाषणों में धार्मिक स्थलों को तोड़ने या नष्ट करने की मांग की गई, विशेष रूप से ज्ञानवापी और शाही ईदगाह जैसे स्थानों के संदर्भ में
विश्लेषकों के अनुसार, यह भाषा न केवल नफ़रत को सामान्य बनाती है, बल्कि भीड़ हिंसा और सामाजिक टकराव की ज़मीन भी तैयार करती है।
सोशल मीडिया: नफ़रत के प्रसार का सबसे बड़ा माध्यम
रिपोर्ट में सोशल मीडिया की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
कुल 1,378 नफ़रती भाषणों में से 1,278 के वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड या लाइव किए गए।
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फ़ेसबुक – 942 वीडियो
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यूट्यूब – 246
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इंस्टाग्राम – 67
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एक्स (पूर्व ट्विटर) – 23
CSOH का कहना है कि भले ही सोशल मीडिया कंपनियां अपनी नीतियों में नफ़रती सामग्री के ख़िलाफ़ सख़्ती का दावा करती हों, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर ऐसी सामग्री से उन्हें व्यूज़ और एंगेजमेंट का लाभ मिलता है, जिससे जवाबदेही का सवाल और गहरा हो जाता है।
प्रमुख नाम और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
रिपोर्ट के अनुसार,
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उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी 71 नफ़रती भाषणों के साथ सूची में सबसे ऊपर हैं
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उनके बाद प्रवीण तोगड़िया (46) और अश्विनी उपाध्याय (35) हैं
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योगी आदित्यनाथ 22 भाषणों के साथ नौवें और
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यति नरसिंहानंद सरस्वती 20 भाषणों के साथ दसवें स्थान पर हैं
वहीं, भाजपा ने इस रिपोर्ट को सिरे से ख़ारिज करते हुए इसे “विदेशी एजेंसियों द्वारा भारत की छवि धूमिल करने की कोशिश” बताया है। उत्तराखंड से राज्यसभा सांसद और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का कहना है कि ऐसी रिपोर्टों को देश का जनमानस गंभीरता से नहीं लेता।
क़ानून और जवाबदेही की ज़रूरत
कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि नफ़रती भाषणों पर रोक केवल बयानबाज़ी से नहीं, बल्कि सख़्त क़ानूनी कार्रवाई, पुलिस-प्रशासन की जवाबदेही और सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर स्पष्ट नियमन से ही संभव है।
CSOH की रिपोर्ट इस निष्कर्ष के साथ समाप्त होती है कि यदि लोकतांत्रिक समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नफ़रत के बीच की रेखा को स्पष्ट नहीं किया गया, तो इसका सीधा असर सामाजिक शांति, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और संवैधानिक मूल्यों पर पड़ेगा।
