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बरेली की घटना, लोकतंत्र की कसौटी पर आस्था: एक देश, दो नियम और टूटता नागरिक भरोसा

  19 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार 

क्या भारत में आस्था अब समान अधिकार नहीं रही?

भारत स्वयं को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है, जहाँ संविधान प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत गरिमा और समानता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 25 नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। इसके बावजूद हाल के वर्षों में सामने आ रही घटनाएँ यह प्रश्न खड़ा कर रही हैं कि क्या यह स्वतंत्रता व्यवहार में भी उतनी ही मजबूत है, या फिर यह केवल संवैधानिक दस्तावेज़ों तक सिमट कर रह गई है।

Symbolic Image 

बरेली की घटना और उठते संवैधानिक सवाल

उत्तर प्रदेश के बरेली में हाल ही में सामने आई घटना ने इस बहस को और तीखा कर दिया है। निजी या खाली मकान में नमाज़ अदा करने पर कुछ मुस्लिम नागरिकों को हिरासत में लिया गया, जिसे प्रशासन ने कानून-व्यवस्था से जुड़ी एहतियाती कार्रवाई बताया। लेकिन यह घटना केवल स्थानीय प्रशासनिक निर्णय नहीं रही, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता के दोहरे मानदंड की मिसाल बनकर उभरी।


एक ही देश, दो अलग-अलग प्रशासनिक दृष्टिकोण

यदि भारत के सामाजिक और प्रशासनिक परिदृश्य को व्यापक रूप से देखा जाए, तो एक स्पष्ट असंतुलन नज़र आता है। देश के कई हिस्सों में माता की चौकी, भजन-जागरण, कांवड़ यात्रा, होली, दीवाली, गणेश विसर्जन और नवरात्रि जैसे धार्मिक आयोजन खुलेआम सड़कों पर आयोजित होते हैं। इन आयोजनों के दौरान घंटों नहीं, बल्कि कई-कई दिनों तक सड़कें बंद रहती हैं और यातायात पूरी तरह प्रभावित हो जाता है।


धार्मिक आयोजनों से प्रभावित होता आम जनजीवन

इन आयोजनों के कारण अस्पतालों तक पहुंच, स्कूलों की आवाजाही और दफ्तरों की नियमित गतिविधियाँ बाधित होती हैं। लाउडस्पीकरों पर रात-दिन तेज़ ध्वनि में भजन और धार्मिक घोषणाएँ गूंजती रहती हैं, जिससे बुज़ुर्गों, मरीजों और विद्यार्थियों को परेशानी होती है। इसके बावजूद इन्हें “परंपरा”, “आस्था” और “सांस्कृतिक उत्सव” कहकर प्रशासनिक संरक्षण मिलता दिखाई देता है।


अनुमति की प्रक्रिया और प्रशासन की भूमिका

ऐसे आयोजनों के लिए अनुमति की प्रक्रिया या तो बेहद लचीली होती है या फिर सार्वजनिक चर्चा का विषय ही नहीं बनती। शांति भंग की आशंका के बावजूद पुलिस की भूमिका नियंत्रक की बजाय सहयोगी और प्रबंधक की रहती है। कानून-व्यवस्था के नाम पर सख्ती के बजाय, सुविधा और समन्वय को प्राथमिकता दी जाती है।


निजी इबादत पर संदेह और कार्रवाई

इसके विपरीत, जब कोई मुस्लिम समूह बिना सड़क रोके, बिना लाउडस्पीकर और बिना किसी सार्वजनिक अवरोध के अपने ही घर या खाली निजी परिसर में नमाज़ अदा करता है, तो वही गतिविधि संदेह के घेरे में आ जाती है। इसे “कानून-व्यवस्था का खतरा”, “अवैध धार्मिक गतिविधि” या “शांति भंग की आशंका” बताकर कार्रवाई का आधार बना लिया जाता है।


सवाल अनुमति का नहीं, नीयत और दृष्टिकोण का

यहाँ मूल प्रश्न केवल अनुमति का नहीं, बल्कि प्रशासनिक नीयत और दृष्टिकोण का है। यदि समस्या वास्तव में अनुमति की होती, तो क्या वही सख्ती सड़क पर हो रहे हर धार्मिक आयोजन पर भी समान रूप से लागू होती? क्या कानून का पैमाना सभी धार्मिक गतिविधियों के लिए एक जैसा है?


अनुच्छेद 25 और व्यवहारिक वास्तविकता

भारतीय संविधान धार्मिक स्वतंत्रता को सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य की शर्तों से जोड़ता है। लेकिन बरेली की घटना में न तो सड़क जाम थी, न हिंसा, न सार्वजनिक शोर और न ही किसी अन्य समुदाय के अधिकारों का उल्लंघन। इसके बावजूद हिरासत और चालान यह संकेत देते हैं कि धार्मिक स्वतंत्रता अब समान नहीं, बल्कि सशर्त और चयनात्मक होती जा रही है।


‘एहतियात’ बनाम निष्पक्षता

अक्सर ऐसी कार्रवाइयों को “एहतियाती कदम” कहकर जायज़ ठहराया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि एहतियात हमेशा एक ही समुदाय के लिए क्यों दिखाई देता है। यदि शांति भंग की आशंका का सिद्धांत सही है, तो उसका समान रूप से प्रयोग क्यों नहीं किया जाता?


न्याय व्यवस्था की साख पर पड़ता प्रभाव

इस पूरे परिदृश्य में सबसे गंभीर चिंता न्याय व्यवस्था की साख को लेकर है। जब कानून एक वर्ग के लिए लचीला और दूसरे के लिए कठोर नज़र आता है, तो नागरिकों का न्याय पर भरोसा कमजोर पड़ता है। यह स्थिति केवल अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरा बन जाती है।


समाज पर दीर्घकालिक असर

ऐसी घटनाएँ समाज में डर, आत्म-सेंसरशिप और अलगाव को जन्म देती हैं। लोग इबादत या धार्मिक आचरण से पहले यह सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि कहीं उनकी आस्था अपराध न मान ली जाए। किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज के लिए यह एक खतरनाक संकेत है।


निष्कर्ष:-

 आस्था नहीं, नागरिक अधिकारों की परीक्षा

यह बहस नमाज़ बनाम भजन या मस्जिद बनाम मंदिर की नहीं है। यह सवाल नागरिक अधिकारों और संवैधानिक समानता का है। यदि धार्मिक स्वतंत्रता केवल बहुसंख्यक उत्सवों तक सीमित रह जाए और अल्पसंख्यक इबादत पर संदेह किया जाए, तो यह संविधान की आत्मा के साथ विश्वासघात होगा।

बरेली की घटना चेतावनी देती है कि यदि आज किसी को अपने घर में नमाज़ पढ़ने के लिए अनुमति का मोहताज बनाया जा सकता है, तो कल किसी और की पूजा भी इसी शर्त पर निर्भर हो सकती है। धर्म तभी सुरक्षित रहता है जब कानून निष्पक्ष हो, और लोकतंत्र तभी जीवित रहता है जब अधिकार सभी के लिए समान हों।

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