5 दिसंबर 2025 |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार
खुलासा (लीड)
केंद्र सरकार ने वक्फ संपत्तियों की डिजिटल पंजीकरण प्रक्रिया के लिए लॉन्च किया हुआ UMEED (Unified Waqf Management, Empowerment, Efficiency and Development) पोर्टल पिछले कई दिनों से बार-बार स्लो चल रहा है, बार-बार क्रैश हो रहा है और कई इलाकों में पूरा-पूरी तरह डाउन भी दिखा — जिससे वक्फ बोर्डों, मुतविली और स्थानीय समुदायों में भारी असमंजस, घबराहट और आरोप-प्रत्यारोप की स्थिति बन गई है। समुदाय के कई प्रतिनिधि और स्थानीय अख़बारों की रिपोर्टों में यह कहा जा रहा है कि पोर्टल “लगातार घंटों के लिए बंद” रहता है — कुछ जगहों पर लोग दावा कर रहे हैं कि साइट दिन में कई बार घंटों के लिए उपलब्ध ही नहीं रहती, जिसका नतीजा यह हो रहा है कि 5 दिसंबर 2025 की सुप्रीम-कोर्ट/केंद्र निर्धारित डेडलाइन से पहले लाखों रेकॉर्ड समय पर अपलोड नहीं हो पा रहे।
UMEED पोर्टल को केंद्रीय अल्पसंख्यक मामले मंत्रालय ने जून 2025 में लॉन्च किया था — उद्देश्य था देशभर की वक्फ संपत्तियों का केंद्रीकृत, पारदर्शी और मॉनिटर करने योग्य रजिस्ट्रेशन ताकि इलाकेवार, बोर्डवार और सार्वजनिक स्तर पर वक्फ संपत्तियों की जानकारी उपलब्ध रहे और दुरुपयोग रोका जा सके। पोर्टल को लेकर सरकार ने आवश्यक वैधानिक निर्देश और समय-सीमा भी जारी की — और हाल में सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ रजिस्ट्रेशन संबंधी कुछ याचिकाओं पर सुनवाई के बाद डेडलाइन आगे नहीं बढ़ाने का निर्देश दिया है (अभियोगियों को ट्रिब्यूनल का रास्ता अपनाने को कहा गया)
क्या समस्याएँ रिपोर्ट हुईं — तथ्य और स्रोत
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बार-बार क्रैश और सर्वर डाउन: कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया तथा वक्फ निकायों ने बताया कि पोर्टल बार-बार स्लो हो रहा है, "फ्रीज़" हो जा रहा है या पूरी तरह बंद हो जाता है — पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और राजस्थान के वक्फ अधिकारियों ने तकनीकी गड़बड़ियाँ रिपोर्ट की हैं।
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समुदाय और बोर्डों की शिकायतें: AIMPLB, कुछ राज्य वक्फ बोर्ड और मुतावल्ली यह कह रहे हैं कि पोर्टल की तकनीकी खामियां, दस्तावेज़ों का डिजिटल न मिलना और कम समय के कारण अपलोड करना कठिन हो गया है; AIMPLB ने इस पर विस्तार की मांग और मंत्री स्तर पर शिकायत की है।
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सुप्रीम कोर्ट का फैसला (डेडलाइन न बढ़ेगा): सुप्रीम कोर्ट ने डेडलाइन बढ़ाने की अर्जी खारिज कर दी; कोर्ट ने कहा कि अगर किसी को विस्तार चाहिए तो वह वक्फ ट्रिब्यूनल के पास जाए। इस फैसले के बाद अंतिम दिनों में अपलोड के लिए बड़ा दबाव आया।
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स्थानीय मीडिया व सोशल मीडिया का चित्र: क्षेत्रीय अख़बार, लो-प्रोफ़ाइल रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया क्लिप्स में ये आरोप/नाराज़गी बार-बार उठी कि सामान्यतः मामूली या कम-ट्रैफ़िक वाली सरकारी पोर्टल्स भी रोज़-चार बार घंटों के लिये बंद न रहते हों, पर UMEED को लेकर लगातार ‘डाउन-टाइम’ की बात हो रही है — और इसलिए समुदाय में शंका पैदा हो रही है।
समुदाय की आशंका — क्या यह सिर्फ तकनीकी विफलता है या कुछ और?
कई मुतविल्ली और समुदाय नेताओं की ज़ुबानी यह शक जाहिर हो रहा है कि यह सिर्फ़ तकनीकी अपर्याप्तता नहीं है, बल्कि रुकावटें धार्मिक-समुदाय की संपत्तियों की रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को बाधित करने के उद्देश्य से व्यवस्थित तौर पर पैदा की जा रही हैं — खासकर जब कि डेडलाइन नज़दीक हो और सुप्रीम कोर्ट ने विस्तार नहीं दिया हो। हालांकि, इससे जुड़ा कोई सीधा सबूत (जैसे सर्वर लॉग, नेटवर्क अटैक्स की पुष्टि, तृतीय-पक्ष ऑडिट रिपोर्ट) सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए निष्कर्ष निकला जा सकता है कि फिलहाल इस तरह के आरोप अनुमान/शंका हैं — जिन्हें सत्यापित करने के लिए तकनीकी और प्रशासनिक जांच आवश्यक है। (अर्थात् आरोपों को रिपोर्ट करना ठीक है, पर इन्हें 'सत्य' मानकर प्रकाशित करना देनदारता और पत्रकारिता के मानकों के विरुद्ध होगा जब तक ठोस सबूत न मिलें।)
टाइमलाइन (संक्षेप में, प्रमाणों के साथ)
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6 जून 2025: UMEED पोर्टल का औपचारिक शुभारंभ (सरकारी पीआईबी नोट)।अक्टूबर–नवंबर 2025: राज्यों में रजिस्ट्रेशन मुहिम शुरू; कई बोर्डों ने धीमी प्रगति की रिपोर्ट की।
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अंतिम सप्ताह नवम्बर–दिसम्बर 2025: पोर्टल पर लगातार तकनीकी गड़बड़ियाँ आने की रिपोर्टें बढ़ीं; मीडिया और वक्फ बोर्डों ने शिकायत दर्ज करवाई।
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1 दिसंबर 2025: सुप्रीम कोर्ट ने डेडलाइन बढ़ाने की मांग खारिज की — इस फैसले के बाद अंतिम दिनों में अत्यधिक ट्रैफिक और अपलोड-दबाव देखा गया।
संभावित तकनीकी और प्रबंधन कारण (जाँच-योग्य अनुमान)
इन रिपोर्टों और तर्कों के आधार पर नीचे कारणों का विश्लेषण दिया जा रहा है — यह अनुमान हैं, पुष्टि के लिए टेक्निकल ऑडिट आवश्यक:
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इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी (scale-capacity): पोर्टल पर अचानक बढ़े हुए concurrent यूज़र-लोड को सर्वर-क्लस्टर/कॉन्टेंट-डिलिवरी सेटअप ने संभाला नहीं होगा — जिससे बार-बार क्रैश और स्लोडाउन आया।
पीक-टाइम में बैच अपलोड और गलत रेट-लिमिटिंग नीति: जब सभी बोर्ड डेडलाइन के पास एक साथ अपलोड कर रहे हों, और यदि बैक-एंड में मजबूत queueing/async processing न हो तो सिस्टम असफल हो सकता है।
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फ़्रंट-एंड/यूआई के कारण रिट्राय-लूप: अपलोड प्रक्रिया में यदि फाइल-हैंडलिंग ठीक नहीं और बार-बार रिट्राय हो तो सर्वर पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। (तकनीकी टीम को लॉग्स देखना चाहिए।)
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डिजिटल साक्षरता और दस्तावेज़ तैयारी की कमी: कई मुतावल्ली पुराने रिकॉर्ड ढूँढने में अक्षम; यही भी बॉटल-नेक हुआ — समय पर सही फ़ॉर्मेट में अपलोड न कर पाने से बार-बार हेल्पडेस्क पर दबाव पड़ा।
क्या सार्वजनिक तौर पर कही गई शंकाएँ जाँच योग्य हैं?
हाँ। यदि समुदाय का आरोप है कि पोर्टल "जान-बूझकर" बार-बार बंद कराया जा रहा है, तो सत्यापित करने योग्य प्रश्न होंगे:
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क्या सर्वर-लॉग में किसी प्रकार के बाहरी DDoS या अटैक के संकेत हैं?
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क्या वेबसाइट की होस्टिंग और CDN प्रदाता ने अपटाइम/डाउनटाइम के रिकॉर्ड साझा किए हैं?
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क्या पोर्टल के निर्माताओं और केंद्रीय मंत्रालय ने लास्ट-मील सपोर्ट/स्केलिंग प्लान लागू किया था?
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क्या पोर्टल पर किन्हीं क्षेत्रों से असामान्य पैटर्न (भौगोलिक/आईपी-ब्लॉक्स) से ट्रैफ़िक आया?
इनका आधिकारिक जवाब मांगा जाना चाहिए — और अगर सरकार सार्वजनिक लॉग/ऑडिट उपलब्ध कराए तो शक का निवारण होगा या दोष स्पष्ट होगा। वर्तमान में मीडिया रिपोर्ट्स और समुदाय की शिकायतें बड़ी-सख्त हैं, पर किसी साजिश के ठोस सबूत सार्वजनिक रूप से नहीं दिखते। इसलिए स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट की तत्काल आवश्यकता है।
समुदाय की विनती और राजनैतिक ज़िम्मेदारी
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AIMPLB और कई मुतावल्ली ने समय सीमा बढ़ाने और तकनीकी त्रुटियों की जाँच की मांग की है; कुछ राज्यों के मंत्री और प्रतिनिधि भी केंद्र से बढ़ोतरी के लिए लिख चुके हैं।
दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने डेडलाइन न बढ़ाने का आदेश दे दिया है, पर ट्रिब्यूनल के माध्यम से छूट का रास्ता खुला रखा है — यह व्यावहारिक रूप से हजारों मामलों के निपटान की चुनौती भी खड़ी करता है।
क्या सरकारी कार्यालय/मंत्रालय ने कुछ कहा है?
सरकारी उद्घोषों (PIB रिलीज) में UMEED के उद्घाटन और उसके सकारात्मक उद्देश्यों का हवाला मिलता है; पर तकनीकी दिक्कतों और बार-बार डाउनटाइम पर मंत्रालय की विस्तृत सार्वजनिक तकनीकी रिपोर्ट अभी उपलब्ध नहीं दिखाई दी। स्थानीय प्रशासन और कुछ राज्य बोर्डों ने सहायता के लिए राज्य-स्तरीय कदमों की बात कही है।
निष्कर्ष:-
क्या कहा जाना चाहिए और क्या माँगा जाना चाहिए
हाथ से प्रमाण के साथ रिपोर्टिंग जरूरी: मीडिया और समुदाय सही कर रहे हैं कि वे पोर्टल-डाउन और उसकी वजह से होने वाली हर्जाने/ख़तरे को प्रमुखता से उठाएँ — पर 'सरकारी साजिश' जैसे गंभीर आरोपों को तब तक निर्णायक तौर पर न लिखा जाए जब तक तकनीकी ऑडिट या विशिष्ट प्रमाण (सर्वर-लॉग, होस्ट-रिपोर्ट, नेटवर्क-अटैक रिपोर्ट) सार्वजनिक न हों।
मांगें जो जायज़ और आवश्यक हैं:
