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अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान

नई दिल्ली। 28 दिसम्बर 2025 | ✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार   

भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक अरावली पहाड़ियों की परिभाषा में हालिया बदलाव को लेकर उठे गहरे पर्यावरणीय और कानूनी सवालों पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognisance) लिया है। यह मामला इसलिए अत्यंत संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि विशेषज्ञों और पर्यावरण संगठनों का मानना है कि परिभाषा में किया गया यह परिवर्तन अनियंत्रित खनन, निर्माण गतिविधियों और व्यापक पारिस्थितिक क्षति का रास्ता खोल सकता है।

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29 दिसंबर को होगी सुनवाई, वेकेशन बेंच करेगी विचार

इस अहम मामले पर मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जे.के. महेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की वेकेशन बेंच सोमवार, 29 दिसंबर को सुनवाई करेगी। अदालत का यह हस्तक्षेप ऐसे समय में सामने आया है जब देश के कई हिस्सों में नागरिक समाज, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय समुदायों द्वारा तीव्र विरोध और प्रदर्शन किए जा रहे हैं।

अरावली: सिर्फ पहाड़ नहीं, भारत की पर्यावरणीय ढाल

अरावली पर्वतमाला को केवल एक भूगोलिक संरचना मानना बड़ी भूल होगी। यह क्षेत्र:

  • मरुस्थलीकरण को रोकने में अहम भूमिका निभाता है

  • भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) का प्रमुख स्रोत है

  • दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर भारत के बड़े हिस्से के लिए प्राकृतिक जलवायु संतुलन बनाए रखता है

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि अरावली क्षेत्र में खनन और निर्माण को खुली छूट दी गई, तो इसके परिणाम दीर्घकालिक और अपूरणीय हो सकते हैं।

नई परिभाषा पर क्यों उठा विवाद?

हाल ही में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) द्वारा गठित समिति की सिफारिशों के आधार पर अरावली पहाड़ियों की एक “ऑपरेशनल डेफिनिशन” स्वीकार की गई। नवंबर 2025 में दिए गए फैसले में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने इस परिभाषा को खनन के संदर्भ में मान्यता दी।

नई परिभाषा के प्रमुख बिंदु:

  • “अरावली हिल्स”: ऐसे भू-आकृतिक क्षेत्र, जिनकी स्थानीय ऊँचाई कम से कम 100 मीटर हो और जो अधिसूचित जिलों में स्थित हों

  • “अरावली रेंज”: जब दो या अधिक ऐसी पहाड़ियाँ 500 मीटर की दूरी के भीतर स्थित हों

पर्यावरणविदों का तर्क है कि इस परिभाषा से कई पारंपरिक और संवेदनशील क्षेत्र संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकते हैं।

राज्यों में अलग-अलग परिभाषा, अवैध खनन की बड़ी वजह

दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में अरावली की अलग-अलग परिभाषाओं के चलते वर्षों से:

  • नियामक भ्रम (Regulatory Gaps)

  • अवैध खनन

  • और पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन

होता रहा है। इसी समस्या के समाधान के लिए पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था।

सस्टेनेबल माइनिंग प्लान अनिवार्य

यह भी उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही निर्देश दे चुका है कि अरावली जैसे पर्यावरणीय रूप से नाजुक क्षेत्र में किसी भी नई खनन गतिविधि से पहले:

“सस्टेनेबल माइनिंग के लिए व्यापक प्रबंधन योजना (Management Plan for Sustainable Mining – MPSM)”
तैयार करना अनिवार्य होगा।

सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप क्यों अहम है?

कानूनी जानकारों के अनुसार, यह मामला केवल परिभाषा का नहीं बल्कि:

  • संविधान के अनुच्छेद 21 (स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार)

  • पीढ़ियों के बीच न्याय (Inter-generational Equity)

  • और राज्य की पर्यावरणीय जिम्मेदारी

से जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान लेना इस बात का संकेत है कि अदालत इस मुद्दे को सामान्य प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पर्यावरणीय संकट के रूप में देख रही है।


निष्कर्ष

अरावली पहाड़ियों की रक्षा केवल पर्यावरण की चिंता नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न है। सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई यह तय करेगी कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन किस दिशा में जाएगा। देश की निगाहें अब इस पर टिकी हैं कि शीर्ष अदालत इस संवेदनशील मुद्दे पर कितना कठोर और दूरदर्शी रुख अपनाती है।





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