28 दिसंबर 2025:कविता शर्मा | पत्रकार
हिंदी साहित्य में कुछ रचनाकार ऐसे होते हैं जिनकी कृतियाँ समय की सीमाओं को लांघकर समाज की स्थायी चेतना बन जाती हैं। दुष्यंत कुमार उन्हीं दुर्लभ कवियों में हैं, जिनकी ग़ज़लें केवल साहित्यिक रचनाएँ नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आत्मा की अभिव्यक्ति हैं।उनकी शायरी पढ़ते हुए यह एहसास बार-बार होता है कि शब्द यदि ईमानदार हों, तो वे सत्ता से भी बड़े हो जाते हैं।
दुष्यंत कुमार को समझना दरअसल उस भारत को समझना है, जो उम्मीद और हताशा के बीच झूलता हुआ भी सवाल पूछना नहीं छोड़ता।
ग़ज़ल: जब परंपरा जनता से मिलती है
ग़ज़ल सदियों तक प्रेम, विरह और आत्मिक वेदना की विधा रही। यह दरबारों और महफ़िलों में पनपी, शिष्ट भाषा और नाज़ुक एहसासों के साथ आगे बढ़ी।
लेकिन समय के साथ यह दूरी बढ़ती चली गई—ग़ज़ल आम आदमी की भाषा से दूर होती गई।
दुष्यंत कुमार ने इसी दूरी को सबसे पहले गंभीरता से पहचाना।
उन्होंने महसूस किया कि यदि कविता जनता की पीड़ा नहीं बोलेगी, तो वह सिर्फ़ कला रह जाएगी—संवेदना नहीं।
यही कारण है कि दुष्यंत की ग़ज़लें लोकजीवन की धड़कनों से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं। उन्होंने ग़ज़ल को मंच से उतारकर सड़क तक पहुंचाया—बिना उसके सौंदर्य को नष्ट किए।
भाषा का साहस: हिंदी और उर्दू का नैतिक संगम
दुष्यंत कुमार की सबसे बड़ी विशेषता उनकी भाषा है।
उन्होंने न हिंदी को उर्दू से डराया, न उर्दू को हिंदी से अलग किया।
उनकी भाषा में दोनों का ऐसा संतुलन है, जो न सांप्रदायिक है, न कृत्रिम।
उनके शब्द सरल हैं, मगर साधारण नहीं।
वे कठिन मुद्दों को ऐसी भाषा में कहते हैं, जिसे पढ़ा ही नहीं—महसूस किया जा सके।
यही भाषा उनकी ग़ज़लों को नारे बनने से रोकती है और उन्हें विचार बनाए रखती है।
आम आदमी की पीड़ा: दुष्यंत की ग़ज़ल का केंद्रीय स्वर
दुष्यंत कुमार की शायरी का केंद्र कोई कल्पनालोक नहीं, बल्कि जीता-जागता समाज है।
उनके यहां भूख है, बेरोज़गारी है, टूटे वादे हैं, और उम्मीद की जिद भी है।
उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ—
“हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए”
केवल व्यक्तिगत दुख नहीं, बल्कि सामूहिक थकान की आवाज़ हैं।
यह शेर उन लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जिनके पास शिकायतें हैं, लेकिन मंच नहीं।
‘साये में धूप’: एक संग्रह नहीं, एक घोषणा
1975 में प्रकाशित ‘साये में धूप’ को केवल ग़ज़ल-संग्रह कहना इस पुस्तक के साथ अन्याय होगा।
यह संग्रह दरअसल एक साहित्यिक घोषणा था—कि कविता सत्ता से सवाल करेगी और जनता के पक्ष में खड़ी होगी।
महत्वपूर्ण यह नहीं कि इस संग्रह में ग़ज़लें कम थीं, बल्कि यह है कि हर ग़ज़ल में वैचारिक स्पष्टता और नैतिक साहस मौजूद था।
यही कारण है कि आज भी हिंदी ग़ज़ल की चर्चा दुष्यंत कुमार से शुरू होकर उन्हीं पर आकर टिक जाती है।
शेर जो आंदोलन बने, मगर संवेदना नहीं खोई
दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों का सबसे बड़ा गुण यह है कि वे आंदोलनकारी होते हुए भी संवेदनशील रहती हैं।
उनके शेर भीड़ को भड़काते नहीं, बल्कि उसे सोचने पर मजबूर करते हैं।
वे विरोध करते हैं, लेकिन चीखते नहीं।
वे प्रश्न उठाते हैं, लेकिन शोर नहीं मचाते।
यह संतुलन ही दुष्यंत को एक परिपक्व और जिम्मेदार शायर बनाता है।
व्यक्तित्व: सरल, साहसी और सलीकेदार
दुष्यंत कुमार का निजी जीवन उनके साहित्य से अलग नहीं था।
वे जितने निर्भीक रचनाकार थे, उतने ही संवेदनशील इंसान।
वे पिता थे, मित्र थे, सहकर्मी थे—और हर भूमिका में मानवीय गरिमा बनाए रखते थे।
अनुशासन उनके स्वभाव में था, लेकिन वह डर से नहीं—समझ से पैदा हुआ था।
उनकी नफ़ासत, उनका बोलने का ढंग, और उनकी आत्मीयता यह साबित करती है कि क्रांति बदतमीज़ी से नहीं आती।
साहित्यिक संगत: विचारों की दोस्ती
कमलेश्वर, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और धर्मवीर भारती—ये नाम केवल मित्र नहीं थे, बल्कि दुष्यंत के वैचारिक सहयात्री थे।
इन मित्रताओं में बहस भी थी, मतभेद भी—लेकिन ईमानदारी हमेशा बनी रही।
यह संगत दुष्यंत के लेखन को और गहरा बनाती है।
उनकी कविता अकेलेपन की नहीं, संवाद की कविता है।
आपातकाल: जब कविता ने डर मानने से इनकार किया
1975 का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे संवेदनशील दौर था।
उस समय अधिकांश लोग चुप थे—लेकिन दुष्यंत कुमार नहीं।
उनकी ग़ज़लें उस दौर में नैतिक प्रतिरोध का स्वर बन गईं।
उन्होंने साबित किया कि कवि का काम सत्ता की प्रशंसा नहीं, बल्कि सच कहना है—चाहे उसकी कीमत कुछ भी हो।
अल्पायु, लेकिन दीर्घ प्रभाव
दुष्यंत कुमार का जीवन छोटा था, लेकिन उनका प्रभाव असाधारण रूप से बड़ा।
44 वर्ष की उम्र में उनका चला जाना साहित्य के लिए एक क्षति थी—लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी जीवित हैं।
वे चले गए, मगर पीछे छोड़ गए—
हिम्मत, भाषा, और सवाल करने की परंपरा।
