नई दिल्ली। 27 दिसम्बर 2025 | ✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार
CWC की अहम बैठक, शीर्ष नेतृत्व मौजूद
कांग्रेस की सर्वोच्च निर्णयकारी संस्था की इस बैठक में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, केसी वेणुगोपाल, शशि थरूर सहित कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए। इसके अलावा कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश जैसे कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और विभिन्न राज्यों के प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) अध्यक्ष भी बैठक में मौजूद रहे।
यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब अगले वर्ष असम, केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में संगठनात्मक मजबूती, चुनावी रणनीति, राजनीतिक संदेश और जनसंपर्क अभियानों को लेकर गहन चर्चा की गई।
मनरेगा की जगह नया कानून, कांग्रेस का कड़ा विरोध
बैठक का सबसे बड़ा मुद्दा मनरेगा को हटाकर ‘विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम’ (VB-G RAM G) को लागू किए जाने का रहा। यह विधेयक हाल ही में संसद के शीतकालीन सत्र में पारित हुआ और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के बाद कानून बन चुका है।
बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि मनरेगा को खत्म करने का फैसला एकतरफा है और इससे देशभर में जनता के बीच गुस्सा बढ़ रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि सरकार को इसके राजनीतिक परिणाम भुगतने होंगे।
खरगे ने कहा कि नए कानून के तहत योजना का वित्तीय बोझ केंद्र और राज्यों के बीच 60:40 के अनुपात में बांटा गया है, जिससे राज्यों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। कांग्रेस का आरोप है कि इससे गरीब और ग्रामीण मजदूरों के अधिकार कमजोर होंगे।
5 जनवरी से ‘मनरेगा बचाओ अभियान’
कांग्रेस अध्यक्ष ने घोषणा की कि CWC में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर 5 जनवरी 2026 से राष्ट्रव्यापी ‘मनरेगा बचाओ अभियान’ शुरू करने का निर्णय लिया गया है। इसके तहत गांव-गांव जाकर जनजागरण, विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक अभियान चलाया जाएगा।
खरगे ने कहा,
“संविधान और लोकतंत्र में आस्था रखते हुए हम संकल्प लेते हैं कि मनरेगा की रक्षा करेंगे, मजदूरों के अधिकार बचाएंगे और हर गांव में अपनी आवाज बुलंद करेंगे।”
उन्होंने बताया कि यह आंदोलन “जय संविधान” और “जय हिंद” के नारों के साथ आगे बढ़ेगा।
गांधी के नाम को हटाने पर नाराज़गी
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि रोजगार गारंटी योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाना उनके विचारों और विरासत का अपमान है। नए कानून के तहत ग्रामीण परिवारों को वित्तीय वर्ष में 125 दिनों के रोजगार की गारंटी देने का प्रावधान है, लेकिन कांग्रेस का आरोप है कि इसका स्वरूप और क्रियान्वयन मनरेगा की आत्मा के खिलाफ है।
पुराने उदाहरणों का हवाला
खरगे ने सरकार को याद दिलाया कि इससे पहले भी ऐसे फैसले वापस लेने पड़े हैं। उन्होंने भूमि अधिग्रहण कानून में 2015 के संशोधनों और तीन कृषि कानूनों का उदाहरण देते हुए कहा कि व्यापक जनविरोध के चलते सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े थे।
उन्होंने कहा,
“राहुल गांधी ने पहले ही कहा था कि कृषि कानून वापस होंगे, और अब उन्होंने कहा है कि मनरेगा को भी वापस लाना पड़ेगा। यह हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है कि इस पर ठोस योजना बनाएं और देशव्यापी जनअभियान चलाएं।”
SIR पर भी कांग्रेस का हमला
बैठक में कांग्रेस ने कई राज्यों में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर भी गंभीर चिंता जताई। खरगे ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित करने की “सोची-समझी साजिश” बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया के जरिए मतदाता सूचियों में हेरफेर कर लोकतंत्र को कमजोर किया जा रहा है।
खरगे के अनुसार, राहुल गांधी पहले ही देश के सामने कथित “वोट चोरी” के सबूत रख चुके हैं। कांग्रेस ने संकेत दिया कि SIR का विरोध भी आगामी चुनावों में उसके राजनीतिक आंदोलन का प्रमुख हिस्सा होगा।
अंतरराष्ट्रीय और सांप्रदायिक मुद्दों पर भी बयान
बैठक में खरगे ने बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों की निंदा करते हुए कहा कि यह पूरे देश के लिए चिंता का विषय है। इसके साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि क्रिसमस डे पर “बीजेपी और आरएसएस से जुड़े संगठनों” द्वारा किए गए हमलों से सांप्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुंचा है और भारत की वैश्विक छवि प्रभावित हुई है।
2026 चुनावों की तैयारी में कांग्रेस
कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि मनरेगा का मुद्दा और SIR का विरोध 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले उसकी राजनीतिक लामबंदी का केंद्र बिंदु रहेगा। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि मौजूदा हालात में जनता कांग्रेस की ओर उम्मीद से देख रही है और पार्टी को इस भरोसे पर खरा उतरना होगा।
कुल मिलाकर, कांग्रेस ने मनरेगा के मुद्दे को केवल नीतिगत बहस तक सीमित न रखते हुए उसे बड़े जनआंदोलन और चुनावी रणनीति का आधार बनाने का संकेत दे दिया है। आने वाले महीनों में यह अभियान भारतीय राजनीति में एक बड़ा मुद्दा बन सकता है।
