31 दिसंबर 2025:कविता शर्मा | पत्रकार
यह रिपोर्ट किसी एक घटना या बयान पर नहीं, बल्कि दशकों में विकसित हुई एक वैचारिक संरचना पर केंद्रित है—और इसी कारण इसे हल्के में खारिज करना आसान नहीं।
RSS: संगठन से परे, एक वैचारिक तंत्र
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट RSS को केवल एक स्वयंसेवी या सांस्कृतिक संगठन के रूप में नहीं देखती, बल्कि उसे एक सुसंगठित, अनुशासित और दीर्घकालिक वैचारिक मशीनरी के रूप में प्रस्तुत करती है। रिपोर्ट के अनुसार, RSS से जुड़े 2500 से अधिक अनुषांगिक संगठन—राजनीति, शिक्षा, श्रम, धर्म, मीडिया, व्यापार, कानून और संस्कृति—हर क्षेत्र में सक्रिय हैं।
यह नेटवर्क किसी पारंपरिक सत्ता की तरह दिखता नहीं, लेकिन इसका प्रभाव धीमे, स्थायी और गहराई तक जाने वाला बताया गया है। रिपोर्ट इसे “shadow influence structure” कहने से नहीं चूकती—ऐसी सत्ता जो दिखती नहीं, लेकिन फैसलों, नियुक्तियों और नीतियों पर असर डालती है।
संस्थानों में वैचारिक प्रवेश: लोकतंत्र की सबसे संवेदनशील रेखा
रिपोर्ट का सबसे गंभीर दावा यह है कि RSS ने भारत के लगभग सभी प्रमुख संस्थानों में अपने वैचारिक समर्थकों की उपस्थिति सुनिश्चित कर ली है। इसमें शामिल हैं:
-
राजनीति और नीति-निर्माण
-
नौकरशाही और प्रशासन
-
न्यायपालिका और कानूनी ढांचा
-
सेना और अर्धसैनिक बल
-
मीडिया हाउस और डिजिटल प्लेटफॉर्म
-
विश्वविद्यालय और शैक्षणिक पाठ्यक्रम
-
कॉरपोरेट और बड़े बिज़नेस ग्रुप
न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, जब किसी लोकतंत्र में संस्थान विचारधारा से संचालित होने लगते हैं, तो चुनाव मात्र एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाते हैं। यह टिप्पणी भारत जैसे संवैधानिक गणराज्य के लिए बेहद संवेदनशील मानी जा रही है।
‘सेक्युलर भारत’ से ‘हिंदू फर्स्ट भारत’ तक की यात्रा
रिपोर्ट का केंद्रीय वैचारिक निष्कर्ष यह है कि RSS का दीर्घकालिक लक्ष्य भारत को उसके संवैधानिक सेक्युलर ढांचे से हटाकर एक ऐसे राष्ट्र में बदलना है, जहाँ सांस्कृतिक पहचान का केंद्र हिंदुत्व हो।
यह बदलाव किसी एक कानून या फैसले से नहीं, बल्कि
-
पाठ्यक्रमों में परिवर्तन,
-
ऐतिहासिक नैरेटिव के पुनर्लेखन,
-
धार्मिक प्रतीकों के राजनीतिक उपयोग,
-
और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की निरंतर पुनरावृत्ति
के ज़रिये धीरे-धीरे स्थापित किया गया—ऐसा रिपोर्ट का विश्लेषण है।
मोदी युग: विस्तार का निर्णायक चरण
न्यूयॉर्क टाइम्स स्पष्ट रूप से कहता है कि नरेंद्र मोदी के 11 वर्षों के कार्यकाल में RSS को अभूतपूर्व विस्तार और संस्थागत स्वीकृति मिली। सत्ता और संगठन के बीच वैचारिक सामंजस्य ने RSS को वह अवसर दिया, जो उसे पहले कभी नहीं मिला था।
रिपोर्ट के अनुसार:
-
सरकार और संगठन के बीच अनौपचारिक तालमेल,
-
नीतिगत फैसलों में वैचारिक समानता,
-
और विरोधी आवाज़ों को “राष्ट्र-विरोधी” ठहराने की प्रवृत्ति
ने भारत के लोकतांत्रिक स्पेस को संकुचित किया है।
अल्पसंख्यक समुदाय और नफरत की राजनीति
रिपोर्ट का सबसे विवादास्पद, लेकिन सबसे चर्चित हिस्सा RSS की विचारधारा और मुस्लिम-ईसाई अल्पसंख्यकों के बीच टकराव से जुड़ा है। न्यूयॉर्क टाइम्स सीधे आरोप नहीं लगाता, लेकिन यह ज़रूर रेखांकित करता है कि:
-
चर्चों पर हमले
-
मॉब लिंचिंग
-
सांप्रदायिक दंगे
-
धार्मिक जुलूसों की आड़ में हिंसा
इन सभी घटनाओं को एक ऐसे वैचारिक वातावरण में देखा जाना चाहिए, जहाँ बहुलता के बजाय वर्चस्व को बढ़ावा मिलता है।
भारत की मिली-जुली संस्कृति पर संकट
रिपोर्ट का निष्कर्ष बेहद गंभीर है—भारत, जिसे उसकी गंगा-जमुनी तहज़ीब, बहुलता और सह-अस्तित्व के लिए जाना जाता रहा है, आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ सांस्कृतिक विविधता को “कमज़ोरी” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय स्कॉलर्स, दार्शनिक और राजनेता इसे केवल भारत का आंतरिक मामला नहीं, बल्कि वैश्विक लोकतांत्रिक संकट के रूप में देख रहे हैं।
पश्चिमी मीडिया बनाम भारत: पक्षपात या चेतावनी?
भारत में इस रिपोर्ट को लेकर तीखी प्रतिक्रिया भी देखने को मिली। एक वर्ग इसे
-
पश्चिमी मीडिया का पूर्वाग्रह,
-
औपनिवेशिक मानसिकता,
-
और भारत की संप्रभुता में दखल
मानता है।
वहीं दूसरा वर्ग इसे लोकतंत्र के लिए समय रहते दी गई चेतावनी कहता है।
पत्रकारिता के मानकों के अनुसार, न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस रिपोर्ट को भावनात्मक नहीं, बल्कि डाटा, इंटरव्यू और ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर प्रस्तुत किया है—यही बात इसे अनदेखा करने से रोकती है।
निष्कर्ष:-
सवाल RSS का नहीं, भारत के भविष्य का
यह रिपोर्ट अंततः RSS पर नहीं, बल्कि भारत की आत्मा पर सवाल उठाती है। क्या भारत एक ऐसा राष्ट्र बना रहेगा जहाँ विचार, आस्था और पहचान की विविधता सुरक्षित है? या फिर एक विचारधारा धीरे-धीरे लोकतंत्र की सभी आवाज़ों पर हावी हो जाएगी?
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट इस प्रश्न का उत्तर नहीं देती—लेकिन यह प्रश्न दुनिया के सामने ज़रूर रख देती है। और शायद यही किसी भी गंभीर पत्रकारिता का सबसे बड़ा उद्देश्य होता है।
