दिल्ली। 31 दिसम्बर 2025 | ✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार
सोशल मीडिया फिटनेस चैलेंज से भर जाता है, जिम की मेंबरशिप सस्ती हो जाती है, डाइट प्लान ट्रेंड करने लगते हैं और दफ़्तरों में एक ही सवाल गूंजता है—
“इस साल तुम क्या बदलने वाले हो?”
लेकिन सच्चाई यह है कि ज़्यादातर नए साल के संकल्प जनवरी के आधे रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। सवाल यह नहीं कि लोग कोशिश नहीं करते, सवाल यह है कि वे शुरुआत ही ग़लत जगह से करते हैं।
मनोवैज्ञानिकों, हेल्थ एक्सपर्ट्स और बिहेवियर कोच की रिसर्च बताती है कि संकल्प टूटने की सबसे बड़ी वजह गलत भाषा, अवास्तविक अपेक्षाएँ और मानसिक कठोरता है।
समस्या संकल्प में नहीं, सोच में होती है
पूर्व जीपी और कॉन्फिडेंस कोच डॉ. क्लेयर के अनुसार, लोग अक्सर संकल्प को एक दबाव की तरह लिखते हैं—
जैसे कोई अदालत का फ़ैसला हो।
“मैं वज़न कम करूंगा”
“मैं करियर बदल दूंगा”
“मैं पूरी तरह फिट हो जाऊंगा”
ये वाक्य सुनने में ताक़तवर लगते हैं, लेकिन हकीकत में ये अस्पष्ट और अव्यावहारिक घोषणाएँ हैं।
डॉ. क्लेयर कहती हैं कि दिमाग़ बदलाव को तभी स्वीकार करता है जब उसे यह समझ आए कि
आप किस ओर बढ़ना चाहते हैं, न कि किससे भागना चाहते हैं।
लक्ष्य नहीं, दिशा तय कीजिए
रिसर्च बताती है कि जो लोग “परिणाम” की बजाय “अनुभव” पर ध्यान देते हैं, उनके संकल्प ज़्यादा समय तक टिकते हैं।
उदाहरण के लिए—
❌ “मुझे वज़न घटाना है”
✔ “मैं अपने शरीर में ज़्यादा ऊर्जा और सहजता महसूस करना चाहता हूँ”
❌ “मुझे नौकरी बदलनी है”
✔ “मैं यह समझना चाहता हूँ कि किस तरह का काम मुझे मानसिक संतुष्टि देता है”
यह भाषा दिमाग़ में डर नहीं, जिज्ञासा और सीखने की भावना पैदा करती है।
इन दो शब्दों से दूरी बनाइए: Always और Never
मनोवैज्ञानिक किम्बरली विल्सन के अनुसार, नए साल के संकल्पों के सबसे बड़े दुश्मन हैं—
“हमेशा” (Always)
“कभी नहीं” (Never)
जब आप खुद से कहते हैं—
“मैं अब कभी जंक फूड नहीं खाऊंगा”
या
“मैं हमेशा सुबह 5 बजे उठूंगा”
तो आप अनजाने में अपने दिमाग़ को ऑल-ऑर-नथिंग मोड में डाल देते हैं।
इस सोच में एक छोटी सी चूक भी पूरी मेहनत को बेकार महसूस कराने लगती है।
“एक दिन गड़बड़ हुआ, तो लगता है सब खत्म।”
यही वजह है कि लोग एक चूक के बाद सब छोड़ देते हैं।
परफ़ेक्ट नहीं, लगातार बने रहना ज़रूरी है
विशेषज्ञ मानते हैं कि लोग अपने संकल्प अपने सबसे अच्छे दिन को ध्यान में रखकर बनाते हैं,
लेकिन अपने सबसे थके हुए, तनावग्रस्त या बीमार दिन को भूल जाते हैं।
जब कोई दिन योजना के मुताबिक नहीं जाता, तो अपराधबोध शुरू हो जाता है।
असल में, पुरानी आदतों की वापसी भी बदलाव की प्रक्रिया का हिस्सा है।
डॉ. क्लेयर कहती हैं—
“लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि गलती न हो, बल्कि यह कि एक गलती पूरी यात्रा को न तोड़ दे।”
अगर चूक हो जाए, तो आलोचना नहीं, जिज्ञासा ज़रूरी है—
क्या हुआ? क्यों हुआ? अगली बार क्या अलग कर सकता हूँ?
नई आदतों को पुरानी आदतों से जोड़िए
करियर और बिहेवियर कोच एम्मा जेफ़रीज़ एक कारगर तकनीक सुझाती हैं—
Habit Stacking (आदतों की परत बनाना)
मतलब, नई आदत को किसी पहले से मौजूद रोज़मर्रा की आदत से जोड़ देना।
जैसे—
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दाँत ब्रश करने के बाद 10 पुश-अप
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बच्चों को सुलाने के बाद 5 मिनट स्ट्रेचिंग
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रात की चाय के साथ 10 मिनट पढ़ना
इससे दिमाग़ को नई आदत अलग बोझ नहीं लगती, बल्कि वह पहले से बने ढांचे में फिट हो जाती है।
मोटिवेशन नहीं, माहौल बदलता है आदतें
सिर्फ़ इच्छाशक्ति पर भरोसा करना अक्सर नाकाम होता है।
माहौल अगर आपके पक्ष में हो, तो आधी लड़ाई वहीं जीत ली जाती है।
उदाहरण—
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ज़्यादा पढ़ना चाहते हैं? किताब तकिए पर रखें
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फोन कम देखना चाहते हैं? चार्जर कमरे से बाहर रखें
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जल्दी सोना चाहते हैं? रात की लाइट धीमी कर दें
छोटे-छोटे बदलाव बड़े नतीजे देते हैं।
सकारात्मक लक्ष्य से जोड़िए संकल्प
अगर संकल्प पैसे बचाने या बजट सुधारने का है, तो उसे किसी सकारात्मक सपने से जोड़िए।
पर्सनल फाइनेंस एक्सपर्ट टॉम फ्रांसिस के अनुसार—
“जब बचत किसी छुट्टी, सुरक्षा या आज़ादी से जुड़ी होती है, तो वह बोझ नहीं लगती।”
1,200 पाउंड एक साथ बचाने का लक्ष्य डरावना लग सकता है,
लेकिन 100 पाउंड महीना— यथार्थवादी और संभव लगता है।
और अगर किसी महीने कम हो जाए, तो भी प्रक्रिया नहीं टूटती।
निष्कर्ष: संकल्प बदलने का नहीं, समझने का नाम है
नया साल कोई जादुई रीसेट बटन नहीं है।
यह सिर्फ़ एक तारीख़ है—
लेकिन सही सोच के साथ, यह बेहतर दिशा ज़रूर दे सकता है।
याद रखिए—
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कठोर शब्द नहीं, लचीली भाषा चुनिए
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परफ़ेक्शन नहीं, निरंतरता ज़रूरी है
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असफलता नहीं, सीखने की प्रक्रिया अपनाइए
शायद इस बार सवाल यह न हो कि
“मैं क्या छोड़ूँ?”
बल्कि यह हो—
“मैं अपने लिए क्या बेहतर बनाना चाहता हूँ?”
यही सोच आपके नए साल के संकल्प को सच में टिकाऊ बना सकती है।
