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देहरादून में त्रिपुरा के छात्र की हत्या: पुलिस ने नस्लीय हमले से किया इनकार, कहा—“मज़ाक में की गई टिप्पणियों से फैली गलतफहमी”

 नई दिल्ली। 30 दिसम्बर 2025 | ✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार   

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में त्रिपुरा के 24 वर्षीय MBA छात्र एंजेल चकमा की चाकू मारकर हत्या के मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह घटना अब केवल एक आपराधिक मामला नहीं रह गई, बल्कि नॉर्थ ईस्ट के छात्रों के साथ होने वाले कथित नस्लीय भेदभाव और सामाजिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

हालांकि, देहरादून पुलिस ने इस पूरे मामले को नस्लीय हमला मानने से इनकार किया है। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) अजय सिंह ने NDTV से बातचीत में कहा कि घटना में शामिल लोगों के बीच की गई कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियां “मज़ाक में” थीं, जिन्हें गलत तरीके से नस्लीय हमला समझ लिया गया।

पुलिस का दावा: नस्लीय हमला नहीं, आपसी गलतफहमी

SSP अजय सिंह के अनुसार,

“यह घटना नस्लीय टिप्पणी की श्रेणी में नहीं आती, क्योंकि विवाद में शामिल एक युवक खुद उसी राज्य (नॉर्थ ईस्ट) से है। कुछ लोग आपस में बैठे हुए मज़ाक में अपमानजनक बातें कह रहे थे, लेकिन उसे गलत तरीके से पीड़ितों की ओर निर्देशित समझ लिया गया।”

पुलिस का कहना है कि इसी भ्रम के चलते कहासुनी बढ़ी और मामला हिंसक झड़प में बदल गया। अधिकारी ने यह भी कहा कि पूछताछ के दौरान नॉर्थ ईस्ट से जुड़े एक आरोपी ने स्वीकार किया कि टिप्पणियां किसी खास व्यक्ति को निशाना बनाकर नहीं की गई थीं।

9 दिसंबर की रात क्या हुआ था?

एफआईआर और चश्मदीद बयानों के मुताबिक, 9 दिसंबर 2025 की शाम एंजेल चकमा और उनके भाई माइकल चकमा देहरादून के एक बाज़ार में घरेलू सामान खरीदने गए थे। इसी दौरान कुछ स्थानीय युवक और एक अन्य व्यक्ति, जो कथित रूप से नशे में थे, उनके साथ उलझ गए।

पीड़ित परिवार और प्रत्यक्षदर्शियों का आरोप है कि आरोपियों ने जातिगत और नस्लीय अपशब्दों का इस्तेमाल किया। जब दोनों भाइयों ने इसका विरोध किया, तो विवाद हिंसा में बदल गया।

  • माइकल के सिर पर गंभीर वार किया गया

  • एंजेल चकमा पर गर्दन और पेट में चाकू से कई बार हमला किया गया

एंजेल को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 17 दिन तक संघर्ष करने के बाद 26 दिसंबर को उनकी मौत हो गई

एफआईआर में गंभीर आरोप

एंजेल के भाई माइकल की शिकायत पर दर्ज एफआईआर में कहा गया है:

“जब मेरे भाई ने जातिगत अपशब्दों का विरोध किया, तो आरोपियों ने चाकू और लोहे की रॉड से हमला किया।”

पुलिस ने अब तक पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि एक आरोपी, जो नेपाली नागरिक बताया जा रहा है, सीमा पार फरार हो गया है।

नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स एसोसिएशन का बयान

देहरादून स्थित नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स एसोसिएशन के नेता ऋषिकेश बरुआ ने इस घटना को देश की विविधता को न समझ पाने का नतीजा बताया।

उन्होंने कहा:

“जब छात्र बाज़ार में थे, तो उनकी हिंदी को लेकर टिप्पणी की गई—‘तुम लोग भारत से नहीं हो, हिंदी बोलकर दिखाओ।’ जब हमने बताया कि वे भारतीय हैं, तभी बहस बढ़ी और किसी ने चाकू निकाल लिया।”

बरुआ ने कहा कि नॉर्थ ईस्ट के अधिकांश छात्र किसी न किसी स्तर पर नस्लीय भेदभाव का सामना कर चुके हैं और इसके लिए सख्त कानून की आवश्यकता है।

पीड़ित पिता की भावुक अपील

एंजेल चकमा के पिता तरुण प्रसाद चकमा, जो सीमा सुरक्षा बल (BSF) में कार्यरत हैं, ने कहा:

“नॉर्थ ईस्ट के बच्चे दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और देहरादून पढ़ने-काम करने जाते हैं। वे भी उतने ही भारतीय हैं। सरकार से अपील है कि सभी के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित किया जाए।”

राजनीतिक और राष्ट्रीय प्रतिक्रिया

इस घटना पर देशभर से तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं:

  • केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इसे “मानवता और संवेदनशीलता पर गहरा आघात” बताया

  • उत्तराखंड CM पुष्कर सिंह धामी ने पीड़ित परिवार को सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया

  • कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इसे “राष्ट्रीय शर्म” करार देते हुए कहा कि कोई भी भारतीय अपने ही देश में खुद को पराया महसूस न करे

  • अरविंद केजरीवाल ने इसे सिस्टम की विफलता बताते हुए राष्ट्रीय स्तर पर एंटी-रेसिज़्म कानून की मांग की

  • नागालैंड मंत्री तेमजेन इम्ना अलोंग ने नॉर्थ ईस्ट को भारत का अभिन्न हिस्सा बताते हुए अपमानजनक सोच की कड़ी आलोचना की


समाज के सामने बड़ा सवाल

हालांकि पुलिस इस घटना को नस्लीय हमला मानने से इनकार कर रही है, लेकिन छात्र संगठनों, राजनीतिक दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह मामला केवल कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि मानसिकता और सामाजिक स्वीकार्यता का भी है

एंजेल चकमा की मौत ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है—
क्या भारत अपनी विविधता को वास्तव में स्वीकार कर पाया है, या नॉर्थ ईस्ट के नागरिक अब भी संदेह और पूर्वाग्रह की नजर से देखे जाते हैं?

यह मामला न सिर्फ न्यायिक जांच, बल्कि राष्ट्रीय आत्ममंथन की भी मांग करता है।






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